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(सच्चा इस्लाम)

Q.S अल-मुजादिलाह (اَلْمُجَادِلَة) - 22 पदों की संख्या

(मुकदमा)

Qari

Murottal Audio

1

قَدْ سَمِعَ اللّٰهُ قَوْلَ الَّتِيْ تُجَادِلُكَ فِيْ زَوْجِهَا وَتَشْتَكِيْٓ اِلَى اللّٰهِ ۖوَاللّٰهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَاۗ اِنَّ اللّٰهَ سَمِيْعٌۢ بَصِيْرٌ

qad sami‘allāhu qaulal-latī tujādiluka fī zaujihā wa tasytakī ilallāh(i), wallāhu yasma‘u taḥāwurakumā, innallāha samī‘um baṣīr(un).

सचमुच, अल्लाह ओहि महिला के बात सुनने छथि जे अहाँ (मुहम्मद) के खिलाफ अपन पति के बारे में मुकदमा दायर केने छलीह, आ (मामला) अल्लाह सं शिकायत केने छलीह, आ अल्लाह अहाँ दुनू के बीच के गप्प सुनने छलाह. सचमुच अल्लाह सर्वश्रवण, सब देखनिहार छथि।


2

اَلَّذِيْنَ يُظٰهِرُوْنَ مِنْكُمْ مِّنْ نِّسَاۤىِٕهِمْ مَّا هُنَّ اُمَّهٰتِهِمْۗ اِنْ اُمَّهٰتُهُمْ اِلَّا الّٰۤـِٔيْ وَلَدْنَهُمْۗ وَاِنَّهُمْ لَيَقُوْلُوْنَ مُنْكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُوْرًاۗ وَاِنَّ اللّٰهَ لَعَفُوٌّ غَفُوْرٌ

allażīna yuẓāhirūna minkum min nisā'ihim mā hunna ummahātihim, in ummahātuhum illal-lā'ī waladnahum, wa innahum layaqūlūna munkaram minal-qauli wa zūrā(n), wa innallāha la‘afuwwun gafūr(un).

अहाँ सभ मे जे अपन पत्नीक लेल जिहार करैत छथि, (अपन पत्नी केँ अपन माय मानैत छथि, मुदा) हुनकर पत्नी हुनकर माय नहि छथि | हुनकर माय त बस ओ महिला छथि जे हुनका सब के जन्म देलखिन। आ सत्ते ओ सभ सत्ते एकटा एहन शब्द बाजल छथि जे गलत आ झूठ अछि। आ सचमुच अल्लाह क्षमाशील, परम क्षमाशील छथि।


3

وَالَّذِيْنَ يُظٰهِرُوْنَ مِنْ نِّسَاۤىِٕهِمْ ثُمَّ يَعُوْدُوْنَ لِمَا قَالُوْا فَتَحْرِيْرُ رَقَبَةٍ مِّنْ قَبْلِ اَنْ يَّتَمَاۤسَّاۗ ذٰلِكُمْ تُوْعَظُوْنَ بِهٖۗ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُوْنَ خَبِيْرٌ

wal-lażīna yuẓāhirūna min nisā'ihim ṡumma ya‘ūdūna limā qālū fa taḥrīru raqabatim min qabli ay yatamāssā, żālikum tū‘aẓūna bih(ī), wallāhu bimā ta‘malūna khabīr(un).

आ जे अपन पत्नी पर जिहार करैत छथि, तखन जे कहने छथि से वापस ल' लैत छथि, तखन (ओकरा सभ केँ) पति-पत्नी दुनूक मिश्रण सँ पहिने एकटा दास केँ मुक्त करबाक चाही। ई अहाँ के सिखाओल गेल छल, आ अल्लाह अहाँ के जे काज करैत छी ताहि मे सावधान रहैत छथि।


4

فَمَنْ لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِنْ قَبْلِ اَنْ يَّتَمَاۤسَّاۗ فَمَنْ لَّمْ يَسْتَطِعْ فَاِطْعَامُ سِتِّيْنَ مِسْكِيْنًاۗ ذٰلِكَ لِتُؤْمِنُوْا بِاللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖۗ وَتِلْكَ حُدُوْدُ اللّٰهِ ۗوَلِلْكٰفِرِيْنَ عَذَابٌ اَلِيْمٌ

famal lam yajid faṣiyāmu syahraini mutatābi‘aini min qabli ay yatamāssā, famal lam yastaṭi‘ fa iṭ‘āmu sittīna miskīnā(n), żālika litu'minū billāhi wa rasūlih(ī), wa tilka ḥudūdullāh(i), wa lil-kāfirīna ‘ażābun alīm(un).

