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(सच्चा इस्लाम)

Q.S अल-अनफल (اَلْأَنْفَال) - 75 पदों की संख्या

(युद्ध के लूट)

Qari

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1

يَسْـَٔلُوْنَكَ عَنِ الْاَنْفَالِۗ قُلِ الْاَنْفَالُ لِلّٰهِ وَالرَّسُوْلِۚ فَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاَصْلِحُوْا ذَاتَ بَيْنِكُمْ ۖوَاَطِيْعُوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗٓ اِنْ كُنْتُمْ مُّؤْمِنِيْنَ

yas'alūnaka ‘anil-anfāl(i), qulil-anfālu lillāhi war-rasūl(i), fattaqullāha wa aṣliḥū żāta bainikum, wa aṭī‘ullāha wa rasūlahū in kuntum mu'minīn(a).

ओ सब अहाँ (मुहम्मद) स युद्ध के लूट के (बंटवारा) के बारे में पूछैत छथि। कहब, "युद्ध के लूट अल्लाह आ रसूलुल्लाह के अछि (अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के प्रावधान के अनुसार), ताहि लेल अल्लाह स डरू आ अपन पड़ोसी के बीच संबंध सुधारू, आ अगर अहां मुसलमान छी त अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के आज्ञा मानू।"


2

اِنَّمَا الْمُؤْمِنُوْنَ الَّذِيْنَ اِذَا ذُكِرَ اللّٰهُ وَجِلَتْ قُلُوْبُهُمْ وَاِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ اٰيٰتُهٗ زَادَتْهُمْ اِيْمَانًا وَّعَلٰى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُوْنَۙ

innamal-mu'minūnal-lażīna iżā żukirallāhu wajilat qulūbuhum wa iżā tuliyat ‘alaihim āyātuhū zādathum īmānaw wa ‘alā rabbihim yatawakkalūn(a).

सचमुच, जे विश्वास करै छै, वू वू छै, जेकरऽ दिल अल्लाह केरऽ नाम लेन॑ पर काँप जाय छै, आरू जब॑ ओकरा आयत केरऽ आयत पढ़लऽ जाय छै त॑ ओकरऽ ईमान बढ़ी जाय छै (मजबूत होय जाय छै) आरू वू खाली अल्लाह प॑ भरोसा करै छै ।


3

الَّذِيْنَ يُقِيْمُوْنَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقْنٰهُمْ يُنْفِقُوْنَۗ

al-lażīna yuqīmūnaṣ-ṣalāta wa mimmā razaqnāhum yunfiqūn(a).

(अर्थात) जे नमाज करैत छथि आ जे रोजी-रोटी के किछु हिस्सा खर्च करैत छथि जे हम हुनका दैत छी |


4

اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْمُؤْمِنُوْنَ حَقًّاۗ لَهُمْ دَرَجٰتٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَمَغْفِرَةٌ وَّرِزْقٌ كَرِيْمٌۚ

ulā'ika humul-mu'minūna ḥaqqā(n), lahum darajātun ‘inda rabbihim wa magfiratuw wa rizqun karīm(un).

ई सब सच्चा विश्वासी छथि। अपन प्रभुक संग उच्च पद, क्षमा, आ उदात्त भोजन प्राप्त करताह।


5

كَمَآ اَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْۢ بَيْتِكَ بِالْحَقِّۖ وَاِنَّ فَرِيْقًا مِّنَ الْمُؤْمِنِيْنَ لَكٰرِهُوْنَ

kamā akhrajaka rabbuka mim baitika bil-ḥaqq(i), wa inna farīqam minal-mu'minīna lakārihūn(a).

जहिना अहाँक प्रभु अहाँ सभ केँ आज्ञा देलनि जे अहाँ सभ सत्यक संग अपन घर सँ बाहर निकलू, भले आस्तिक सभक एकटा दल केँ ई बात नापसंद हो।


6

يُجَادِلُوْنَكَ فِى الْحَقِّ بَعْدَمَا تَبَيَّنَ كَاَنَّمَا يُسَاقُوْنَ اِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُوْنَ ۗ

yujādilūnaka fil-ḥaqqi ba‘da mā tabayyana ka'annamā yusāqūna ilal-mauti wa hum yanẓurūn(a).

ओ सभ अहाँ (मुहम्मद) सँ सच्चाईक विषय मे विवाद करैत छथि जखन ई स्पष्ट भ' गेल अछि (जे ओ सभ जीतत), जेना हुनका सभ केँ (मृत्युक कारण) देखैत मृत्युक लेल धकेलल जा रहल हो।


7

وَاِذْ يَعِدُكُمُ اللّٰهُ اِحْدَى الطَّاۤىِٕفَتَيْنِ اَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّوْنَ اَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُوْنُ لَكُمْ وَيُرِيْدُ اللّٰهُ اَنْ يُّحِقَّ الْحَقَّ بِكَلِمٰتِهٖ وَيَقْطَعَ دَابِرَ الْكٰفِرِيْنَۙ

wa iż ya‘idukumullāhu iḥdaṭ-ṭā'ifataini annahā lakum wa tawaddūna anna gaira żātisy-syaukati takūnu lakum wa yurīdullāhu ay yuḥiqqal-ḥaqqa bikalimātihī wa yaqṭa‘a dābiral-kāfirīn(a).

आ (याद राखू) जखन अल्लाह अहाँ सँ वादा केने छलाह जे दुनू दल (अहाँक सामना) मे सँ एकटा अहाँक होयत, जखन कि अहाँ चाहैत छलहुँ जे बिना हथियारबंद शक्तिक अहाँक हो। लेकिन अल्लाह केरऽ इरादा छै कि अपनऽ निशानी स॑ सच्चाई क॑ स्थापित करी क॑ काफिरऽ क॑ ओकरऽ जड़ स॑ सफाया करी देलऽ जाय ।


8

لِيُحِقَّ الْحَقَّ وَيُبْطِلَ الْبَاطِلَ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُوْنَۚ

liyuḥiqqal-ḥaqqa wa yubṭilal-bāṭila wa lau karihal-mujrimūn(a).

ताकि अल्लाह जे सही छै (इस्लाम) के मजबूत करतै आरू जे झूठ छै (शिर्क) ओकरा समाप्त करी दै छै भले ही पापी लोग (शरीक) के पसंद नै छै।


9

اِذْ تَسْتَغِيْثُوْنَ رَبَّكُمْ فَاسْتَجَابَ لَكُمْ اَنِّيْ مُمِدُّكُمْ بِاَلْفٍ مِّنَ الْمَلٰۤىِٕكَةِ مُرْدِفِيْنَ

iż tastagīṡūna rabbakum fastajāba lakum annī mumiddukum bi'alfim minal-malā'ikati murdifīn(a).

(याद राखू), जखन अहाँ अपन प्रभु सँ मदद मँगलहुँ, तखन ओ अहाँ केँ अनुमति देलनि, "सत्ते, हम अहाँ केँ हजार स्वर्गदूतक संग सुदृढीकरण आनि देब जे क्रमशः आओत।"


10

وَمَا جَعَلَهُ اللّٰهُ اِلَّا بُشْرٰى وَلِتَطْمَىِٕنَّ بِهٖ قُلُوْبُكُمْۗ وَمَا النَّصْرُ اِلَّا مِنْ عِنْدِ اللّٰهِ ۗاِنَّ اللّٰهَ عَزِيْزٌ حَكِيْمٌ ࣖ

wa mā ja‘alahullāhu illā busyrā wa litaṭma'inna bihī qulūbukum, wa man-naṡru illā min ‘indillāh(i), innallāha ‘azīzun ḥakīm(un).

आ अल्लाह एकरा नीक खबर के रूप में छोड़ि क' नहि बनौलनि जाहि सं अहां सभ के दिल एकरा कारण सं शांति मिलय. आ जीत केवल अल्लाह स भेटैत अछि। सचमुच अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वबुद्धिमान छथि।


11

اِذْ يُغَشِّيْكُمُ النُّعَاسَ اَمَنَةً مِّنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِّنَ السَّمَاۤءِ مَاۤءً لِّيُطَهِّرَكُمْ بِهٖ وَيُذْهِبَ عَنْكُمْ رِجْزَ الشَّيْطٰنِ وَلِيَرْبِطَ عَلٰى قُلُوْبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ الْاَقْدَامَۗ

iż yugasysyīkumun-nu‘āsa amanatam minhu wa yunazzilu ‘alaikum minas-samā'i mā'al liyuṭahhirakum bihī wa yużhiba ‘ankum rijzasy-syaiṭāni wa liyarbiṭa ‘alā qulūbikum wa yuṡabbita bihil-aqdām(a).

