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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Bangsa-bangsa terdahulu Tugas para Nabi Menyeru kepada jalan Allah Tugas rasul hanya menyampaikan

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कुल आयत : 66
119
Q.S अल-बकराह (2:119)

اِنَّآ اَرْسَلْنٰكَ بِالْحَقِّ بَشِيْرًا وَّنَذِيْرًاۙ وَّلَا تُسْـَٔلُ عَنْ اَصْحٰبِ الْجَحِيْمِ

innā arsalnāka bil-ḥaqqi basyīraw wa nażīrā(n), wa lā tus'alu ‘an aṣḥābil-jaḥīm(i).

सचमुच, हम अहाँ (मुहम्मद) के सच्चाई के संग पठेने छी, खुशखबरी के वाहक आ चेतावनी देबय वाला के रूप में। आ अहाँ सँ नरकक निवासीक संबंध मे (जवाबदेही) नहि पूछल जायत।


272
Q.S अल-बकराह (2:272)

۞ لَيْسَ عَلَيْكَ هُدٰىهُمْ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَاۤءُ ۗوَمَا تُنْفِقُوْا مِنْ خَيْرٍ فَلِاَنْفُسِكُمْ ۗوَمَا تُنْفِقُوْنَ اِلَّا ابْتِغَاۤءَ وَجْهِ اللّٰهِ ۗوَمَا تُنْفِقُوْا مِنْ خَيْرٍ يُّوَفَّ اِلَيْكُمْ وَاَنْتُمْ لَا تُظْلَمُوْنَ

laisa ‘alaika hudāhum wa lākinnallāha yahdī may yasyā'(u), wa mā tunfiqū min khairin fa li'anfusikum, wa mā tunfiqūna illabtigā'a wajhillāh(i), wa mā tunfiqū min khairiy yuwaffa ilaikum wa antum lā tuẓlamūn(a).

हुनका सब के मार्गदर्शन करब अहाँक (मुहम्मद के) कर्तव्य नै अछि, मुदा अल्लाह छथि जे जिनका चाहथि हुनका मार्गदर्शन करैत छथि। जे सम्पत्ति दैत छी से अपने लेल अछि। आ जाबे तक अल्लाह के मंजूरी नै लेब ताबे तक इन्फाक नै दियौ। आ जे किछु धन लगाउ, अहाँ केँ पूर्ण रूप सँ (पुरस्कार) अवश्य देल जायत आ अहाँ सँ अन्याय (हानि) नहि होयत।


20
Q.S अली इमरान (3:20)

فَاِنْ حَاۤجُّوْكَ فَقُلْ اَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلّٰهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِ ۗوَقُلْ لِّلَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ وَالْاُمِّيّٖنَ ءَاَسْلَمْتُمْ ۗ فَاِنْ اَسْلَمُوْا فَقَدِ اهْتَدَوْا ۚ وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلٰغُ ۗ وَاللّٰهُ بَصِيْرٌۢ بِالْعِبَادِ ࣖ

fa'in ḥājjūka fa qul aslamtu wajhiya lillāhi wa manittaba‘an(i), wa qul lil-lażīna ūtul-kitāba wal-ummiyyīna a'aslamtum, fa'in aslamū faqadihtadau, wa in tawallau fa'innamā ‘alaikal-balāg(u), wallāhu baṣīrum bil-‘ibād(i).

तखन जँ ओ सभ अहाँ (मुहम्मद) सँ बहस करत तँ कहब जे "हम अल्लाह केर अधीन छी आ (तहिना) जे हमर पाछाँ पड़ैत अछि।" आ जिनका किताब देल गेल अछि आ अनपढ़ लोक स कहब जे "की अहाँ इस्लाम स्वीकार क लेने छी?" अगर ओ इस्लाम स्वीकार क लैत छथि त एकर मतलब अछि जे हुनका मार्गदर्शन भेटल अछि, मुदा अगर ओ मुड़ि जाइत छथि त अहां के फर्ज सिर्फ एकरा पहुंचाबय के अछि. आ अल्लाह अपन सेवक के सर्वदर्शी छथि।


80
Q.S अन-निसा (4:80)

مَنْ يُّطِعِ الرَّسُوْلَ فَقَدْ اَطَاعَ اللّٰهَ ۚ وَمَنْ تَوَلّٰى فَمَآ اَرْسَلْنٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيْظًا ۗ

may yuṭi‘ir-rasūla faqad aṭā‘allāh(a), wa man tawallā famā arsalnāka ‘alaihim ḥafīẓā(n).

जे कियो रसूलुल्लाह (मुहम्मद) के बात मानैत अछि, तखन सचमुच ओ अल्लाह के आज्ञा मानने अछि। आ जे (ओहि आज्ञाकारिता सँ) मुँह मोड़ि लेत, तखन (जानू) हम अहाँ (मुहम्मद) केँ हुनकर रक्षक बनय लेल नहि पठेने छी


67
Q.S अल-मैदाह (5:67)

۞ يٰٓاَيُّهَا الرَّسُوْلُ بَلِّغْ مَآ اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَّبِّكَ ۗوَاِنْ لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسٰلَتَهٗ ۗوَاللّٰهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِۗ اِنَّ اللّٰهَ لَا يَهْدِى الْقَوْمَ الْكٰفِرِيْنَ

yā ayyuhar-rasūlu ballig mā unzila ilaika mir rabbik(a), wa illam taf‘al famā ballagta risālatah(ū), wallāhu ya‘ṣimuka minan-nās(i), innallāha lā yahdil-qaumal-kāfirīn(a).

