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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
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विषय - Sejarah Sifat-Sifat Nabi Muhammad Shalallahu alaihi wassalam Keistimewaan Nabi Muhammad Shalallahu alaihi wassalam Nabi saw. diutus untuk seluruh umat manusia

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कुल आयत : 36
64
Q.S अली इमरान (3:64)

قُلْ يٰٓاَهْلَ الْكِتٰبِ تَعَالَوْا اِلٰى كَلِمَةٍ سَوَاۤءٍۢ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ اَلَّا نَعْبُدَ اِلَّا اللّٰهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهٖ شَيْـًٔا وَّلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا اَرْبَابًا مِّنْ دُوْنِ اللّٰهِ ۗ فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقُوْلُوا اشْهَدُوْا بِاَنَّا مُسْلِمُوْنَ

qul yā ahlal-kitābi ta‘ālau ilā kalimatin sawā'im bainanā wa bainakum allā na‘buda illallāha wa lā nusyrika bihī syai'aw wa lā yattakhiża ba‘ḍunā ba‘ḍan arbābam min dūnillāh(i), fa in tawallau fa qūlusyhadū bi'annā muslimūn(a).

(हे मुहम्मद) कहू, "हे किताब के लोग! एकटा एहन शब्द पर आऊ जे हमरा आ अहाँ के बीच आम अछि: जे हम सब अल्लाह के अलावा ककरो पूजा नहि करैत छी आ हुनकर संगति नहि करैत छी, आ हम सब अल्लाह के अलावा कोनो के मालिक नहि मानैत छी। यदि ओ सब मुँह घुमा लेथि त (हुनका सब स) कहू जे "गवाही दियौ जे हम सब मुसलमान छी।"


199
Q.S अली इमरान (3:199)

وَاِنَّ مِنْ اَهْلِ الْكِتٰبِ لَمَنْ يُّؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَمَآ اُنْزِلَ اِلَيْكُمْ وَمَآ اُنْزِلَ اِلَيْهِمْ خٰشِعِيْنَ لِلّٰهِ ۙ لَا يَشْتَرُوْنَ بِاٰيٰتِ اللّٰهِ ثَمَنًا قَلِيْلًا ۗ اُولٰۤىِٕكَ لَهُمْ اَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ ۗ اِنَّ اللّٰهَ سَرِيْعُ الْحِسَابِ

wa inna min ahlil-kitābi lamay yu'minu billāhi wa mā unzila ilaikum wa mā unzila ilaihim khāsyi‘īna lillāh(i), lā yasytarūna bi'āyātillāhi ṡamanan qalīlā(n), ulā'ika lahum ajruhum ‘inda rabbihim, innallāha sarī‘ul-ḥisāb(i).

आरू सचमुच, किताब केरऽ लोगऽ म॑ ऐन्हऽ लोग छै जे अल्लाह प॑ विश्वास करै छै, आरू जे तोरा प॑ उतारलऽ गेलऽ छै, आरू ओकरा प॑ जे उतारलऽ गेलऽ छै, ओकरा प॑ विश्वास करै छै, कैन्हेंकि वू अल्लाह के प्रति विनम्र छै, आरू वू अल्लाह केरऽ आयतऽ के सस्ता दाम प॑ व्यापार नै करै छै । हुनका सभ केँ अपन प्रभु सँ इनाम भेटतनि। सचमुच अल्लाह अपन गणना मे बहुत जल्दी छथि।


47
Q.S अन-निसा (4:47)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ اٰمِنُوْا بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُمْ مِّنْ قَبْلِ اَنْ نَّطْمِسَ وُجُوْهًا فَنَرُدَّهَا عَلٰٓى اَدْبَارِهَآ اَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّآ اَصْحٰبَ السَّبْتِ ۗ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُوْلًا

yā ayyuhal-lażīna ūtul-kitāba āminū bimā nazzalnā muṣaddiqal limā ma‘akum min qabli an naṭmisa wujūhan fa naruddahā ‘alā adbārihā au nal‘anahum kamā la‘annā aṣḥābas-sabt(i), wa kāna amrullāhi maf‘ūlā(n).