(याद राखू) जखन अल्लाह अहाँ सभ केँ हुनका सँ शांति देबाक लेल नींद मे आनि देलनि, आ आकाश सँ पानि (बरखा) पठौलनि जाहि सँ अहाँ सभ केँ शुद्ध कयल जाय आ अहाँ सभ सँ शैतान केर बुराई केँ दूर कयल जाय आ अहाँ सभक हृदय केँ मजबूत करबाक लेल आ अहाँक पैर केँ मजबूत करबाक लेल।


12

اِذْ يُوْحِيْ رَبُّكَ اِلَى الْمَلٰۤىِٕكَةِ اَنِّيْ مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْاۗ سَاُلْقِيْ فِيْ قُلُوْبِ الَّذِيْنَ كَفَرُوا الرُّعْبَ فَاضْرِبُوْا فَوْقَ الْاَعْنَاقِ وَاضْرِبُوْا مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍۗ

iż yūḥī rabbuka ilal-malā'ikati annī ma‘akum fa ṡabbitul-lażīna āmanū, sa'ulqī fī qulūbil-lażīna kafarur-ru‘ba faḍribū fauqal-a‘nāqi waḍribū minhum kulla banān(in).

(याद राखू), जखन अहाँक प्रभु स्वर्गदूत सभ केँ प्रकट कयलनि, "सत्ते हम अहाँक संग छी, तेँ जे विश्वास केलक अछि, ओकर (रुख केँ) मजबूत करू।" एक दिन हम काफिरक हृदय मे भय डालब, तेँ हुनका सभक गरदनि सँ ऊपर प्रहार करू आ आँगुरक एक-एक नोक पर प्रहार करू।


13

ذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ شَاۤقُّوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗۚ وَمَنْ يُّشَاقِقِ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ فَاِنَّ اللّٰهَ شَدِيْدُ الْعِقَابِ

Żālika bi'annahum syāqqullāha wa rasūlah(ū), wa may yusyāqiqillāha wa rasūlahū fa innallāha syadīdul-‘iqāb(i).

एकरऽ कारण छै कि वू लोगऽ न॑ अल्लाह आरू हुनकऽ रसूलुल्लाह के विरोध करलकै; आरू जे भी अल्लाह आरू ओकरऽ रसूलुल्लाह के विरोध करै छै, वू सचमुच अल्लाह केरऽ सजा कठोर छै ।


14

ذٰلِكُمْ فَذُوْقُوْهُ وَاَنَّ لِلْكٰفِرِيْنَ عَذَابَ النَّارِ

Żālikum fa żūqūhu wa anna lil-kāfirīna ‘ażāban-nār(i).

एहि तरहें (संसारक दण्ड अहाँ पर लगाओल गेल अछि), तेँ ओहि दण्ड केँ अनुभूति करू। सचमुच, जे अविश्वास करै छै, ओकरा लेल (पुनः) नरक के सजा छै।


15

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا لَقِيْتُمُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوْهُمُ الْاَدْبَارَۚ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā laqītumul-lażīna kafarū zaḥfan falā tuwallūhumul-adbār(a).

हे आस्तिक लोकनि! जँ अहाँ अविश्वासी सभसँ भेंट करब जे अहाँ पर हमला करय चाहैत छथि तखन हुनका सभसँ पीठ नहि फेरू (पीठि कऽ)।


16

وَمَنْ يُّوَلِّهِمْ يَوْمَىِٕذٍ دُبُرَهٗٓ اِلَّا مُتَحَرِّفًا لِّقِتَالٍ اَوْ مُتَحَيِّزًا اِلٰى فِئَةٍ فَقَدْ بَاۤءَ بِغَضَبٍ مِّنَ اللّٰهِ وَمَأْوٰىهُ جَهَنَّمُ ۗ وَبِئْسَ الْمَصِيْرُ

wa may yuwallihim yauma'iżin duburahū illā mutaḥarrifal liqitālin au mutaḥayyizan ilā fi'atin faqad bā'a bigaḍabim minallāhi wa ma'wāhu jahannam(u), wa bi'sal-maṣīr(u).

आ जे कियो ओहि समय पाछू घुमि जायत, सिवाय युद्धक (एकटा रणनीति) लेल पाछू घुमबाक वा कोनो दोसर सेना मे शामिल हेबाक, तखन सचमुच, ओ अल्लाह सँ क्रोध ल' क' वापस आबि जायत, आ ओकर निवास नरक होयत, जे वाकई मे एकटा दुष्ट मंजिल होयत।


17

فَلَمْ تَقْتُلُوْهُمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ قَتَلَهُمْۖ وَمَا رَمَيْتَ اِذْ رَمَيْتَ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ رَمٰىۚ وَلِيُبْلِيَ الْمُؤْمِنِيْنَ مِنْهُ بَلَاۤءً حَسَنًاۗ اِنَّ اللّٰهَ سَمِيْعٌ عَلِيْمٌ

falam taqtulūhum wa lākinnallāha qatalahum, wa mā ramaita iż ramaita wa lākinallāha ramā, wa liyubliyal-mu'minīna minhu balā'an ḥasanā(n), innallāha samī‘un ‘alīm(un).

त (वास्तव में) अहाँ नै छलौं जे ओकरा सब के मारलौं, बल्कि अल्लाह छलौं जे ओकरा सब के मारलौं, आ अहाँ नै छलौं जे फेकला पर फेंकलौं, बल्कि अल्लाह छलौं जे फेंकलौं। (अल्लाह हुनका सब के नष्ट करय लेल ई काज केलनि) आ मुसलमान के जीत देबय लेल, नीक जीत के संग। सचमुच अल्लाह सर्वश्री, सर्वज्ञ छथि।


18

ذٰلِكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ مُوْهِنُ كَيْدِ الْكٰفِرِيْنَ

Żālikum wa annallāha mūhinu kaidil-kāfirīn(a).

एहि तरहेँ (अल्लाह केर कृपा अहाँ सभ पर कयल गेल अछि), आ सचमुच, अल्लाह काफिर सभक छल केँ कमजोर क' दैत छथि।


19

اِنْ تَسْتَفْتِحُوْا فَقَدْ جَاۤءَكُمُ الْفَتْحُۚ وَاِنْ تَنْتَهُوْا فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْۚ وَاِنْ تَعُوْدُوْا نَعُدْۚ وَلَنْ تُغْنِيَ عَنْكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْـًٔا وَّلَوْ كَثُرَتْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ مَعَ الْمُؤْمِنِيْنَ ࣖ

in tastaftiḥū faqad jā'akumul-fatḥ(u), wa in tantahū fa huwa khairul lakum, wa in ta‘ūdū na‘ud, wa lan tugniya ‘ankum fi'atukum syai'aw wa lau kaṡurat, wa anallāha ma‘al-mu'minīn(a).

जँ निर्णय माँगब तँ सत्ते निर्णय अहाँ लग आबि गेल अछि; आ जँ अहाँ रुकि जाइत छी (दूत सँ दुश्मनी), तखन अहाँ लेल से नीक; आ जँ अहाँ घुरब तँ हम सभ अवश्य घुरि आयब (मदद देबय लेल); आ अहाँक सैनिक अहाँक दिस सँ कनिको खतरा केर सामना नहि क' सकैत अछि, भले ओ (सैनिक) संख्या मे पैघ हो। सचमुच अल्लाह मुसलमान के साथ छै।


20

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اَطِيْعُوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَاَنْتُمْ تَسْمَعُوْنَ

yā ayyuhal-lażīna āmanū aṭī‘ullāha wa rasūlahū wa lā tawallau ‘anhu wa antum tasma‘ūn(a).

हे विश्वास करनिहार! अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के आज्ञा मानू, आ हुनका स मुँह नहि मुड़ू, भले अहाँ (उनकर आज्ञा) सुनैत छी,


21

وَلَا تَكُوْنُوْا كَالَّذِيْنَ قَالُوْا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُوْنَۚ

wa lā takūnū kal-lażīna qālū sami‘nā wa hum lā yasma‘ūn(a).