हे प्रेरित! जे अहाँक प्रभु अहाँ पर प्रकट केने छथि से संप्रेषित करू। जँ अहाँ नहि करब (जे अहाँ केँ करबाक आदेश देल गेल छल) त' एकर मतलब अछि जे अहाँ हुनकर संदेश नहि द' रहल छी। आ अल्लाह अहाँ के मानव (हानि) स बचाबैत छथि। सचमुच अल्लाह काफिर के मार्गदर्शन नै करै छै।


92
Q.S अल-मैदाह (5:92)

وَاَطِيْعُوا اللّٰهَ وَاَطِيْعُوا الرَّسُوْلَ وَاحْذَرُوْا ۚفَاِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُوْٓا اَنَّمَا عَلٰى رَسُوْلِنَا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

wa aṭī‘ullāha wa aṭī‘ur-rasūla waḥżarū, fa in tawallaitum fa‘lamū annamā ‘alā rasūlinal-balāgul-mubīn(u).

आ अल्लाह के आज्ञा मानू आ रसूलुल्लाह के बात करू आ सावधान रहू। जँ अहाँ मुँह घुमा लैत छी तँ ई जानि लिअ जे हमर दूतक कर्तव्य मात्र (संदेश) केँ स्पष्ट रूप सँ पहुँचाबय के छल |


99
Q.S अल-मैदाह (5:99)

مَا عَلَى الرَّسُوْلِ اِلَّا الْبَلٰغُ ۗوَاللّٰهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُوْنَ وَمَا تَكْتُمُوْنَ

mā ‘alar-rasūli illal-balāg(u),wallāhu ya‘lamu mā tubdūna wa mā taktumūn(a).

रसूलुल्लाह केरऽ फर्ज दोसरऽ नै छै, सिवाय (अल्लाह केरऽ संदेश) के संप्रेषण करै के, आरू अल्लाह जान॑ छै कि तोहें की प्रकट करै छियै आरू की नुकाबै छै ।


52
Q.S अल-अन'अम (6:52)

وَلَا تَطْرُدِ الَّذِيْنَ يَدْعُوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيْدُوْنَ وَجْهَهٗ ۗمَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ وَّمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِمْ مِّنْ شَيْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُوْنَ مِنَ الظّٰلِمِيْنَ

wa lā taṭrudil-lażīna yad‘ūna rabbahum bil-gadāti wal-‘asyiyyi yurīdūna wajhah(ū), mā ‘alaika min ḥisābihim min syai'iw wa mā min ḥisābika ‘alaihim min syai'in fa taṭrudahum fa takūna minaẓ-ẓālimīn(a).

भोर-साँझ अपन प्रभु के पुकारनिहार के नहि भगाउ, हुनकर प्रसन्नता के आशा करैत छथि | अहाँ हुनका लोकनिक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि लैत छथि आ ओ सभ अहाँक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि उठबैत छथि, जाहि कारणेँ अहाँ हुनका सभ केँ बाहर निकालबाक (अधिकार) छी, जाहि सँ अहाँ अपराधी मे सँ एक छी।


66
Q.S अल-अन'अम (6:66)

وَكَذَّبَ بِهٖ قَوْمُكَ وَهُوَ الْحَقُّۗ قُلْ لَّسْتُ عَلَيْكُمْ بِوَكِيْلٍ ۗ

wa każżaba bihī qaumuka wa huwal-ḥaqq(u), qul lastu ‘alaikum biwakīl(in).

आ अहाँक लोक एकरा (दण्ड) केँ नकारैत अछि भले ओ (दण्ड) सत्य हो। (मुहम्मद) कहू, "हम अहाँक प्रभारी नहि छी।"


69
Q.S अल-अन'अम (6:69)

وَمَا عَلَى الَّذِيْنَ يَتَّقُوْنَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ وَّلٰكِنْ ذِكْرٰى لَعَلَّهُمْ يَتَّقُوْنَ

wa mā ‘alal-lażīna yattaqūna min ḥisābihim min syai'iw wa lākin żikrā la‘allahum yattaqūn(a).

जे अल्लाह स डरैत छथि हुनका अपन पाप के कोनो जिम्मेदारी नै छैन्ह; लेकिन हुनका सब के कर्तव्य छै कि हुनका सब के अल्लाह स डरय के याद दिलाबै।


90
Q.S अल-अन'अम (6:90)

اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ هَدَى اللّٰهُ فَبِهُدٰىهُمُ اقْتَدِهْۗ قُلْ لَّآ اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًاۗ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٰى لِلْعٰلَمِيْنَ ࣖ

ulā'ikal-lażīna hadallāhu fa bihudāūhumuqtadih, qul lā as'alukum ‘alaihi ajrā(n), in huwa illā żikrā lil-‘ālamīn(a).