हे लोक जिनका किताब देल गेल अछि ! हम जे उतारने छी (कुरान) पर विश्वास करू जे अहाँक संग जे किताब अछि ओकर पुष्टि करैत अछि, एहि सँ पहिने जे हम (अहाँक) चेहरा बदलब, तखन हम ओकरा पाछू घुमा दैत छी या हम ओकरा गारि पढ़ैत छी जेना हम सब्त (शनिवार) के (शनिवार) के (अनैतिकता करय वाला) के गारी दैत छी | आ भगवानक फरमान जरूर लागू होयत।


79
Q.S अन-निसा (4:79)

مَآ اَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللّٰهِ ۖ وَمَآ اَصَابَكَ مِنْ سَيِّئَةٍ فَمِنْ نَّفْسِكَ ۗ وَاَرْسَلْنٰكَ لِلنَّاسِ رَسُوْلًا ۗ وَكَفٰى بِاللّٰهِ شَهِيْدًا

mā aṣābaka min ḥasanatin fa minallāh(i), wa mā aṣābaka min sayyi'atin fa min nafsik(a), wa arsalnāka lin-nāsi rasūlā(n), wa kafā billāhi syahīdā(n).

जे किछु नीक भेटैत अछि, से अल्लाह सँ अछि, आ जे किछु बुराई अहाँ पर होइत अछि, ओ अहाँक अपन (दोष) सँ अछि। हम अहाँ (मुहम्मद) के (सब) मानवता के दूत के रूप में पठा देलहुं। आ अल्लाह गवाहक रूप मे पर्याप्त छथि।


162
Q.S अन-निसा (4:162)

لٰكِنِ الرّٰسِخُوْنَ فِى الْعِلْمِ مِنْهُمْ وَالْمُؤْمِنُوْنَ يُؤْمِنُوْنَ بِمَآ اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمَآ اُنْزِلَ مِنْ قَبْلِكَ وَالْمُقِيْمِيْنَ الصَّلٰوةَ وَالْمُؤْتُوْنَ الزَّكٰوةَ وَالْمُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِۗ اُولٰۤىِٕكَ سَنُؤْتِيْهِمْ اَجْرًا عَظِيْمًا ࣖ

lākinir-rāsikhūna fil-‘ilmi minhum wal-mu'minūna yu'minūna bimā unzila ilaika wa mā unzila min qablika wal-muqīmīnaṣ-ṣalāta wal-mu'tūnaz-zakāta wal-mu'minūna billāhi wal-yaumil-ākhir(i), ulā'ika sanu'tīhim ajran ‘aẓīmā(n).

लेकिन ओकरा सब में जेकरा में गहरी ज्ञान छै, आरू जे विश्वास करै छै, वू (कुरान) में विश्वास करै छै जे तोरा (मुहम्मद) के सामने उतारलऽ गेलऽ छेलै, आरू (किताब) में जे तोरा सामने उतारलऽ गेलऽ छेलै, साथ ही साथ वू लोग भी जे नमाज करै छै आरू जकात करै छै आरू अल्लाह आरू आखिरी दिन पर विश्वास करै छै। हम हुनका सब के बड़का इनाम देबनि।


170
Q.S अन-निसा (4:170)

يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاۤءَكُمُ الرَّسُوْلُ بِالْحَقِّ مِنْ رَّبِّكُمْ فَاٰمِنُوْا خَيْرًا لَّكُمْ ۗوَاِنْ تَكْفُرُوْا فَاِنَّ لِلّٰهِ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضِۗ وَكَانَ اللّٰهُ عَلِيْمًا حَكِيْمًا

yā ayyuhan-nāsu qad jā'akumur-rasūlu bil-ḥaqqi mir rabbikum fa āminū khairal lakum, wa in takfurū fa inna lillāhi mā fis-samāwāti wal-arḍ(i), wa kānallāhu ‘alīman ḥakīmā(n).

हे लोक! सचमुच, रसूलुल्लाह (मुहम्मद) अहाँक रब सँ सच्चाई (आनैत) ल' क' आबि गेल छथि, तेँ हुनका पर विश्वास करू, अहाँक लेल नीक अछि। आ जँ अहाँ काफिर करब तँ (एहि सँ अल्लाह केँ कनिको नुकसान नहि होयत) कारण जे आकाश आ धरती पर जे किछु अछि ओ सचमुच अल्लाह केर अछि। अल्लाह सर्वज्ञ, सर्वबुद्धिमान छथि।