आ ओहि (पाखंडी) जकाँ नहि बनू जे कहैत छथि जे "हम सभ सुनैत छी" मुदा ओ सभ नहि सुनैत अछि (कारण ओकर हृदय एकरा नकारैत अछि)।


22

۞ اِنَّ شَرَّ الدَّوَاۤبِّ عِنْدَ اللّٰهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِيْنَ لَا يَعْقِلُوْنَ

inna syarrad-dawābbi ‘indallāhiṣ-ṣummul-bukmul-lażīna lā ya‘qilūn(a).

सचमुच अल्लाह के नजर में सबसे खराब जीव वू छै जे बहीर आरू गूंगा छै (सत्य के सुनै या नै समझै छै), यानी वू नै समझै छै।


23

وَلَوْ عَلِمَ اللّٰهُ فِيْهِمْ خَيْرًا لَّاَسْمَعَهُمْۗ وَلَوْ اَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوْا وَّهُمْ مُّعْرِضُوْنَ

wa lau ‘alimallāhu fīhim khairal la'asma‘ahum, wa lau asma‘ahum latawallau wa hum mu‘riḍūn(a).

आ जँ अल्लाह केँ बुझल रहैत जे हुनका सभ मे नीक बात छैक तऽ ओ हुनका सभ केँ सुनय मे सक्षम बना दैतथिन। आ जँ अल्लाह हुनका सभ केँ सुनय मे सक्षम बनौने रहितथि त' ओ सभ मुँह घुमा लेने रहितथि, जखन कि ओ सभ घुमि गेल रहितथि।


24

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوا اسْتَجِيْبُوْا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُوْلِ اِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيْكُمْۚ وَاعْلَمُوْٓا اَنَّ اللّٰهَ يَحُوْلُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهٖ وَاَنَّهٗٓ اِلَيْهِ تُحْشَرُوْنَ

yā ayyuhal-lażīna āmanustajībū lillāhi wa lir-rasūli iżā da‘ākum limā yuḥyīkum, wa‘lamū annallāha yaḥūlu bainal-mar'i wa qalbihī wa annahū ilaihi tuḥsyarūn(a).

हे विश्वास करनिहार! अल्लाह आ रसूलुल्लाह के आह्वान के पूरा करू, जखन ओ अहाँ के कोनो एहन चीज पर बजबैत छथि जे अहाँ के जीवन दैत अछि, आ ई जानि लिय जे अल्लाह मनुष्य आ ओकर दिल के बीच एकटा सीमा बनौने छथि आ सचमुच हुनका लेल अहाँ सब जमा होयब।


25

وَاتَّقُوْا فِتْنَةً لَّا تُصِيْبَنَّ الَّذِيْنَ ظَلَمُوْا مِنْكُمْ خَاۤصَّةً ۚوَاعْلَمُوْٓا اَنَّ اللّٰهَ شَدِيْدُ الْعِقَابِ

wattaqū fitnatal lā tuṣībannal-lażīna ẓalamū minkum khāṣṣah(tan), wa‘lamū annallāha syadīdul-‘iqāb(i).

आ एहन यातना सँ अपना केँ सुरक्षित राखू जे केवल अहाँ मे सँ जे अपराधी छथि, हुनका पर नहि पड़य। जानि लिअ जे अल्लाह सजा मे कठोर छथि।


26

وَاذْكُرُوْٓا اِذْ اَنْتُمْ قَلِيْلٌ مُّسْتَضْعَفُوْنَ فِى الْاَرْضِ تَخَافُوْنَ اَنْ يَّتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَاٰوٰىكُمْ وَاَيَّدَكُمْ بِنَصْرِهٖ وَرَزَقَكُمْ مِّنَ الطَّيِّبٰتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُوْنَ

ważkurū iż antum qalīlum mustaḍ‘afūna fil-arḍi takhāfūna ay yatakhaṭṭafakumun-nāsu fa āwākum wa ayyadakum binaṣrihī wa razaqakum minaṭ-ṭayyibāti la‘allakum tasykurūn(a).

आ मोन राखू, जखन अहाँ (मुहाजिरीन) एखनो कम संख्या मे, पृथ्वी (मक्का) पर अत्याचार मे छलहुँ, आ अहाँ केँ डर छल जे (मक्काक) लोक अहाँक अपहरण क’ लेत, तखन ओ अहाँ केँ रहबाक स्थान (मदीना) देलनि आ ओ अहाँ केँ अपन सहायता सँ मजबूत केलनि आ अहाँ केँ नीक रोजी-रोटी देलनि जाहि सँ अहाँ कृतज्ञ होयब।


27

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَخُوْنُوا اللّٰهَ وَالرَّسُوْلَ وَتَخُوْنُوْٓا اَمٰنٰتِكُمْ وَاَنْتُمْ تَعْلَمُوْنَ

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā takhūnullāha war-rasūla wa takhūnū amānātikum wa antum ta‘lamūn(a).

हे विश्वास करनिहार! अल्लाह आ रसूलुल्लाह के साथ धोखा नै करू आ (संगहि) अहाँ के सौंपल गेल भरोसा के संग धोखा नै करू, जखन कि अहाँ सब के पता अछि।


28

وَاعْلَمُوْٓا اَنَّمَآ اَمْوَالُكُمْ وَاَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌ ۙوَّاَنَّ اللّٰهَ عِنْدَهٗٓ اَجْرٌ عَظِيْمٌ ࣖ

wa‘lamū annamā amwālukum wa aulādukum fitnah(tun), wa annallāha ‘indahū ajrun ‘aẓīm(un).

आ ई जानि लिअ जे अहाँक सम्पत्ति आ अहाँक बच्चा मात्र एकटा परीक्षा अछि आ निश्चित रूप सँ अल्लाहक संग एकटा पैघ इनाम अछि।


29

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِنْ تَتَّقُوا اللّٰهَ يَجْعَلْ لَّكُمْ فُرْقَانًا وَّيُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّاٰتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۗ وَاللّٰهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيْمِ

yā ayyuhal-lażīna āmanū in tattaqullāha yaj‘al lakum furqānaw wa yukaffir ‘ankum sayyi'ātikum wa yagfir lakum, wallāhu żul-faḍlil-‘aẓīm(i).

हे विश्वास करनिहार! अगर अहां अल्लाह स डरैत छी त निश्चित रूप स ओ अहां के फुरकान (सही गलत के भेद करय के क्षमता) देताह आ अहां के सब गलती के मेटा देताह आ अहां के (अपन पाप के माफ क देताह)। भगवान् के पास बड़का-बड़का वरदान छै।


30

وَاِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا لِيُثْبِتُوْكَ اَوْ يَقْتُلُوْكَ اَوْ يُخْرِجُوْكَۗ وَيَمْكُرُوْنَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُ ۗوَاللّٰهُ خَيْرُ الْمٰكِرِيْنَ

wa iż yamkuru bikal-lażīna kafarū liyuṡbitūka au yaqtulūka au yukhrijūk(a), wa yamkurūna wa yamkurullāh(u), wallāhu khairul-mākirīn(a).

आ (याद राखू), जखन काफिर (कुरैश) अहाँ (मुहम्मद) के खिलाफ षड्यंत्र रचय के सोचलक जे अहाँ के गिरफ्तार क जेल में राखि देल जाय या अहाँ के मारल जाय, या अहाँ के बाहर क देल जाय। धोखा पैदा केलक आ अल्लाह धोखा के विफल क देलक। अल्लाह छल के सबस नीक बदला लेबय वाला छथिन्ह.


31

وَاِذَا تُتْلٰى عَلَيْهِمْ اٰيٰتُنَا قَالُوْا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَاۤءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هٰذَآ ۙاِنْ هٰذَآ اِلَّآ اَسَاطِيْرُ الْاَوَّلِيْنَ

wa iżā tutlā ‘alaihim āyātunā qālū qad sami‘nā lau nasyā'u laqulnā miṡla hāżā, in hāżā illā asāṭīrul-awwalīn(a).