ई ओ सब (नबी) छथि जिनका अल्लाह के मार्गदर्शन भेटल छनि, ताहि लेल हुनकर मार्गदर्शन के पालन करू। (मुहम्मद) कहू, "हम (कुरान) के संप्रेषण के बदला में अहाँ स किछु नहि मांगैत छी।" कुरान पूरा दुनिया मे (सब लोक) के लेल चेतावनी के अलावा किछु नहि अछि।


104
Q.S अल-अन'अम (6:104)

قَدْ جَاۤءَكُمْ بَصَاۤىِٕرُ مِنْ رَّبِّكُمْۚ فَمَنْ اَبْصَرَ فَلِنَفْسِهٖۚ وَمَنْ عَمِيَ فَعَلَيْهَاۗ وَمَآ اَنَا۠ عَلَيْكُمْ بِحَفِيْظٍ

qad jā'akum baṣā'iru mir rabbikum, faman abṣara fa linafsih(ī), wa man ‘amiya fa ‘alaihā, wa mā ana ‘alaikum biḥafīẓ(in).

सचमुच, अहाँक प्रभु सँ स्पष्ट प्रमाण भेटल अछि। जे (सत्य) देखैत अछि, तखन (लाभ) अपना लेल अछि; आ जे आन्हर अछि (सत्य नहि देखैत अछि), तखन ओ हारैत अछि। आ हम (मुहम्मद) (अहाँक) पहरेदार नहि छी।


107
Q.S अल-अन'अम (6:107)

وَلَوْ شَاۤءَ اللّٰهُ مَآ اَشْرَكُوْاۗ وَمَا جَعَلْنٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيْظًاۚ وَمَآ اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَكِيْلٍ

wa lau syā'allāhu mā asyrakū, wa mā ja‘alnā ‘alaihim ḥafīẓā(n), wa mā anta ‘alaihim biwakīl(in).

आ जँ अल्लाह चाहथि तँ ओ सभ (हुनका) संग साझीदार नहि करितथि । आ हम अहाँ केँ ओकर रक्षक नहि बनौने छी। आ अहाँ हुनकर सभक रक्षक नहि छी।


62
Q.S अल-अ'रफ (7:62)

اُبَلِّغُكُمْ رِسٰلٰتِ رَبِّيْ وَاَنْصَحُ لَكُمْ وَاَعْلَمُ مِنَ اللّٰهِ مَا لَا تَعْلَمُوْنَ

uballigukum risālāti rabbī wa anṣaḥu lakum wa a‘lamu minallāhi mā lā ta‘lamūn(a).

हम अहाँ सभ केँ अपन प्रभुक संदेश दैत छी, अहाँ सभ केँ सलाह दैत छी, आ अहाँ सभ केँ जे नहि बुझल अछि से हम अल्लाह सँ जनैत छी।"


63
Q.S अल-अ'रफ (7:63)

اَوَعَجِبْتُمْ اَنْ جَاۤءَكُمْ ذِكْرٌ مِّنْ رَّبِّكُمْ عَلٰى رَجُلٍ مِّنْكُمْ لِيُنْذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوْا وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُوْنَ

awa‘ajibtum an jā'akum żikrum mir rabbikum ‘alā rajulim minkum liyunżirakum wa litattaqū wa la‘allakum turḥamūn(a).

आरू की तोरा सिनी कॅ आश्चर्य छै कि तोरा सिनी के बीच सें एक आदमी के माध्यम सें तोरा सिनी के प्रभु के तरफ सें एक स्मरण आबी गेलऽ छै, जे तोरा सिनी कॅ चेताबै लेली आरो तोहें धर्मात्मा बनी सकै छियै, आरो तोरा सिनी कॅ दया मिलै छै।


68
Q.S अल-अ'रफ (7:68)

اُبَلِّغُكُمْ رِسٰلٰتِ رَبِّيْ وَاَنَا۠ لَكُمْ نَاصِحٌ اَمِيْنٌ

uballigukum risālāti rabbī wa ana lakum nāṣiḥun amīn(un).

हम अहाँ सब के अपन प्रभु के संदेश दैत छी आ अहाँ के भरोसेमंद सलाह दैत छी।


79
Q.S अल-अ'रफ (7:79)

فَتَوَلّٰى عَنْهُمْ وَقَالَ يٰقَوْمِ لَقَدْ اَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّيْ وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلٰكِنْ لَّا تُحِبُّوْنَ النّٰصِحِيْنَ

fa tawallā ‘anhum wa qāla yā qaumi laqad ablagtukum risālata rabbī wa naṣaḥtu lakum wa lākil lā tuḥibbūnan-nāṣiḥīn(a).