तेँ जे (अपन दास केँ मुक्त) नहि क' सकैत अछि, तखन (ओकरा) दुनूक मिश्रण सँ पहिने लगातार दू मास धरि उपवास करबाक चाही। मुदा जकर सामर्थ्य नहि छैक, तखन साठि गरीब लोक केँ खुआबय (अवश्य)। अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह पर अहाँ सब एहि तरहे विश्वास करैत छी। ई सब अल्लाह के नियम छै, आरू जे एकरऽ अवहेलना करतै ओकरा बहुत कष्टदायक सजा मिलतै ।


5

اِنَّ الَّذِيْنَ يُحَاۤدُّوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ كُبِتُوْا كَمَا كُبِتَ الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِهِمْ وَقَدْ اَنْزَلْنَآ اٰيٰتٍۢ بَيِّنٰتٍۗ وَلِلْكٰفِرِيْنَ عَذَابٌ مُّهِيْنٌۚ

innal-lażīna yuḥāddūnallāha wa rasūlahū kubitū kamā kubital-lażīna min qablihim wa qad anzalnā āyātim bayyināt(in), wa lil-kāfirīna ‘ażābum muhīn(un).

सचमुच अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के विरोध करय वाला के जरूर अपमानित कयल जायत जेना हुनका सब स पहिने आयल छल। आ सचमुच, हम स्पष्ट प्रमाण उजागर केने छी। आ जे एकरा नकारत ओकरा अपमानजनक सजा भेटतैक।


6

يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللّٰهُ جَمِيْعًا فَيُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوْاۗ اَحْصٰىهُ اللّٰهُ وَنَسُوْهُۗ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيْدٌ ࣖ

yauma yab‘aṡuhumullāhu jamī‘an fa yunabbi'uhum bimā ‘amilū, aḥṣāhullāhu wa nasūh(u), wallāhu ‘alā kulli syai'in syahīd(un).

ओहि दिन परमेश् वर सभ केँ जीबि उठौलनि, आ ओ सभ हुनका सभ केँ कहलथिन। अल्लाह हुनका सब के (ओहि सब नीक काज के) गिनैत छथि, भले ओ सब बिसरि गेल होथि। आ अल्लाह सब किछुक गवाह छथि।


7

اَلَمْ تَرَ اَنَّ اللّٰهَ يَعْلَمُ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَمَا فِى الْاَرْضِۗ مَا يَكُوْنُ مِنْ نَّجْوٰى ثَلٰثَةٍ اِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ اِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَآ اَدْنٰى مِنْ ذٰلِكَ وَلَآ اَكْثَرَ اِلَّا هُوَ مَعَهُمْ اَيْنَ مَا كَانُوْاۚ ثُمَّ يُنَبِّئُهُمْ بِمَا عَمِلُوْا يَوْمَ الْقِيٰمَةِۗ اِنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيْمٌ

alam tara annallāha ya‘lamu mā fis-samāwāti wa mā fil-arḍ(i), mā yakūnu min najwā ṡalāṡatin illā huwa rābi‘uhum wa lā khamsatin illā huwa sādisuhum wa lā adnā min żālika wa lā akṡara illā huwa ma‘ahum aina mā kānū, ṡumma yunabbi'uhum bimā ‘amilū yaumal-qiyāmah(ti), innallāha bikulli syai'in ‘alīm(un).