आ जखन हमरा सभक आयत हुनका सभ केँ पढ़ल गेलनि तखन ओ सभ कहलनि, "सत्ते, हम सभ सुनने छी (एहि तरहक आयत), जँ हम सभ चाहैत छलहुँ तँ निश्चित रूप सँ एहि तरहक किछु पाठ क' सकैत छलहुँ। ई (अल-कुरान) प्राचीन लोकक कथाक अतिरिक्त किछु नहि अछि।"


32

وَاِذْ قَالُوا اللّٰهُمَّ اِنْ كَانَ هٰذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَاَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِّنَ السَّمَاۤءِ اَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ اَلِيْمٍ

wa iż qālullāhumma in kāna hāżā huwal-ḥaqqa min ‘indika fa amṭir ‘alainā ḥijāratam minas-samā'i awi'tinā bi‘ażābin alīm(in).

आ (याद राखू), जखन ओ सभ (मुश्र्क) कहलनि जे, "हे अल्लाह, जँ ई (अल-कुरान) अहाँ सँ सत्य (अववाह) अछि, तखन हमरा सभ पर आसमान सँ पाथर बरसाउ, वा हमरा सभ पर कोनो कष्टदायक सजा आनि दियौक।"


33

وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَاَنْتَ فِيْهِمْۚ وَمَا كَانَ اللّٰهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُوْنَ

wa mā kānallāhu liyu‘ażżibahum wa anta fīhim, wa mā kānallāhu mu‘ażżibahum wa hum yastagfirūn(a).

मुदा अल्लाह हुनका सब के सजा नै देताह, जाबे तक अहाँ (मुहम्मद) हुनका सब में स रहब। आ अल्लाह हुनका सभ केँ (सेहो) सजा नहि देताह, जखन कि ओ सभ (एखनो) माफी मांगैत छथि।


34

وَمَا لَهُمْ اَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللّٰهُ وَهُمْ يَصُدُّوْنَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُوْٓا اَوْلِيَاۤءَهٗۗ اِنْ اَوْلِيَاۤؤُهٗٓ اِلَّا الْمُتَّقُوْنَ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُوْنَ

wa mā lahum allā yu‘ażżibahumullāhu wa hum yaṣuddūna ‘anil-masjidil-ḥarāmi wa mā kānū auliyā'ah(ū), in auliyā'uhū illal-muttaqūna wa lākinna akṡarahum lā ya‘lamūn(a).

आरू अल्लाह ओकरा सिनी क॑ सजा कियैक नै दै छै, भले ही वू (लोक) क॑ भव्य मस्जिद म॑ (जाय) स॑ रोकै छै आरू वू लोगऽ क॑ नै छै जेकरा ओकरा प॑ नियंत्रण रखै के अधिकार छै । एकरा पर नियंत्रण रखबाक अधिकार मात्र ओहि लोक केँ छनि जे पुण्यात्मा छथि, मुदा बेसी केँ ई नहि बुझल छनि।


35

وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِنْدَ الْبَيْتِ اِلَّا مُكَاۤءً وَّتَصْدِيَةًۗ فَذُوْقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُوْنَ

wa mā kāna ṣalātuhum ‘indal-baiti illā mukā'aw wa taṣdiyah(tan), fa żūqul-‘ażāba bimā kuntum takfurūn(a).

आ बैतुल्लाह के चारू कात हुनका लोकनिक नमाज सीटी आ ताली बजबय के अलावा किछु नहि छल. तेँ अपन अविश्वासक कारणेँ जे सजा भेटल अछि तकरा अनुभूति करू।


36

اِنَّ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا يُنْفِقُوْنَ اَمْوَالَهُمْ لِيَصُدُّوْا عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۗفَسَيُنْفِقُوْنَهَا ثُمَّ تَكُوْنُ عَلَيْهِمْ حَسْرَةً ثُمَّ يُغْلَبُوْنَ ەۗ وَالَّذِيْنَ كَفَرُوْٓا اِلٰى جَهَنَّمَ يُحْشَرُوْنَۙ

innal-lażīna kafarū yunfiqūna amwālahum liyaṣuddū ‘an sabīlillāh(i), fa sayunfiqūnahā ṡumma takūnu ‘alaihim ḥasratan ṡumma yuglabūn(a), wal-lażīna kafarū ilā jahannama yuḥsyarūn(a).

सचमुच, जे काफिर करै छै, वू अपनऽ धन-दौलत (लोग) क॑ अल्लाह केरऽ रास्ता स॑ बाधा पहुँचै लेली खर्च करै छै । ओहि धन केँ ओ सभ (आओर) खर्च करताह, तखन स्वयं पछताओत, आ अंततः पराजित भ' जेताह। काफिर सभ नरक मे जमा भ' जेताह,


37

لِيَمِيْزَ اللّٰهُ الْخَبِيْثَ مِنَ الطَّيِّبِ وَيَجْعَلَ الْخَبِيْثَ بَعْضَهٗ عَلٰى بَعْضٍ فَيَرْكُمَهٗ جَمِيْعًا فَيَجْعَلَهٗ فِيْ جَهَنَّمَۗ اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْخٰسِرُوْنَ ࣖ

liyamīzallāhul-khabīṡa minaṭ-ṭayyibi wa yaj‘alal-khabīṡa ba‘ḍahū ‘alā ba‘ḍin fa yarkumahū jamī‘an fa yaj‘alahū fī jahannam(a), ulā'ika humul-khāsirūn(a).

ताकि अल्लाह बुराई के नीक स अलग क बुराई के एक स ऊपर बना सकथि, तखन ओ सब के ढेर में ढेर क देत, आ नरक में फेंक देत।


38

قُلْ لِّلَّذِيْنَ كَفَرُوْٓا اِنْ يَّنْتَهُوْا يُغْفَرْ لَهُمْ مَّا قَدْ سَلَفَۚ وَاِنْ يَّعُوْدُوْا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّتُ الْاَوَّلِيْنَ

qul lil-lażīna kafarū in yantahū yugfar lahum mā qad salaf(a), wa iy ya‘ūdū faqad maḍat sunnatul-awwalīn(a).

जे काफिर करै छै (अबू सुफियान आरू ओकरऽ साथी) स॑ कहै छै, "जदि वू (अपनऽ कुफर स॑) रुकी जाय छै त॑ अल्लाह ओकरऽ पिछला पाप क॑ जरूर माफ करी देतै; आरू अगर वू फेरू वापस (नबी स॑ लड़ै लेली) सही मायने म॑ वापस आबै छै, त॑ (ओकरा प॑) प्राचीन लोगऽ के खिलाफ (अल्लाह केरऽ) सुन्नत लागू होय जाय छै।"


39

وَقَاتِلُوْهُمْ حَتّٰى لَا تَكُوْنَ فِتْنَةٌ وَّيَكُوْنَ الدِّيْنُ كُلُّهٗ لِلّٰهِۚ فَاِنِ انْتَهَوْا فَاِنَّ اللّٰهَ بِمَا يَعْمَلُوْنَ بَصِيْرٌ

wa qātilūhum ḥattā lā takūna fitnatuw wa yakunad-dīnu kulluhū lillāh(i),fa inintahau fa innallāha bimā ya‘malūna baṣīr(un).

आ ता धरि ओकरा सभसँ लड़ू जाबत धरि आब निंदा नहि होयत, आ धर्म असगर अल्लाहक अछि। जँ ओ सभ (कफरसँ) रुकि जाइत छथि तँ निश्चित रूपसँ अल्लाह हुनका सभक काजक सर्वदर्शी छथि ।


40

وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمُوْٓا اَنَّ اللّٰهَ مَوْلٰىكُمْ ۗنِعْمَ الْمَوْلٰى وَنِعْمَ النَّصِيْرُ ۔

wa in tawallau fa‘lamū annallāha maulākum, ni‘mal-maulā wa ni‘man-naṣīr(u).

आ जँ ओ सभ मुँह घुमा लैत छथि तँ ई जानि लिअ जे अल्लाह अहाँक रक्षक छथि, आ ओ सभसँ नीक रक्षक आ सभसँ नीक सहायक छथि ।


41

۞ وَاعْلَمُوْٓا اَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِّنْ شَيْءٍ فَاَنَّ لِلّٰهِ خُمُسَهٗ وَلِلرَّسُوْلِ وَلِذِى الْقُرْبٰى وَالْيَتٰمٰى وَالْمَسٰكِيْنِ وَابْنِ السَّبِيْلِ اِنْ كُنْتُمْ اٰمَنْتُمْ بِاللّٰهِ وَمَآ اَنْزَلْنَا عَلٰى عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعٰنِۗ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ

wa‘lamū annamā ganimtum min syai'in fa anna lillāhi khumusahū wa lir-rasūli wa liżil-qurbā wal-yatāmā wal-masākīni wabnis-sabīli in kuntum āmantum billāhi wa mā anzalnā ‘alā ‘abdinā yaumal-furqāni yaumal-taqal-jam‘ān(i), wallāhu ‘alā kulli syai'in qadīr(un).