तखन ओ (सालेह) हुनका सभ केँ छोड़ि क' कहलनि, "हे हमर लोक! सचमुच हम अहाँ सभ केँ अपन प्रभुक संदेश पहुँचा देने छी आ अहाँ सभ केँ सलाह देने छी। मुदा अहाँ सभ केँ सलाह देनिहार लोक नीक नहि लगैत अछि।"


42
Q.S योना (10:42)

وَمِنْهُمْ مَّنْ يَّسْتَمِعُوْنَ اِلَيْكَۗ اَفَاَنْتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ وَلَوْ كَانُوْا لَا يَعْقِلُوْنَ

wa minhum may yastami‘ūna ilaik(a), afa anta tusmi‘uṣ-ṣumma wa lau kānū lā ya‘qilūn(a).

आ ओहि मे एहन लोक सेहो छथि जे अहाँक (मुहम्मद) के बात सुनैत छथि | मुदा की अहाँ बहीर केँ नहि बुझि क' सुनय सकैत छी?


43
Q.S योना (10:43)

وَمِنْهُمْ مَّنْ يَّنْظُرُ اِلَيْكَۗ اَفَاَنْتَ تَهْدِى الْعُمْيَ وَلَوْ كَانُوْا لَا يُبْصِرُوْنَ

wa minhum may yanẓuru ilaik(a), afa anta tahdil-‘umya wa lau kānū lā yubṣirūn(a).

आ ओहि मे एहन लोक सेहो छथि जे अहाँ दिस तकैत छथि। मुदा की अहाँ आन्हर केँ मार्गदर्शन द' सकैत छी, भले ओ ध्यान नहि दैत हो?


99
Q.S योना (10:99)

وَلَوْ شَاۤءَ رَبُّكَ لَاٰمَنَ مَنْ فِى الْاَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيْعًاۗ اَفَاَنْتَ تُكْرِهُ النَّاسَ حَتّٰى يَكُوْنُوْا مُؤْمِنِيْنَ

wa lau syā'a rabbuka la'āmana man fil-arḍi kulluhum jamī‘ā(n), afa anta tukrihun-nāsa ḥattā yakūnū mu'minīn(a).

आ जँ अहाँक प्रभु चाहैत रहितथि तँ पृथ्वी पर सभ लोक विश्वास कएने रहितथि । मुदा की अहाँ लोक केँ जबरदस्ती (चाहै छी) जाहि सँ ओ विश्वासी बनि जाय?


108
Q.S योना (10:108)

قُلْ يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاۤءَكُمُ الْحَقُّ مِنْ رَّبِّكُمْ ۚفَمَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَدِيْ لِنَفْسِهٖ ۚوَمَنْ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۚوَمَآ اَنَا۠ عَلَيْكُمْ بِوَكِيْلٍۗ

qul yā ayyuhan-nāsu qad jā'akumul-ḥaqqu mir rabbikum, fa manihtadā fa innamā yahtadī linafsih(ī), wa man ḍalla fa innamā yaḍillu ‘alaihā, wa mā ana ‘alaikum biwakīl(in).

(मुहम्मद) कहू, "हे लोक! सच्चाई (कुरान) अहाँ सभक पास अहाँक रब सँ आयल अछि, तेँ जे कियो मार्गदर्शन प्राप्त करैत अछि, ओ वास्तव मे (मार्गदर्शन) अपन (नीक) लेल अछि। आ जे कियो भटकैत अछि, ओ सचमुच ओकर भ्रामकता (हानि) करैत अछि। आ हम अहाँक रक्षक नहि छी।"


12
Q.S टोप (11:12)

فَلَعَلَّكَ تَارِكٌۢ بَعْضَ مَا يُوْحٰىٓ اِلَيْكَ وَضَاۤىِٕقٌۢ بِهٖ صَدْرُكَ اَنْ يَّقُوْلُوْا لَوْلَآ اُنْزِلَ عَلَيْهِ كَنْزٌ اَوْ جَاۤءَ مَعَهٗ مَلَكٌ ۗ اِنَّمَآ اَنْتَ نَذِيْرٌ ۗ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ وَّكِيْلٌ ۗ

fa la‘allaka tārikum ba‘ḍa mā yūḥā ilaika wa ḍā'ikum bihī ṣadruka ay yaqūlū lau lā unzila ‘alaihi kanzun au jā'a ma‘ahū malak(un), innamā anta nażīr(un), wallāhu ‘alā kulli syai'in wakīl(un).

त' भ' सकैत अछि जे अहाँ (मुहम्मद) अहाँ पर जे किछु प्रकट भेल छल ओकरा छोड़ि देबय चाहैत छी आ एकर कारणेँ अहाँक छाती संकीर्ण भ' गेल अछि, कारण ओ सभ कहताह जे "हुनका लग खजाना (धन) किएक नहि पठाओल गेल वा हुनका संग कोनो स्वर्गदूत आबि गेल छल?" सचमुच अहाँ मात्र चेतावनी देबय वाला छी आ अल्लाह सब चीज के रक्षक छथि।


57
Q.S टोप (11:57)

فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقَدْ اَبْلَغْتُكُمْ مَّآ اُرْسِلْتُ بِهٖٓ اِلَيْكُمْ ۗوَيَسْتَخْلِفُ رَبِّيْ قَوْمًا غَيْرَكُمْۗ وَلَا تَضُرُّوْنَهٗ شَيْـًٔا ۗاِنَّ رَبِّيْ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ حَفِيْظٌ

fa in tawallau faqad ablagtukum mā ursiltu bihī ilaikum, wa yastakhlifu rabbī qauman gairakum, wa lā taḍurrūnahū syai'ā(n), inna rabbī ‘alā kulli syai'in ḥafīẓ(un).