की अहाँ ई नहि देखैत छी जे अल्लाह आकाश मे जे किछु अछि आ धरती मे जे किछु अछि से जनैत छथि? तीन गोटेक बीच कोनो गुप्त गप्प-सप्प नहि होइत छैक मुदा ओ ओहि मे चारिम छथि । आ पाँचटा नहि अछि मुदा ओ छठम छथि । आ ओहि सँ कम वा बेसी नहि मुदा ओ जतय छथि ओतय हुनका सभक संग छथि | तखन ओ कयामतक दिन हुनका सभ केँ एहि बातक सूचना देताह जे ओ सभ पहिने की करैत छलाह | सचमुच अल्लाह सब चीज के सर्वज्ञ छैथ।


8

اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذِيْنَ نُهُوْا عَنِ النَّجْوٰى ثُمَّ يَعُوْدُوْنَ لِمَا نُهُوْا عَنْهُ وَيَتَنٰجَوْنَ بِالْاِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُوْلِۖ وَاِذَا جَاۤءُوْكَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ اللّٰهُ ۙوَيَقُوْلُوْنَ فِيْٓ اَنْفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا اللّٰهُ بِمَا نَقُوْلُۗ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُۚ يَصْلَوْنَهَاۚ فَبِئْسَ الْمَصِيْرُ

alam tara ilal-lażīna nuhū ‘anin-najwā ṡummā ya‘ūdūna limā nuhū ‘anhu wa yatanājauna bil-iṡmi wal-‘udwāni wa ma‘ṣiyatir-rasūl(i), wa iżā jā'ūka ḥayyauka bimā lam yuḥayyika bihillāh(u), wa yaqūlūna fī anfusihim lau lā yu‘ażżibunallāhu bimā naqūl(u), ḥasbuhum jahannam(u), yaṣlaunahā, fa bi'sal-maṣīr(u).

की अहाँ ओहि लोकनि केँ नहि देखलहुँ जिनका गुप्त वार्ता करबा सँ मना कयल गेल छलनि, तखन ओ सभ ओहि निषेध पर वापस आबि गेलाह आ गुप्त वार्तालाप कयलनि जे पाप, दुश्मनी, आ रसूलुल्लाह केर आज्ञा नहि मानैत छलाह? आरू जबे वू तोरा (हे मुहम्मद) के पास आबै छै, त॑ वू तोरा के दोसरऽ तरीका स॑ अभिवादन करै छै जे अल्लाह तोरा लेली तय करी चुकलऽ छै । आ ओ सभ मने-मन कहैत छथि, "हम सभ जे कहैत छी ताहि पर अल्लाह हमरा सभ केँ सजा किएक नहि दैत छथि?" हुनका सभक लेल पर्याप्त अछि नरकक अग्नि, जाहि मे ओ सभ प्रवेश करताह । तखन ई केहन दुष्ट मंजिल अछि।


9

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا تَنَاجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَاجَوْا بِالْاِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُوْلِ وَتَنَاجَوْا بِالْبِرِّ وَالتَّقْوٰىۗ وَاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذِيْٓ اِلَيْهِ تُحْشَرُوْنَ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā tanājaitum falā tatanājau bil-iṡmi wal-‘udwāni wa ma‘ṣiyatir-rasūli wa tanājau bil-birri wat-taqwā, wattaqullāhal-lażī ilaihi tuḥsyarūn(a).

हे विश्वास करनिहार! जखन अहाँ गुप्त चर्चा करब तखन पापपूर्ण काज, दुश्मनी आ रसूलुल्लाह केर आज्ञा नहि मानबाक चर्चा नहि करू। मुदा भलाई आ धर्मपरायणताक काजक गप्प करू। आ अल्लाह सँ डरू, जिनका लग फेर सँ जमा भ’ जायब।


10

اِنَّمَا النَّجْوٰى مِنَ الشَّيْطٰنِ لِيَحْزُنَ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَلَيْسَ بِضَاۤرِّهِمْ شَيْـًٔا اِلَّا بِاِذْنِ اللّٰهِ ۗوَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُوْنَ

innaman-najwā minasy-syaiṭāni liyaḥzunal-lażīna āmanū wa laisa biḍārrihim syai'an illā bi'iżnillāh(i), wa ‘alallāhi falyatawakkalil-mu'minūn(a).