आ जानू, सच मे, जे किछु अहाँ केँ युद्धक लूट के रूप मे भेटैत अछि, तखन एक पाँचम हिस्सा अल्लाह, रसूलुल्लाह, रसूलुल्लाह के रिश्तेदार, अनाथ, गरीब आ इब्न सबिल के लेल अछि, (त) जँ अहाँ अल्लाह पर विश्वास करैत छी आ ओहि बात पर विश्वास करैत छी जे हम फुरकान के दिन अपन सेवक (मुहम्मद) के सामने उतारने रही, अर्थात ओहि दिन जखन दुनू सेना के भेंट भेल छल। अल्लाह सब किछु पर सर्वशक्तिमान छथि।


42

اِذْ اَنْتُمْ بِالْعُدْوَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ بِالْعُدْوَةِ الْقُصْوٰى وَالرَّكْبُ اَسْفَلَ مِنْكُمْۗ وَلَوْ تَوَاعَدْتُّمْ لَاخْتَلَفْتُمْ فِى الْمِيْعٰدِۙ وَلٰكِنْ لِّيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُوْلًا ەۙ لِّيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنْۢ بَيِّنَةٍ وَّيَحْيٰى مَنْ حَيَّ عَنْۢ بَيِّنَةٍۗ وَاِنَّ اللّٰهَ لَسَمِيْعٌ عَلِيْمٌۙ

iż antum bil-‘udwatid-dun-yā wa hum bil-‘udwatil-quṣwā war-rakbu asfala minkum, wa lau tawā‘attum lakhtalaftum fil-mī‘ād(i), wa lākil liyaqḍiyallāhu amran kāna maf‘ūlā(n), liyahlika man halaka ‘am bayyinatiw wa yaḥyā may ḥayya ‘am bayyinah(tin), wa innallāha lasamī‘un ‘alīm(un).

(अर्थात) जखन अहाँ लगक घाटीक कात मे छलहुँ आ ओ सभ दूरक घाटीक कात मे छल, आ कारवां अहाँ सँ नीचाँ छल | जँ अहाँ सहमत रहितहुँ (युद्धक दिन निर्धारित करबाक लेल) तँ एहि विषय मे मतभेद रहैत, मुदा अल्लाह एकटा एहन मामला केँ अंजाम देबाक इच्छा रखैत छलाह जकरा पूरा करबाक चाही, अर्थात जे नाश भेल लोक स्पष्ट प्रमाणक संग नाश भ' जाय आ जीवित लोक स्पष्ट प्रमाणक संग जीब'। सचमुच अल्लाह सर्वश्री, सर्वज्ञ छथि।


43

اِذْ يُرِيْكَهُمُ اللّٰهُ فِيْ مَنَامِكَ قَلِيْلًاۗ وَلَوْ اَرٰىكَهُمْ كَثِيْرًا لَّفَشِلْتُمْ وَلَتَنَازَعْتُمْ فِى الْاَمْرِ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ سَلَّمَۗ اِنَّهٗ عَلِيْمٌۢ بِذَاتِ الصُّدُوْرِ

iż yurīkahumullāhu fī manāmika qalīlā(n), wa lau arākahum kaṡīral lafasyiltum wa latanāza‘tum fil-amri wa lākinnallāha sallam(a), innahū ‘alīmum biżātiṣ-ṣudūr(i).

(याद राखू) जखन अल्लाह हुनका सभ केँ अहाँक सपना मे (संख्या मे) देखौलनि तखन ओ सभ कम छलाह। आ जँ अल्लाह हुनका सभ केँ (बहुत संख्या मे) देखा देने रहितथि तँ अहाँ सभ डरि गेल रहितहुँ आ निश्चित रूप सँ अहाँ सभ एहि मामला पर बहस करितहुँ, मुदा अल्लाह अहाँ सभ केँ बचा लेलक अछि। सचमुच अल्लाह जनैत छथि जे अहाँक दिल मे की अछि।


44

وَاِذْ يُرِيْكُمُوْهُمْ اِذِ الْتَقَيْتُمْ فِيْٓ اَعْيُنِكُمْ قَلِيْلًا وَّيُقَلِّلُكُمْ فِيْٓ اَعْيُنِهِمْ لِيَقْضِيَ اللّٰهُ اَمْرًا كَانَ مَفْعُوْلًا ۗوَاِلَى اللّٰهِ تُرْجَعُ الْاُمُوْرُ ࣖ

wa iż yurīkumūhum iżil-taqaitum fī a‘yunikum qalīlaw wa yuqallilukum fī a‘yunihim liyaqḍiyallāhu amran kāna maf‘ūlā(n), wa ilallāhi turja‘ul-umūr(u).

आरू जब॑ अल्लाह तोरा सिनी क॑ ओकरा सिनी क॑ देखैलकै, जब॑ तोहें ओकरा सिनी स॑ मिललऽ छेलै जेतना कम तोरऽ आँख देखै छेलै, आरू वू तोरा जेतना कम देखाबै छेलै, वू ऐसनऽ छेलै कि अल्लाह एगो ऐसनऽ मामला क॑ अंजाम देना चाहै छेलै जेकरा पूरा करना छेलै । सब बात अल्लाह के वापस भ जाइत अछि।


45

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا لَقِيْتُمْ فِئَةً فَاثْبُتُوْا وَاذْكُرُوا اللّٰهَ كَثِيْرًا لَّعَلَّكُمْ تُفْلِحُوْنَۚ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā laqītum fi'atan faṡbutū ważkurullāha kaṡīral la‘allakum tufliḥūn(a).

हे विश्वास करनिहार! अगर सैनिक (दुश्मन) स भेंट होइत अछि त मजबूत रहू आ अल्लाह के बहुत (अधिकार आ नमाज) कहू (नाम) ताकि अहाँ भाग्यशाली रहब।


46

وَاَطِيْعُوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ وَلَا تَنَازَعُوْا فَتَفْشَلُوْا وَتَذْهَبَ رِيْحُكُمْ وَاصْبِرُوْاۗ اِنَّ اللّٰهَ مَعَ الصّٰبِرِيْنَۚ

wa aṭī‘ullāha wa rasūlahū wa lā tanāza‘ū fa tafsyalū wa tażhaba rīḥukum waṣbirū, innallāha ma‘aṣ-ṣābirīn(a).

आ अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के बात मानू आ विवाद नै करू, जाहि स अहाँ डरैत छी आ अहाँक ताकत गायब भ जाइत अछि आ धैर्य रखैत छी। सचमुच अल्लाह धैर्यवान लोकक संग छथि।


47

وَلَا تَكُوْنُوْا كَالَّذِيْنَ خَرَجُوْا مِنْ دِيَارِهِمْ بَطَرًا وَّرِئَاۤءَ النَّاسِ وَيَصُدُّوْنَ عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۗوَاللّٰهُ بِمَايَعْمَلُوْنَ مُحِيْطٌ

wa lā takūnū kal-lażīna kharajū min diyārihim baṭaraw wa ri'ā'an-nāsi wa yaṣuddūna ‘an sabīlillāh(i), wallāhu bimā ya‘malūna muḥīṭ(un).

आ ओहि लोक जकाँ नहि बनू जे अपन सासुर छोड़ि अहंकार महसूस करैत छथि आ लोक (रिया) द्वारा प्रशंसा करय चाहैत छथि आ (लोक) केँ अल्लाह केर मार्ग सँ बाधित करैत छथि। अल्लाह हुनकर सब काज के ढक दैत छथिन


48

وَاِذْ زَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطٰنُ اَعْمَالَهُمْ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ الْيَوْمَ مِنَ النَّاسِ وَاِنِّيْ جَارٌ لَّكُمْۚ فَلَمَّا تَرَاۤءَتِ الْفِئَتٰنِ نَكَصَ عَلٰى عَقِبَيْهِ وَقَالَ اِنِّيْ بَرِيْۤءٌ مِّنْكُمْ اِنِّيْٓ اَرٰى مَا لَا تَرَوْنَ اِنِّيْٓ اَخَافُ اللّٰهَ ۗوَاللّٰهُ شَدِيْدُ الْعِقَابِ ࣖ

wa iż zayyana lahumusy-syaiṭānu a‘mālahum wa qāla lā gāliba lakumul-yauma minan-nāsi wa innī jārul lakum, falammā tarā'atil-fi'atāni nakaṣa ‘alā ‘aqibaihi wa qāla innī barī'um minkum innī arā mā lā tarauna innī akhāfullāh(a), wallāhu syadīdul-‘iqāb(i).