तेँ जँ अहाँ सभ मुँह घुमा लैत छी तँ सत्ते हम अहाँ सभ केँ ई बात पहुँचा देलहुँ जे अहाँ सभक प्रति एकटा प्रेरितक रूप मे हमर कर्तव्य अछि। आ हमर प्रभु अहाँक स्थान पर दोसर लोक राखि देताह, जखन कि अहाँ हुनका लेल कनिको नुकसान नहि पहुँचा सकैत छी । सचमुच हमर प्रभु सब वस्तुक पोषण करयवला छथि |"


86
Q.S टोप (11:86)

بَقِيَّتُ اللّٰهِ خَيْرٌ لَّكُمْ اِنْ كُنْتُمْ مُّؤْمِنِيْنَ ەۚ وَمَآ اَنَا۠ عَلَيْكُمْ بِحَفِيْظٍ

baqiyyatullāhi khairul lakum in kuntum mu'minīn(a), wa mā ana ‘alaikum biḥafīẓ(in).

अल्लाह स जे (हैलाल) रहि जायत अछि ओ अहाँ सब लेल नीक अछि जँ अहाँ मुसलमान छी। आ हम अहाँक रक्षक नहि छी।”


7
Q.S अर-रा'द (13:7)

وَيَقُوْلُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا لَوْلَآ اُنْزِلَ عَلَيْهِ اٰيَةٌ مِّنْ رَّبِّهٖۗ اِنَّمَآ اَنْتَ مُنْذِرٌ وَّلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ ࣖ

wa yaqūlul-lażīna kafarū lau lā unzila ‘alaihi āyatum mir rabbih(ī), innamā anta munżiruw wa likulli qaumin hād(in).

आ काफिर सब कहलक, "हुनका (मुहम्मद) के पास हुनकर रब के तरफ स कोनो निशान (चमत्कार) कियैक नै उतरल गेलैन?" सत्ते, अहाँ मात्र एकटा चेतावनी देबयवला छी; आ हर लोकक लेल कियो ने कियो एहन होइत अछि जे मार्गदर्शन दैत अछि |


40
Q.S अर-रा'द (13:40)

وَاِنْ مَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِيْ نَعِدُهُمْ اَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلٰغُ وَعَلَيْنَا الْحِسَابُ

wa immā nuriyannaka ba‘ḍal-lażī na‘iduhum au natawaffayannaka fa innamā ‘alaikal-balāgu wa ‘alainal-ḥisāb(u).

आ जँ हम अहाँ केँ (हे मुहम्मद) किछु (दण्ड) देखा देब जाहि सँ हम हुनका सभ केँ धमकी देने छी, वा अहाँ केँ मारि देब, तखन अहाँक कर्तव्य मात्र एकरा संप्रेषित करब अछि, आ हम सभ (हुनकर काजक) हिसाब लेब।


94
Q.S अल-हिजर (15:94)

فَاصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَاَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِيْنَ

faṣda‘ bimā tu'maru wa a‘riḍ ‘anil-musyrikīn(a).

त (मुहम्मद) जे किछु आज्ञा (अहाँ) के अछि ओकरा खुलि क' पहुँचाउ आ मुश्रिक सभ सँ मुँह मोड़ू।


35
Q.S अन-नहल (16:35)

وَقَالَ الَّذِيْنَ اَشْرَكُوْا لَوْ شَاۤءَ اللّٰهُ مَا عَبَدْنَا مِنْ دُوْنِهٖ مِنْ شَيْءٍ نَّحْنُ وَلَآ اٰبَاۤؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِنْ دُوْنِهٖ مِنْ شَيْءٍ ۗ كَذٰلِكَ فَعَلَ الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِهِمْ ۚفَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

wa qālal-lażīna asyrakū lau syā'allāhu mā ‘abadnā min dūnihī min syai'in naḥnu wa lā ābā'unā wa lā ḥarramnā min dūnihī min syai'(in), każālika fa‘alal-lażīna min qablihim, fahal ‘alar-rusuli illal-balāgul-mubīn(u).

आ मुश्रिक लोकनि कहलनि, "जँ अल्लाह चाहथि त' हम सभ हुनका छोड़ि कोनो आन चीजक इबादत नहि करितहुँ, ने हम सभ आ ने अपन बाप-दादा, आ ने (नहि) हुनकर (इजाति) के बिना कोनो चीज के मना करितहुँ।" हुनका सभसँ पहिने के लोक सेहो एहने करैत छल । की प्रेरित सभक कर्तव्य नहि अछि जे ओ मात्र (परमेश् वरक संदेश) केँ स्पष्ट रूप सँ पहुँचाबथि?