सचमुच, गुप्त गप्प-सप्प शैतान केरऽ कामऽ में शामिल छै, ताकि मुसलमानऽ क॑ दुखी होय सक॑, लेकिन अल्लाह केरऽ अनुमति के अलावा ओकरा कनी भी नुकसान नै पहुँचै छै । आ मुसलमान अल्लाह पर भरोसा करथि।


11

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا قِيْلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوْا فِى الْمَجٰلِسِ فَافْسَحُوْا يَفْسَحِ اللّٰهُ لَكُمْۚ وَاِذَا قِيْلَ انْشُزُوْا فَانْشُزُوْا يَرْفَعِ اللّٰهُ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا مِنْكُمْۙ وَالَّذِيْنَ اُوْتُوا الْعِلْمَ دَرَجٰتٍۗ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُوْنَ خَبِيْرٌ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā qīla lakum tafassaḥū fil-majālisi fafsaḥū yafsaḥillāhu lakum, wa iżā qīlansyuzū fansyuzū yarfa‘illāhul-lażīna āmanū minkum, wal-lażīna ūtul-‘ilma darajāt(in), wallāhu bimā ta‘malūna khabīr(un).

हे विश्वास करनिहार! जँ अहाँ सभकेँ कहल गेल अछि जे "सभा सभमे जगह दियौक" तखन जगह बनाउ, निश्चित रूपसँ अल्लाह अहाँ सभक लेल जगह बनाओत। आ जखन कहल जायत जे "खड़ू" तखन ठाढ़ भ' जाउ, तखन निश्चित रूप सँ अल्लाह अहाँ सभक बीच विश्वास करय बला लोक आ जिनका ज्ञान देल गेल अछि, ओकर ( डिग्री) केँ किछु डिग्री धरि ऊपर उठौताह। आ अल्लाह अहाँ जे काज करैत छी ताहि सँ अवगत छथि।


12

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُوْلَ فَقَدِّمُوْا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰىكُمْ صَدَقَةً ۗذٰلِكَ خَيْرٌ لَّكُمْ وَاَطْهَرُۗ فَاِنْ لَّمْ تَجِدُوْا فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā nājaitumur-rasūla fa qaddimū baina yaday najwākum ṣadaqah(tan), żālika khairul lakum wa aṭhar(u), fa'illam tajidū fa innallāha gafūrur raḥīm(un).

हे विश्वास करनिहार! जखन अहाँ रसूलुल्लाह सँ कोनो विशेष गप्प-सप्प करैत छी तखन गप्प-सप्प (करबा) सँ पहिने (गरीब केँ) दक्षिणा देबाक चाही। जे अहाँक लेल नीक आ साफ-सुथरा। मुदा जँ अहाँ सभ (जे दान मे देबाक अछि) नहि प्राप्त करैत छी तँ सचमुच अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि ।


13

ءَاَشْفَقْتُمْ اَنْ تُقَدِّمُوْا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰىكُمْ صَدَقٰتٍۗ فَاِذْ لَمْ تَفْعَلُوْا وَتَابَ اللّٰهُ عَلَيْكُمْ فَاَقِيْمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاَطِيْعُوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ ۗوَاللّٰهُ خَبِيْرٌ ۢبِمَا تَعْمَلُوْنَ ࣖ

a'asyfaqtum an tuqaddimū baina yaday najwākum ṣadaqāt(in), fa iż lam taf‘alū wa tāballāhu ‘alaikum fa'aqīmuṣ-ṣalāta wa ātuz-zakāta wa aṭī‘ullāha wa rasūlah(ūwallāhu khabīrum bimā ta‘malūn(a).