आ (याद करू) जखन शैतान हुनका सभक कर्म (पाप) केँ सुन्दर बुझेलक आ कहलक, "आइ अहाँ केँ कियो (व्यक्ति) नहि हरा सकैत अछि, आ सचमुच, हम अहाँक सहायक छी।" अस्तु, जखन दुनू सेना एक दोसरा केँ (सामने-सामने) देखि लेलक त' शैतान पाछू घुमि क' कहलक, "सत्ते हम अहाँ सँ अलग भ' गेल छी; हम ओ देखि सकैत छी जे अहाँ नहि देखि सकैत छी; सचमुच हम अल्लाह सँ डरैत छी।" अल्लाह सजा मे बहुत कठोर छथि।


49

اِذْ يَقُوْلُ الْمُنٰفِقُوْنَ وَالَّذِيْنَ فِيْ قُلُوْبِهِمْ مَّرَضٌ غَرَّ هٰٓؤُلَاۤءِ دِيْنُهُمْۗ وَمَنْ يَّتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ فَاِنَّ اللّٰهَ عَزِيْزٌ حَكِيْمٌ

iż yaqūlul-munāfiqūna wal-lażīna fī qulūbihim maraḍun garra hā'ulā'i dīnuhum, wa may yatawakkal ‘alallāhi fa innallāha ‘azīzun ḥakīm(un).

(याद राखू), जखन पाखंडी आ जिनकर हृदय मे बीमारी छनि ओ कहैत छथि जे "ओ सभ (विश्वासी) अपन धर्म मे धोखा खा गेल छथि |" (अल्लाह कहैत छथि) "जे कियो अल्लाह पर भरोसा रखैत अछि, ओकरा ई जानि लिअ जे अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वबुद्धिमान छथि।"


50

وَلَوْ تَرٰٓى اِذْ يَتَوَفَّى الَّذِيْنَ كَفَرُوا الْمَلٰۤىِٕكَةُ يَضْرِبُوْنَ وُجُوْهَهُمْ وَاَدْبَارَهُمْۚ وَذُوْقُوْا عَذَابَ الْحَرِيْقِ

wa lau tarā iż yatawaffal-lażīna kafarul-malā'ikatu yaḍribūna wujūhahum wa adbārahum, wa żūqū ‘ażābal-ḥarīq(i).

आ जँ अहाँ देखलहुँ जे जखन स्वर्गदूत सभ अविश्वास करयवला सभक जान ल' लेलक, ओकर चेहरा आ पीठ पर प्रहार करैत (आ कहैत) "अहाँ सभ केँ नरकक जरैत यातनाक स्वाद लिअ।"


51

ذٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ اَيْدِيْكُمْ وَاَنَّ اللّٰهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيْدِۙ

Żālika bimā qaddamat aidīkum wa annallāha laisa biẓallāmil lil-‘abīd(i).

ई अहाँक अपन हाथक काजक कारणेँ अछि। आ सचमुच अल्लाह अपन सेवक पर अन्याय नहि करैत छथि,


52

كَدَأْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِهِمْۗ كَفَرُوْا بِاٰيٰتِ اللّٰهِ فَاَخَذَهُمُ اللّٰهُ بِذُنُوْبِهِمْۗ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ شَدِيْدُ الْعِقَابِ

kada'bi āli fir‘aun(a), wal-lażīna min qablihim, kafarū bi'āyātillāhi fa akhażahumullāhu biżunūbihim, innallāha qawiyyun syadīdul-‘iqāb(i).

(हुनकर सभक स्थिति) फिरौनक अनुयायी आ हुनका सभ सँ पहिने के लोकक स्थिति जकाँ छल | ओ सब अल्लाह के आयत के नकारैत छल, ताहि लेल अल्लाह हुनका सब के पाप के सजा देलखिन। सचमुच अल्लाह सर्वशक्तिमान छथि आ हुनकर सजा बहुत कठोर अछि।


53

ذٰلِكَ بِاَنَّ اللّٰهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِّعْمَةً اَنْعَمَهَا عَلٰى قَوْمٍ حَتّٰى يُغَيِّرُوْا مَا بِاَنْفُسِهِمْۙ وَاَنَّ اللّٰهَ سَمِيْعٌ عَلِيْمٌۙ

Żālika bi'annallāha lam yaku mugayyiran ni‘matan an‘amahā ‘alā qaumin ḥattā yugayyirū mā bi'anfusihim, wa annallāha samī‘un ‘alīm(un).

एकरऽ कारण छै कि अल्लाह कोनो एहसान क॑ नै बदलतै जे हुनी एगो लोगऽ प॑ देल॑ छै, जब॑ तलक कि वू लोगऽ न॑ जे कुछ खुद म॑ छै ओकरा नै बदली दै छै । सचमुच अल्लाह सर्वश्रवण, सर्वज्ञ,


54

كَدَأْبِ اٰلِ فِرْعَوْنَۙ وَالَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِهِمْۚ كَذَّبُوْا بِاٰيٰتِ رَبِّهِمْ فَاَهْلَكْنٰهُمْ بِذُنُوْبِهِمْ وَاَغْرَقْنَآ اٰلَ فِرْعَوْنَۚ وَكُلٌّ كَانُوْا ظٰلِمِيْنَ

kada'bi āli fir‘aun(a), wal-lażīna min qablihim, każżabū bi'āyāti rabbihim fa ahlaknāhum biżunūbihim wa agraqnā āla fir‘aun(a), wa kullun kānū ẓālimīn(a).

(हुनकर सभक स्थिति) फिरौनक अनुयायी आ हुनका सभ सँ पहिने के लोकक स्थिति जकाँ छल | ओ सभ अपन प्रभुक आयत सभ केँ नकारलनि, तेँ हम सभ हुनका सभक पापक कारणेँ हुनका सभ केँ नष्ट कऽ देलियनि आ हम सभ फिरौन आ हुनकर अनुयायी सभ केँ डूबा देलियनि; कारण ओ सभ अन्यायी लोक छथि।


55

اِنَّ شَرَّ الدَّوَاۤبِّ عِنْدَ اللّٰهِ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُوْنَۖ

inna syarrad-dawābbi ‘indallāhil-lażīna kafarū fahum lā yu'minūn(a).

सचमुच अल्लाह के नजर में सबस खराब जीव काफिर छैथ, कियाक त ओ सब विश्वास नै करैत छैथ।


56

الَّذِيْنَ عَاهَدْتَّ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنْقُضُوْنَ عَهْدَهُمْ فِيْ كُلِّ مَرَّةٍ وَّهُمْ لَا يَتَّقُوْنَ

allażīna ‘āhatta minhum ṡumma yanquḍūna ‘ahdahum fī kulli marratiw wa hum lā yattaqūn(a).

(अर्थात) जे अहाँ सँ कोनो वाचा सँ बान्हल छथि, मुदा हर बेर जखन कोनो वादा करैत छथि तखन ओ अपन वादा तोड़ैत छथि, आ (अल्लाह) सँ डरैत नहि छथि |


57

فَاِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِى الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَّنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُوْنَ

fa immā taṡqafannahum fil-ḥarbi fa syarrid bihim man khalfahum la‘allahum yażżakkarūn(a).

त जँ अहाँ (मुहम्मद) हुनका सभ केँ युद्ध मे पराजित क' दैत छी त' हुनका सभ केँ (सफाया) क' पाछूक लोक केँ छिड़िया दियौक, जाहि सँ ओ सबक सीखय।


58

وَاِمَّا تَخَافَنَّ مِنْ قَوْمٍ خِيَانَةً فَانْۢبِذْ اِلَيْهِمْ عَلٰى سَوَاۤءٍۗ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْخَاۤىِٕنِيْنَ ࣖ

wa immā takhāfanna min qaumin khiyānatan fambiż ilaihim ‘alā sawā'(in), innallāha lā yuḥibbul-khā'inīn(a).