82
Q.S अन-नहल (16:82)

فَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

fa in tawallau fa innamā ‘alaikal-balāgul-mubīn(u).

त अगर ओ सब मुड़ि जाइत छथि त ई जानू जे अहाँ (मुहम्मद) पर जे फर्ज लगाओल गेल अछि ओ मात्र (अल्लाह के संदेश) के स्पष्ट रूप स पहुंचाबय के अछि।


54
Q.S अल इस्रा (17:54)

رَبُّكُمْ اَعْلَمُ بِكُمْ اِنْ يَّشَأْ يَرْحَمْكُمْ اَوْ اِنْ يَّشَأْ يُعَذِّبْكُمْۗ وَمَآ اَرْسَلْنٰكَ عَلَيْهِمْ وَكِيْلًا

rabbukum a‘lamu bikum, iy yasya' yarḥamkum au iy yasya' yu‘ażżibkum, wa mā arsalnāka ‘alaihim wakīlā(n).

अहाँक भगवान् अहाँक बारे मे बेसी जनैत छथि। जँ चाहथि तँ अहाँ पर दया अवश्य करताह आ जँ चाहथि तँ अहाँकेँ दंड अवश्य देताह। आ हम अहाँ (मुहम्मद) केँ हुनका सभक लेल पहरेदार बनय लेल नहि पठेलहुँ।


6
Q.S अल-कहफ (18:6)

فَلَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ عَلٰٓى اٰثَارِهِمْ اِنْ لَّمْ يُؤْمِنُوْا بِهٰذَا الْحَدِيْثِ اَسَفًا

fa la‘allaka bākhi‘un nafsaka ‘alā āṡārihim illam yu'minū bihāżal-ḥadīṡi asafā(n).

तखन शायद अहाँ (मुहम्मद) अपना के नुकसान पहुँचा देब कियाक त हुनकर मुड़ला के बाद अहाँ दुखी भ जायब, अगर ओ सब एहि जानकारी (कुरान) पर विश्वास नै करताह।


29
Q.S अल-कहफ (18:29)

وَقُلِ الْحَقُّ مِنْ رَّبِّكُمْۗ فَمَنْ شَاۤءَ فَلْيُؤْمِنْ وَّمَنْ شَاۤءَ فَلْيَكْفُرْۚ اِنَّآ اَعْتَدْنَا لِلظّٰلِمِيْنَ نَارًاۙ اَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَاۗ وَاِنْ يَّسْتَغِيْثُوْا يُغَاثُوْا بِمَاۤءٍ كَالْمُهْلِ يَشْوِى الْوُجُوْهَۗ بِئْسَ الشَّرَابُۗ وَسَاۤءَتْ مُرْتَفَقًا

wa qulil-ḥaqqu mir rabbikum, faman syā'a falyu'miw wa man syā'a falyakfur, innā a‘tadnā liẓ-ẓālimīna nārā(n), aḥāṭa bihim surādiquhā, wa iy yastagīṡū yugāṡū bimā'in kal-muhli yasywil-wujūh(a), bi'sasy-syarāb(u), wa sā'at murtafaqā(n).

आ (मुहम्मद) कहू, "सत्य अहाँक रब सँ भेटैत अछि; जे चाहैत अछि (विश्वास) ओकरा विश्वास करय, आ जे चाहैत अछि (काफर) ओकरा काफर करय।" सचमुच, हम सब गलत करय वाला के लेल नरक तैयार केने छी, जिनकर उथल-पुथल ओकरा घेरने अछि। जँ ओ सभ मददि (पीनाइ) मांगत तँ ओकरा सभकेँ उबलैत लोहा जकाँ पानि देल जाएत जे मुँहकेँ झुलसैत अछि । (से) सबसँ खराब पेय आ सबसँ खराब आरामक स्थान।


109
Q.S अल-अनबिया (21:109)

فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ اٰذَنْتُكُمْ عَلٰى سَوَاۤءٍۗ وَاِنْ اَدْرِيْٓ اَقَرِيْبٌ اَمْ بَعِيْدٌ مَّا تُوْعَدُوْنَ

fa in tawallau fa qul āżantukum ‘alā sawā'(in), wa in adrī aqarībun am ba‘īdum mā tū‘adūn(a).

त' जँ ओ सभ मुँह घुमा लैत छथि, तखन (मुहम्मद) कहब जे, "हम अहाँ सभ केँ सेहो वैह (शिक्षा) (हमरा सभक बीच) पहुँचा देने छी आ हमरा नहि बुझल अछि जे अहाँ सभ पर जे धमकी देल जा रहल अछि से नजदीक अछि वा दूर।"


67
Q.S अल-हज (22:67)

لِكُلِّ اُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنْسَكًا هُمْ نَاسِكُوْهُ فَلَا يُنَازِعُنَّكَ فِى الْاَمْرِ وَادْعُ اِلٰى رَبِّكَۗ اِنَّكَ لَعَلٰى هُدًى مُّسْتَقِيْمٍ

likulli ummatin ja‘alnā mansakan hum nāsikūhu falā yunāzi‘unnaka fil-amri wad‘u ilā rabbik(a), innaka la‘alā hudam mustaqīm(in).