की अहाँ (गरीब बनय सँ) डरैत छी, कारण अहाँ रसूलुल्लाह सँ गप्प-सप्प करबा सँ पहिने भिक्षा देलहुँ? मुदा जँ अहाँ नै करब आ अल्लाह अहाँ के माफ क देने छथि त नमाज पूरा करू, आ जकात करू आ अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के बात मानू ! आ अल्लाह अहाँ जे काज करैत छी ताहि मे बहुत सावधान रहैत छथि।


14

۞ اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذِيْنَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْۗ مَا هُمْ مِّنْكُمْ وَلَا مِنْهُمْۙ وَيَحْلِفُوْنَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُوْنَ

alam tara ilal-lażīna tawallau qauman gaḍiballāhu ‘alaihim, mā hum minkum wa lā minhum, wa yaḥlifūna ‘alal-każibi wa hum ya‘lamūn(a).

की अहाँ ओहि (पाखंडी) पर ध्यान नहि देने छी जे एहन लोक के दोस्त बना लैत छथि जिनका अल्लाह क्रोधित केने छथि? ओ लोक अहाँक (लोक) सँ नहि छथि आ हुनकर (लोक) सँ नहि। आ ओ सभ झूठक कसम खाइत छथि, जखन कि ओ सभ ई बात जनैत छथि।


15

اَعَدَّ اللّٰهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيْدًاۗ اِنَّهُمْ سَاۤءَ مَا كَانُوْا يَعْمَلُوْنَ

a‘addallāhu lahum ‘ażāban syadīdā(n), innahum sā'a mā kānū ya‘malūn(a).

अल्लाह हुनका सब लेल बहुत कठोर सजा तैयार केने छथि। सच मे, कतेक खराब काज केने छथि।


16

اِتَّخَذُوْٓا اَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوْا عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِيْنٌ

ittakhażū aimānahum junnatan fa ṣaddū ‘an sabīlillāhi falahum ‘ażābum muhīn(un).

ओ सब अपन शपथ के ढाल बना दैत छथि, फेर (मनुख) के अल्लाह के रास्ता स बाधा पहुंचाबैत छथि, तखन हुनका सब लेल अपमानजनक सजा होयत।


17

لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ اَمْوَالُهُمْ وَلَآ اَوْلَادُهُمْ مِّنَ اللّٰهِ شَيْـًٔاۗ اُولٰۤىِٕكَ اَصْحٰبُ النَّارِۗ هُمْ فِيْهَا خٰلِدُوْنَ

lan tugniya ‘anhum amwāluhum wa lā aulāduhum minallāhi syai'ā(n), ulā'ika aṣḥābun-nār(i), hum fīhā khālidūn(a).

हुनकऽ सम्पत्ति आरू बच्चा केरऽ अल्लाह केरऽ सजा स॑ हुनका सब के कोनो फायदा (मदद करै लेली) नै छै । नरकक निवासी छथि, ओतहि सदिखन रहताह।


18

يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللّٰهُ جَمِيْعًا فَيَحْلِفُوْنَ لَهٗ كَمَا يَحْلِفُوْنَ لَكُمْ وَيَحْسَبُوْنَ اَنَّهُمْ عَلٰى شَيْءٍۗ اَلَآ اِنَّهُمْ هُمُ الْكٰذِبُوْنَ

yauma yab‘aṡuhumullāhu jamī‘an fa yaḥlifūna lahū kamā yaḥlifūna lakum wa yaḥsabūna annahum ‘alā syai'(in), alā innahum humul-kāżibūn(a).

(याद राखू) ओ दिन जखन अल्लाह हुनका सभ केँ उठौताह, आ ओ सभ हुनका संग कसम खा लेताह (जे ओ सभ मुश्रिक नहि छथि) जेना अहाँ सभक कसम खाइत छथि, आ ओ सभ सोचत जे हुनका सभ केँ किछु (लाभ) भेटतनि। सावधान रहू जे ओ सभ झूठ बाजनिहार छथि।


19

اِسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطٰنُ فَاَنْسٰىهُمْ ذِكْرَ اللّٰهِ ۗ اُولٰۤىِٕكَ حِزْبُ الشَّيْطٰنِۗ اَلَآ اِنَّ حِزْبَ الشَّيْطٰنِ هُمُ الْخٰسِرُوْنَ

istaḥważa ‘alaihimusy-syaiṭānu fa'ansāhum żikrallāh(i), ulā'ika ḥizbusy-syaiṭān(i), alā inna ḥizbasy-syaiṭāni humul-khāsirūn(a).

