कारी
मुरत्तल ऑडियो
اِقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِيْ خَلَقَۚ
iqra' bismi rabbikal-lażī khalaq(a).
अपने रब के नाम से पढ़, जिसने सृजन किया,
خَلَقَ الْاِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍۚ
khalaqal-insāna min ‘alaq(in).
उसने इंसान को खून के थक्के से बनाया,
اِقْرَأْ وَرَبُّكَ الْاَكْرَمُۙ
iqra' wa rabbukal-akram(u).
पढ़, और तेरा रब सबसे उदार है,
الَّذِيْ عَلَّمَ بِالْقَلَمِۙ
allażī ‘allama bil-qalam(i).
जिसने कलम के द्वारा (इंसान को) सिखाया,
عَلَّمَ الْاِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْۗ
‘allamal-insāna mā lam ya‘lam.
उसने इंसान को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था,
كَلَّآ اِنَّ الْاِنْسَانَ لَيَطْغٰىٓ ۙ
kallā innal-insāna layaṭgā.
नहीं, निश्चय ही इंसान हद से आगे बढ़ जाता है,
اَنْ رَّاٰهُ اسْتَغْنٰىۗ
ar ra'āhustagnā.
जब वह खुद को आत्मनिर्भर देखता है,
اِنَّ اِلٰى رَبِّكَ الرُّجْعٰىۗ
inna ilā rabbikar-ruj‘ā.
निश्चय ही, तेरे रब की ओर ही वापसी है,
اَرَاَيْتَ الَّذِيْ يَنْهٰىۙ
ara'aital-lażī yanhā.
क्या ख्याल है उस व्यक्ति के बारे में जो रोकता है,
عَبْدًا اِذَا صَلّٰىۗ
‘abdan iżā ṣallā.
एक बنده को जब वह नमाज़ पढ़ता है,
اَرَاَيْتَ اِنْ كَانَ عَلَى الْهُدٰىٓۙ
ara'aita in kāna ‘alal-hudā.
क्या ख्याल है अगर वह (जो नमाज़ पढ़ता है) हिदायत पर हो,
اَوْ اَمَرَ بِالتَّقْوٰىۗ
au amara bit-taqwā.
या वह (अल्लाह से) डरने का आदेश देता हो?,
اَرَاَيْتَ اِنْ كَذَّبَ وَتَوَلّٰىۗ
ara'aita in każżaba wa tawallā.
क्या ख्याल है अगर वह (जो रोकता है) झुठलाए और मुंह फेरे?,
اَلَمْ يَعْلَمْ بِاَنَّ اللّٰهَ يَرٰىۗ
alam ya‘lam bi'annallāha yarā.
क्या वह नहीं जानता कि निश्चय ही अल्लाह देख रहा है?,
كَلَّا لَىِٕنْ لَّمْ يَنْتَهِ ەۙ لَنَسْفَعًاۢ بِالنَّاصِيَةِۙ
kallā la'il lam yantah(i), lanasfa‘am bin-nāṣiyah(ti).
नहीं, अगर वह (ऐसा करना) नहीं रोकेगा, तो हम उसकी चोटी पकड़कर (नरक में) खींच लेंगे,
نَاصِيَةٍ كَاذِبَةٍ خَاطِئَةٍۚ
nāṣiyatin kāżibatin khāṭi'ah(tin).
(वही) चोटी जो झुठलाने वाले और अवज्ञाकारी की है,
فَلْيَدْعُ نَادِيَهٗۙ
falyad‘u nādiyah(ū).
तो उसे अपने साथियों को बुलाने दे (बचाने के लिए),
سَنَدْعُ الزَّبَانِيَةَۙ
sanad‘uz-zabāniyah(ta).
हम ज़बानिया (पापियों को सजा देने वाले फरिश्तों) को बुलाएंगे,
كَلَّاۗ لَا تُطِعْهُ وَاسْجُدْ وَاقْتَرِبْ ۩ ࣖ
kallā, lā tuṭi‘hu wasjud waqtarib.
नहीं, तुम उसकी बात न मानो; और सजदा करो और (अल्लाह के) करीब आओ,