हम प्रत्येक राष्ट्र के लेल एकटा निश्चित शरीयत स्थापित केने छी जकर पालन हुनका (अनिवार्य) करबाक चाही, ताहि लेल हुनका सब के लेल ई उचित नहि जे ओ एहि मामला (शरीयत) में अहाँ सब स विवाद करथि आ (हुनका सब के) अहाँक प्रभु के पास बजाबय। सचमुच, अहाँ (मुहम्मद) सोझ बाट पर छी।


54
Q.S अन-नूर (24:54)

قُلْ اَطِيْعُوا اللّٰهَ وَاَطِيْعُوا الرَّسُوْلَۚ فَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُمْ مَّا حُمِّلْتُمْۗ وَاِنْ تُطِيْعُوْهُ تَهْتَدُوْاۗ وَمَا عَلَى الرَّسُوْلِ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

qul aṭī‘ullāha wa aṭī‘ur-rasūl(a), fa in tawallau fa innamā ‘alaihi mā ḥummila wa ‘alaikum mā ḥummiltum, wa in tuṭī‘ūhu tahtadū, wa mā ‘alar rasūli illal-balāgul-mubīn(u).

कहू, "अल्लाह के आज्ञा मानू आ रसूलुल्लाह के आज्ञा मानू; जँ अहाँ मुँह घुमाउ, तखन वास्तव मे रसूलुल्लाह (मुहम्मद) के फर्ज मात्र ओ अछि जे हुनका पर थोपल गेल अछि, आ अहाँक फर्ज मात्र ओ अछि जे अहाँ पर थोपल गेल अछि। जँ अहाँ हुनकर आज्ञा मानब त' अहाँ केँ मार्गदर्शन अवश्य भेटत। रसूलुल्लाह केर फर्ज मात्र (अल्लाह केर संदेश) केँ स्पष्ट रूप सँ पहुँचाबय के अछि।"


43
Q.S अल-फुरकान (25:43)

اَرَءَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ اِلٰهَهٗ هَوٰىهُۗ اَفَاَنْتَ تَكُوْنُ عَلَيْهِ وَكِيْلًا ۙ

ara'aita manittakhaża ilāhahū hawāh(u), afa anta takūnu ‘alaihi wakīlā(n).

की अहाँ (मुहम्मद) एहन व्यक्ति के देखलौं जे अपन इच्छा के अपन भगवान बना दैत अछि? की अहाँ ओकर रक्षक बनब?


56
Q.S अल-फुरकान (25:56)

وَمَآ اَرْسَلْنٰكَ اِلَّا مُبَشِّرًا وَّنَذِيْرًا

wa mā arsalnāka illā mubasysyiraw wa nażīrā(n).

आ हम अहाँ (मुहम्मद) केँ शुभ समाचार आनय बला आ चेतावनी देनिहारक रूप मे छोड़ि नहि पठेने छी।


3
Q.S ऐश-शु'आरा (26:3)

لَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَّفْسَكَ اَلَّا يَكُوْنُوْا مُؤْمِنِيْنَ

la‘allaka bākhi‘un nafsaka allā yakūnū mu'minīn(a).

भ' सकैछ जे अहाँ (मुहम्मद) अपना केँ (दुख सँ) नष्ट क' देब, कारण ओ सभ (मक्काक लोक) विश्वास नहि करैत छथि।


115
Q.S ऐश-शु'आरा (26:115)

اِنْ اَنَا۠ اِلَّا نَذِيْرٌ مُّبِيْنٌ ۗ

in ana illā nażīrum mubīn(un).

हम (ई) मात्र स्पष्ट चेतावनी देबय वाला छी।”


208
Q.S ऐश-शु'आरा (26:208)

وَمَآ اَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ اِلَّا لَهَا مُنْذِرُوْنَ ۖ

wa mā ahlaknā min qaryatin illā lahā munżirūn(a).

आ हम सभ कोनो भूमि केँ नष्ट नहि करैत छी, जाबत धरि एहन लोक नहि हो जे ओकरा चेता देने हो;


214
Q.S ऐश-शु'आरा (26:214)

وَاَنْذِرْ عَشِيْرَتَكَ الْاَقْرَبِيْنَ ۙ

wa anżir ‘asyīratakal-aqrabīn(a).

आ अपन निकटतम रिश्तेदार (मुहम्मद) के चेतावनी दियौ,


216
Q.S ऐश-शु'आरा (26:216)

فَاِنْ عَصَوْكَ فَقُلْ اِنِّيْ بَرِيْۤءٌ مِّمَّا تَعْمَلُوْنَ ۚ

fa in ‘aṣauka faqul innī barī'um mimmā ta‘malūn(a).