शैतान ओकरा सभ पर विजय पाबि गेल अछि, आ ओकरा सभ केँ अल्लाह केर स्मरण बिसरा देलक; ओ सभ शैतानक दल अछि। ई जानि लिअ जे शैतान के पार्टी एकटा एहन पार्टी अछि जे हारत।


20

اِنَّ الَّذِيْنَ يُحَاۤدُّوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗٓ اُولٰۤىِٕكَ فِى الْاَذَلِّيْنَ

innal-lażīna yuḥāddūnallāha wa rasūlahū ulā'ika fil-ażallīn(a).

सचमुच अल्लाह आरू हुनकऽ रसूलुल्लाह के विरोध करै वाला सब सबसें घृणित लोगऽ म॑ शामिल छै ।


21

كَتَبَ اللّٰهُ لَاَغْلِبَنَّ اَنَا۠ وَرُسُلِيْۗ اِنَّ اللّٰهَ قَوِيٌّ عَزِيْزٌ

kataballāhu la'aglibanna ana wa rusulī, innallāha qawiyyun ‘azīz(un).

अल्लाह फरमान जारी केने छथि, "हम आ हमर रसूलुल्लाह अवश्य जीतब।" सचमुच अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वशक्तिमान छथि।


22

لَا تَجِدُ قَوْمًا يُّؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ يُوَاۤدُّوْنَ مَنْ حَاۤدَّ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ وَلَوْ كَانُوْٓا اٰبَاۤءَهُمْ اَوْ اَبْنَاۤءَهُمْ اَوْ اِخْوَانَهُمْ اَوْ عَشِيْرَتَهُمْۗ اُولٰۤىِٕكَ كَتَبَ فِيْ قُلُوْبِهِمُ الْاِيْمَانَ وَاَيَّدَهُمْ بِرُوْحٍ مِّنْهُ ۗوَيُدْخِلُهُمْ جَنّٰتٍ تَجْرِيْ مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهٰرُ خٰلِدِيْنَ فِيْهَاۗ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوْا عَنْهُۗ اُولٰۤىِٕكَ حِزْبُ اللّٰهِ ۗ اَلَآ اِنَّ حِزْبَ اللّٰهِ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ ࣖ

lā tajidu qaumay yu'minūna billāhi wal-yaumil ākhiri yuwāddūna man ḥāddallāha wa rasūlahū wa lau kānū ābā'ahum au abnā'ahum au ikhwānahum au ‘asyīratahum, ulā'ika kataba fī qulūbihimul-īmāna wa ayyadahum birūḥim minh(u), wa yudkhiluhum jannātin tajrī min taḥtihal-anhāru khālidīna fīhā, raḍiyallāhu ‘anhum wa raḍū ‘anh(u), ulā'ika ḥizbullāh(i), alā inna ḥizballāhi humul-mufliḥūn(a).

अहाँ (मुहम्मद) के अल्लाह आ परलोक में विश्वास करय वाला लोक के अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के विरोध करय वाला लोक के संग स्नेह करय वाला लोक नहिं भेटत, भले ओ लोक हुनकर पिता, बेटा, भाई या परिवार के होथि. ई वू लोग छै, जेकरऽ दिलऽ म॑ अल्लाह न॑ ईमान रोपलकै आरू अल्लाह न॑ ओकरा स॑ जे मदद मिलै छै, ओकरा स॑ ओकरा मजबूत करी देल॑ छै । तखन ओ ओकरा सभ केँ गाछी मे राखि देलनि जकर नीचाँ नदी बहैत अछि, जाहि मे ओ सभ अनन्त काल धरि रहत। अल्लाह हुनका सब स प्रसन्न छथि आ ओ सब हुनकर (दया के भरमार) स संतुष्ट छथि। भगवानक समूह अछि। मोन राखू, सचमुच अल्लाह के समूह भाग्यशाली अछि।