आ जँ अहाँ (मुहम्मद) कोनो समूह सँ विश्वासघात (घटित) सँ चिंतित छी तखन ईमानदार तरीका सँ हुनका सभ केँ समझौता वापस करू। सचमुच अल्लाह के विश्वासघात करय वाला लोक नीक नहिं लगैत छनि


59

وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا سَبَقُوْاۗ اِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُوْنَ

wa lā yaḥsabannal-lażīna kafarū sabaqū, innahum lā yu‘jizūn(a).

आ काफिर ई नहि सोचय जे ओ (अल्लाह के शक्ति सँ) बचि जायत; सचमुच, ओ (अल्लाह) के कमजोर नहि क सकैत छथि |


60

وَاَعِدُّوْا لَهُمْ مَّا اسْتَطَعْتُمْ مِّنْ قُوَّةٍ وَّمِنْ رِّبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُوْنَ بِهٖ عَدُوَّ اللّٰهِ وَعَدُوَّكُمْ وَاٰخَرِيْنَ مِنْ دُوْنِهِمْۚ لَا تَعْلَمُوْنَهُمْۚ اَللّٰهُ يَعْلَمُهُمْۗ وَمَا تُنْفِقُوْا مِنْ شَيْءٍ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ يُوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُوْنَ

wa a‘iddū lahum mastaṭa‘tum min quwwatiw wa mir ribāṭil-khaili turhibūna bihī ‘aduwwallāhi wa ‘aduwwakum wa ākharīna min dūnihim, lā ta‘lamūnahum, allāhu ya‘lamuhum, wa mā tunfiqū min syai'in fī sabīlillāhi yuwaffa ilaikum wa antum lā tuẓlamūn(a).

आ अपन समस्त क्षमताक संग तैयारी करू जे अहाँ लग जे ताकत अछि आ घुड़सवार सँ हुनका सभक सामना करी जे अल्लाहक दुश्मन, अहाँक दुश्मन आ हुनका छोड़ि दोसर लोक केँ रोकि सकैत अछि जिनका अहाँ नहि जनैत छी; मुदा अल्लाह एकरा जनैत छथि। अल्लाह के रास्ता में जे किछु खर्च करब से निश्चित रूप स अहाँ के पर्याप्त रूप स चुका जायत आ अहाँ स अन्याय (हानि) नै होयत।


61

۞ وَاِنْ جَنَحُوْا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ ۗاِنَّهٗ هُوَ السَّمِيْعُ الْعَلِيْمُ

wa in janaḥū lis-salmi fajnaḥ lahā wa tawakkal ‘alallāh(i), innahū huwas-samī‘ul-‘alīm(u).

मुदा जँ ओ सभ शांति दिस झुकल छथि तँ ओकरा स्वीकार करू आ अल्लाह पर भरोसा राखू। सचमुच, ओ सर्वश्रवण, सर्वज्ञ छथि।


62

وَاِنْ يُّرِيْدُوْٓا اَنْ يَّخْدَعُوْكَ فَاِنَّ حَسْبَكَ اللّٰهُ ۗهُوَ الَّذِيْٓ اَيَّدَكَ بِنَصْرِهٖ وَبِالْمُؤْمِنِيْنَۙ

wa iy yurīdū ay yakhda‘ūka fa inna ḥasbakallāh(u), huwal-lażī ayyadaka binaṣrihī wa bil-mu'minīn(a).

आ जँ ओ सभ अहाँ सभ केँ धोखा देबय चाहैत छथि तँ सचमुच अल्लाह अहाँ सभक लेल पर्याप्त छथि। ओ वैह छथि जे अपन सहायता सँ आ विश्वासी सभक सहयोग सँ अहाँ केँ सशक्त बनबैत छथि |


63

وَاَلَّفَ بَيْنَ قُلُوْبِهِمْۗ لَوْاَنْفَقْتَ مَا فِى الْاَرْضِ جَمِيْعًا مَّآ اَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوْبِهِمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ اَلَّفَ بَيْنَهُمْۗ اِنَّهٗ عَزِيْزٌ حَكِيْمٌ

wa allafa baina qulūbihim, lau anfaqta mā fil-arḍi jamī‘am mā allafta baina qulūbihim wa lākinnallāha allafa bainahum, innahū ‘azīzun ḥakīm(un).

आ ओ (अल्लाह) हुनकर दिल (विश्वासी) के एकजुट करैत छथि | भले ही तोहें धरती पर सब (धन) खर्च करितियै, लेकिन तोहें ओकरऽ दिल के एकजुट नै करी सकितियै, लेकिन अल्लाह न॑ ओकरऽ दिल के एकजुट करी देल॑ छै । सचमुच, ओ सर्वशक्तिमान, सर्वबुद्धिमान छथि।


64

يٰٓاَيُّهَا النَّبِيُّ حَسْبُكَ اللّٰهُ وَمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِنِيْنَ ࣖ

yā ayyuhan-nabiyyu ḥasbukallāhu wa manittaba‘aka minal-mu'minīn(a).

हे नबी (मुहम्मद) ! अल्लाह अहाँक लेल आ अहाँक पालन करय बला मुसलमानक लेल (रक्षक बनय लेल) पर्याप्त छथि।


65

يٰٓاَيُّهَا النَّبِيُّ حَرِّضِ الْمُؤْمِنِيْنَ عَلَى الْقِتَالِۗ اِنْ يَّكُنْ مِّنْكُمْ عِشْرُوْنَ صٰبِرُوْنَ يَغْلِبُوْا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَّكُنْ مِّنْكُمْ مِّائَةٌ يَّغْلِبُوْٓا اَلْفًا مِّنَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُوْنَ

yā ayyuhan-nabiyyu ḥarriḍil-mu'minīna ‘alal-qitāl(i), iy yakum minkum ‘isyrūna ṣabirūna yaglibū mi'atain(i), wa iy yakum minkum mi'atuy yaglibū alfam minal-lażīna kafarū bi'annahum qaumul lā yafqahūn(a).

हे नबी (मुहम्मद) ! विश्वासी के युद्ध में उकसाओ। जँ अहाँ सभ मे बीस गोट अडिग आदमी रहत तँ ओ सभ दू सय केँ अवश्य पराजित करत। आ जँ अहाँ सभ मे एक सय (रोगी) रहत तँ ओ सभ काफिर मे सँ हजार केँ जरूर पराजित करत, कारण काफिर एकटा एहन लोक अछि जे नहि बुझैत अछि।


66

اَلْـٰٔنَ خَفَّفَ اللّٰهُ عَنْكُمْ وَعَلِمَ اَنَّ فِيْكُمْ ضَعْفًاۗ فَاِنْ يَّكُنْ مِّنْكُمْ مِّائَةٌ صَابِرَةٌ يَّغْلِبُوْا مِائَتَيْنِۚ وَاِنْ يَّكُنْ مِّنْكُمْ اَلْفٌ يَّغْلِبُوْٓا اَلْفَيْنِ بِاِذْنِ اللّٰهِ ۗوَاللّٰهُ مَعَ الصّٰبِرِيْنَ

al'āna khaffafallāhu ‘ankum wa ‘alima anna fīkum ḍa‘fā(n), fa iy yakum minkum mi'atun ṣābiratuy yaglibū mi'atain(i), wa iy yakum minkum alfuy yaglibū alfaini bi'iżnillāh(i), wallāhu ma‘aṣ-ṣābirīn(a).

आब अल्लाह अहाँ सभक लेल काज आसान क' देलनि अछि, ई जानि जे अहाँ मे कमजोरी अछि। तेँ जँ अहाँ सभ मे एक सय धैर्यवान रहत तँ ओ सभ दू सय पर विजय प्राप्त करत। आ जँ अहाँ सभ मे एक हजार रहत तँ अल्लाहक अनुमति सँ दू हजार पर विजय प्राप्त करत। अल्लाह धैर्यवानक संग छथि।


67

مَاكَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَّكُوْنَ لَهٗٓ اَسْرٰى حَتّٰى يُثْخِنَ فِى الْاَرْضِۗ تُرِيْدُوْنَ عَرَضَ الدُّنْيَاۖ وَاللّٰهُ يُرِيْدُ الْاٰخِرَةَۗ وَاللّٰهُ عَزِيْزٌحَكِيْمٌ

mā kāna linabiyyin ay yakūna lahū asrā ḥattā yuṡkhina fil-arḍ(i), turīdūna ‘araḍad-dun-yā, wallāhu yurīdul-ākhirah(ta), wallāhu ‘azīzun ḥakīm(un).