तखन जँ ओ सभ अहाँक आज्ञा नहि मानैत छथि तखन (मुहम्मद) कहैत छथि जे "सत्ते हम अहाँक काजक लेल जिम्मेदार नहि छी |"


92
Q.S अन-नामल (27:92)

وَاَنْ اَتْلُوَا الْقُرْاٰنَ ۚفَمَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَدِيْ لِنَفْسِهٖۚ وَمَنْ ضَلَّ فَقُلْ اِنَّمَآ اَنَا۠ مِنَ الْمُنْذِرِيْنَ

wa an atluwal-qur'ān(a), famanihtadā fa'innamā yahtadī linafsih(ī), wa man ḍalla faqul innamā ana minal-munżirīn(a).

आ जे हम कुरान (लोक) के पाठ करैत छी। त जे के मार्गदर्शन भेटत, ओकरा सचमुच अपना (भलाई) के लेल मार्गदर्शन भेटत, आ जे भटकत, तखन कहत, "सत्ते हम (छि) चेतनिहार मे सँ एक के अलावा किछु नहि छी |"


56
Q.S अल-कासास (28:56)

اِنَّكَ لَا تَهْدِيْ مَنْ اَحْبَبْتَ وَلٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَاۤءُ ۚوَهُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِيْنَ

innaka lā tahdī man aḥbabta wa lākinnallāha yahdī may yasyā'(u), wa huwa a‘lamu bil-muhtadīn(a).

सचमुच, अहाँ (मुहम्मद) जिनका सँ प्रेम करैत छी हुनका मार्गदर्शन नहि क सकैत छी, मुदा अल्लाह जिनका चाहथि हुनका मार्गदर्शन करैत छथि, आ जे मार्गदर्शन लेबय लेल तैयार छथि हुनका बेसी नीक जकाँ जनैत छथि।


18
Q.S अल-'अंकबुत (29:18)

وَاِنْ تُكَذِّبُوْا فَقَدْ كَذَّبَ اُمَمٌ مِّنْ قَبْلِكُمْ ۗوَمَا عَلَى الرَّسُوْلِ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

wa in tukażżibū faqad każżaba umamum min qablikum, wa mā ‘alar-rasūli illal-balāgul-mubīn(u).

आ जँ अहाँ (काफिर) झूठ बाजैत छी तऽ सचमुच, अहाँ सँ पहिने के लोक सेहो झूठ बाजल छल (दूत)। आरू प्रेरित के दायित्व खाली (भगवान के धर्म) के स्पष्ट रूप सें संप्रेषित करना छै।"


52
Q.S अर-रम (30:52)

فَاِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتٰى وَلَا تُسْمِعُ الصُّمَّ الدُّعَاۤءَ اِذَا وَلَّوْا مُدْبِرِيْنَ

fa innaka lā tusmi‘ul-mautā wa lā tusmi‘uṣ-ṣummad-du‘ā'a iżā wallau mudbirīn(a).

तेँ सत्ते, अहाँ मृत लोक केँ नहि सुनि सकब, आ बहीर लोक केँ कानब नहि सुनि सकब, जँ ओ सभ पीठ फेर लेत।


53
Q.S अर-रम (30:53)

وَمَآ اَنْتَ بِهٰدِ الْعُمْيِ عَنْ ضَلٰلَتِهِمْۗ اِنْ تُسْمِعُ اِلَّا مَنْ يُّؤْمِنُ بِاٰيٰتِنَا فَهُمْ مُّسْلِمُوْنَ ࣖ

wa mā anta bihādil-‘umyi ‘an ḍalālatihim, in tusmi‘u illā may yu'minu bi'āyātinā fahum muslimūn(a).

आ जे आन्हर अछि (ओकर हृदयक आँखि) ओकरा अहाँ अपन गलती सँ मार्गदर्शन नहि क' सकब। आ अहाँ (भगवानक निर्देश) नहि सुनि सकैत छी सिवाय ओहि लोकक जे जे हमर सभक श्लोक मे विश्वास करैत छथि, तखन ओ सभ छथि जे (हमरा सभक अधीन) छथि |


39
Q.S अल-अहजाब (33:39)

ۨالَّذِيْنَ يُبَلِّغُوْنَ رِسٰلٰتِ اللّٰهِ وَيَخْشَوْنَهٗ وَلَا يَخْشَوْنَ اَحَدًا اِلَّا اللّٰهَ ۗوَكَفٰى بِاللّٰهِ حَسِيْبًا

allażīna yuballigūna risālātillāhi wa yakhsyaunahū wa lā yakhsyauna aḥadan illallāh(a), wa kafā billāhi ḥasībā(n).

(अर्थात) जे अल्लाह के संदेश दैत छथि, जे हुनका स डरैत छथि आ अल्लाह के अलावा ककरो स डरैत छथि। आ अल्लाह हिसाब-किताबक रूप मे पर्याप्त छथि।


23
Q.S फतिर (35:23)

اِنْ اَنْتَ اِلَّا نَذِيْرٌ

in anta illā nażīr(un).

अहाँ चेतनिहारक अतिरिक्त किछु नहि छी।


17
Q.S या-सिन (36:17)

وَمَا عَلَيْنَآ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ

wa mā ‘alainā illal-balāgul-mubīn(u).

आरू हमरऽ फर्ज खाली (अल्लाह केरऽ आज्ञा) क॑ स्पष्ट रूप स॑ पहुँचैना छै ।"