कोनो भविष्यवक्ता के लेल ई उचित नै होयत जे ओ पृथ्वी पर अपन दुश्मन के अपंग बनाबय स पहिने कैदी रहय। अहाँ सांसारिक सम्पत्ति के इच्छा रखैत छी जखन कि अल्लाह परलोक (अहाँक लेल) मे (इनाम) चाहैत छथि | अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी छथि।


68

لَوْلَاكِتٰبٌ مِّنَ اللّٰهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيْمَآ اَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيْمٌ

lau lā kitābum minallāhi sabaqa lamassakum fīmā akhażtum ‘ażābun ‘aẓīm(un).

अगर अल्लाह के तरफ स पहिने कोनो फरमान नै रहैत त अहाँ के जे (फिरौती) लेलौं ओकर कारण अहाँ के बहुत पैघ यातना के मारल गेल रहैत।


69

فَكُلُوْا مِمَّاغَنِمْتُمْ حَلٰلًا طَيِّبًاۖ وَّاتَّقُوا اللّٰهَ ۗاِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

fa kulū mimmā ganimtum ḥalālan ṭayyibā(n), wattaqullāh(a), innallāha gafūrur raḥīm(un).

तेँ युद्धक किछु लूट जे अहाँ सभ केँ भेटल अछि, ओहि भोजनक रूप मे जे जायज आ नीक हो, खाउ आ अल्लाह सँ डरू। सचमुच अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


70

يٰٓاَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِّمَنْ فِيْٓ اَيْدِيْكُمْ مِّنَ الْاَسْرٰٓىۙ اِنْ يَّعْلَمِ اللّٰهُ فِيْ قُلُوْبِكُمْ خَيْرًا يُّؤْتِكُمْ خَيْرًا مِّمَّآ اُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۗ وَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ ࣖ

yā ayyuhan-nabiyyu qul liman fī aidīkum minal-asrā, iy ya‘lamillāhu fī qulūbikum khairay yu'tikum khairam mimmā ukhiża minkum wa yagfir lakum, wallāhu gafūrur raḥīm(un).

हे नबी (मुहम्मद) ! हाथ में युद्धबंदी सब स कहू, "जँ अल्लाह के पता रहैत जे अहाँ सब के दिल में भलाई छै त ओ अहाँ सब स जे किछु छीन लेल गेल छल ओहि स नीक किछु जरूर द दैतथि आ अहाँ सब के माफ क दैतथि।" अल्लाह क्षमाशील, परम दयालु छथि।


71

وَاِنْ يُّرِيْدُوْا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللّٰهَ مِنْ قَبْلُ فَاَمْكَنَ مِنْهُمْ وَاللّٰهُ عَلِيْمٌ حَكِيْمٌ

wa iy yurīdū khiyānataka faqad khānullāha min qablu fa amkana minhum wallāhu ‘alīmun ḥakim(un).

लेकिन अगर वू (कैदी) तोरा (मुहम्मद) के साथ धोखा करना चाहै छै, त॑ सचमुच ओकरा स॑ पहल॑ वू अल्लाह के साथ धोखा करी चुकलऽ छै, त॑ वू तोरा ओकरा प॑ अधिकार द॑ देल॑ छै । अल्लाह सर्वज्ञ, सर्वबुद्धिमान छथि।


72

اِنَّ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَالَّذِيْنَ اٰوَوْا وَّنَصَرُوْٓا اُولٰۤىِٕكَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَاۤءُ بَعْضٍۗ وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَلَمْ يُهَاجِرُوْا مَا لَكُمْ مِّنْ وَّلَايَتِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ حَتّٰى يُهَاجِرُوْاۚ وَاِنِ اسْتَنْصَرُوْكُمْ فِى الدِّيْنِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ اِلَّا عَلٰى قَوْمٍۢ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِّيْثَاقٌۗ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُوْنَ بَصِيْرٌ

innal-lażīna āmanū wa hājarū wa jāhadū bi'amwālihim wa anfusihim fī sabīlillāhi wal-lażīna āwaw wa naṣarū ulā'ika ba‘ḍuhum auliyā'u ba‘ḍ(in), wal-lażīna āmanū wa lam yuhājirū mā lakum miw walāyatihim min syai'in ḥattā yuhājirū, wa inistanṣarūkum fid-dīni fa ‘alaikumun naṣru illā ‘alā qaumim bainakum wa bainahum mīṡāq(un), wallāhu bimā ta‘malūna baṣīr(un).

सचमुच, जे लोग विश्वास करै छै आरू प्रवास करै छै आरू अपनऽ धन आरू आत्मा के साथ अल्लाह के रास्ता में प्रयास करै छै आरू जे (मुहाजिरीन के) आश्रय दै छै आरू सहायता करै छै, वू एक-दूसरा के रक्षा करै छै। आ (जेकरा लेल) जे विश्वास करैत छथि मुदा प्रवास नहि केने छथि, हुनका सभक रक्षा करबाक अहाँक कोनो दायित्व नहि अछि, जाबत धरि ओ प्रवास नहि करैत छथि | (मुदा) जँ ओ सभ अहाँसँ धर्म (रक्षा)मे मददि माँगैत छथि तँ अहाँकेँ ओहि लोककेँ छोड़ि मददि देबाक बाध्यता अछि जे अहाँ आ हुनका सभक बीच समझौता कएने छथि। आ अल्लाह अहाँक काजक सर्वदर्शी छथि।


73

وَالَّذِيْنَ كَفَرُوْا بَعْضُهُمْ اَوْلِيَاۤءُ بَعْضٍۗ اِلَّا تَفْعَلُوْهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِى الْاَرْضِ وَفَسَادٌ كَبِيْرٌۗ

wal-lażīna kafarū ba‘ḍuhum auliyā'u ba‘ḍ(in), illā taf‘alūhu takun fitnatun fil-arḍi wa fasādun kabīr(un).

आ जे अविश्वास करैत अछि, ओहि मे सँ किछु गोटे दोसरक रक्षा करैत छथि । अगर अल्लाह के आज्ञा (एक दोसरा के रक्षा) के काज नै करब त धरती पर अराजकता आ पैघ भ्रष्टाचार होयत।


74

وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَالَّذِيْنَ اٰوَوْا وَّنَصَرُوْٓا اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْمُؤْمِنُوْنَ حَقًّاۗ لَهُمْ مَّغْفِرَةٌ وَّرِزْقٌ كَرِيْمٌ

wal-lażīna āmanū wa hājarū wa jāhadū fī sabīlillāhi wal-lażīna āwaw wa naṣarū ulā'ika humul-mu'minūna ḥaqqā(n), lahum magfirtuw wa rizqun karīm(un).

आरू जे लोग विश्वास करै छै आरू प्रवास करै छै आरू अल्लाह के रास्ता पर प्रयास करै छै, आरू जे लोग (मुहाजिरीन के) आश्रय दै छै आरू सहायता करै छै, वू सच्चा मुसलमान छै। क्षमा आ उदात्त पोषण (अनुग्रह) प्राप्त करैत छथि |


75

وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا مِنْۢ بَعْدُ وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا مَعَكُمْ فَاُولٰۤىِٕكَ مِنْكُمْۗ وَاُولُوا الْاَرْحَامِ بَعْضُهُمْ اَوْلٰى بِبَعْضٍ فِيْ كِتٰبِ اللّٰهِ ۗاِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيْمٌ ࣖ

wal-lażīna āmanū mim ba‘du wa hājarū wa jāhadū ma‘akum fa ulā'ika minkum, wa ulul-arḥāmi ba‘ḍuhum aulā biba‘ḍin fī kitābillāh(i), innallāha bikulli syai'in ‘alīm(un).

आ जे ओकर बाद विश्वास केलक, फेर प्रवास केलक आ अहाँक संग जेहाद लड़लक, ओ सब अहाँक ग्रुप मे अछि। किछु लोक जे रिश्तेदार छथि हुनका अल्लाह के किताब के अनुसार एक दोसरा के प्रति (जे रिश्तेदार नहिं छथि हुनका सं बेसी) बेसी अधिकार छनि. सचमुच अल्लाह सब किछु के सर्वज्ञ छैथ।