171
Q.S अन-निसा (4:171)

يٰٓاَهْلَ الْكِتٰبِ لَا تَغْلُوْا فِيْ دِيْنِكُمْ وَلَا تَقُوْلُوْا عَلَى اللّٰهِ اِلَّا الْحَقَّۗ اِنَّمَا الْمَسِيْحُ عِيْسَى ابْنُ مَرْيَمَ رَسُوْلُ اللّٰهِ وَكَلِمَتُهٗ ۚ اَلْقٰىهَآ اِلٰى مَرْيَمَ وَرُوْحٌ مِّنْهُ ۖفَاٰمِنُوْا بِاللّٰهِ وَرُسُلِهٖۗ وَلَا تَقُوْلُوْا ثَلٰثَةٌ ۗاِنْتَهُوْا خَيْرًا لَّكُمْ ۗ اِنَّمَا اللّٰهُ اِلٰهٌ وَّاحِدٌ ۗ سُبْحٰنَهٗٓ اَنْ يَّكُوْنَ لَهٗ وَلَدٌ ۘ لَهٗ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَمَا فِى الْاَرْضِۗ وَكَفٰى بِاللّٰهِ وَكِيْلًا ࣖ

yā ahlal-kitābi lā taglū fī dīnikum wa lā taqūlū ‘alallāhi illal-ḥaqq(a), innamal-masīḥu ‘īsabnu maryama rasūlullāhi wa kalimatuh(ū), alqāhā ilā maryama wa rūḥum minh(u), fa āminū billāhi wa rusulih(ī), wa lā taqūlū ṡalāṡah(tun), inntahū khairal lakum innamallāhu ilāhuw wāḥid(un), subḥānahū ay yakūna lahū walad(un), lahū mā fis-samāwāti wa mā fil-arḍ(i), wa kafā billāhi wakīlā(n).

हे किताबक लोक ! अपन धर्म मे सीमा स बाहर नहि जाउ, आ अल्लाह के बारे मे किछु नहि कहब सिवाय जे सत्य अछि। सचमुच, मरियम के पुत्र मसीहा ईसा अल्लाह के दूत छेलै आरू (जेकरऽ रचना करलऽ गेलऽ छेलै) ओकरऽ शब्द जे वू मरियम के पास पहुँचैलकै, आरू (उड़ाबै के साथ) ओकरा स॑ एगो आत्मा छेलै । त अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह पर विश्वास करू आ ई नहि कहब जे "(ईश्वर) तीन छथि," (एना कहब सँ) बंद करू। (से) अहाँक लेल नीक अछि। सचमुच, अल्लाह सर्वशक्तिमान भगवान छै, संतान पैदा करै के (धारणा) स॑ धन्य छै । आकाश मे जे किछु अछि आ पृथ्वी पर जे किछु अछि से हुनके अछि | आ रक्षक के रूप में अल्लाह पर्याप्त छथि।


174
Q.S अन-निसा (4:174)

يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاۤءَكُمْ بُرْهَانٌ مِّنْ رَّبِّكُمْ وَاَنْزَلْنَآ اِلَيْكُمْ نُوْرًا مُّبِيْنًا

yā ayyuhan-nāsu qad jā'akum burhānum mir rabbikum wa anzalnā ilaikum nūram mubīnā(n).

हे लोक! सचमुच, अहाँक रब (मुहम्मद अपन चमत्कार सभक संग) सँ सच्चाईक प्रमाण अहाँ सभ लग आबि गेल अछि आ हम सभ अहाँ सभ लग एकटा तेज रोशनी (कुरान) उतारने छी।


19
Q.S अल-मैदाह (5:19)

يٰٓاَهْلَ الْكِتٰبِ قَدْ جَاۤءَكُمْ رَسُوْلُنَا يُبَيِّنُ لَكُمْ عَلٰى فَتْرَةٍ مِّنَ الرُّسُلِ اَنْ تَقُوْلُوْا مَا جَاۤءَنَا مِنْۢ بَشِيْرٍ وَّلَا نَذِيْرٍۗ فَقَدْ جَاۤءَكُمْ بَشِيْرٌ وَّنَذِيْرٌ ۗوَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ ࣖ

yā ahlal-kitābi qad jā'akum rasūlunā yubayyinu lakum ‘alā fatratim minar-rusuli an taqūlū mā jā'anā mim basyīriw wa lā nażīr(in), faqad jā'akum basyīruw wa nażīr(un), wallāhu ‘alā kulli syai'in qadīr(un).

हे किताबक लोक ! सचमुच, हमर सभक दूत अहाँ सभ लग आबि गेल छथि, अहाँ सभ केँ (हमर सभक नियम) बुझबैत छथि जे कखन दूत सभक (प्रेषण) मे बाधा आयल, जाहि सँ अहाँ सभ ई नहि कहब जे, "हमरा सभ लग कियो नहि आयल अछि आ ने शुभ समाचार वाहक आ ने चेतावनी देबयवला।" सत्ते, अहाँ लग एकटा शुभ समाचार वाहक आ चेतनिहार आबि गेल अछि। आ अल्लाह सब किछु पर सर्वशक्तिमान छथि।


66
Q.S अल-मैदाह (5:66)

وَلَوْ اَنَّهُمْ اَقَامُوا التَّوْرٰىةَ وَالْاِنْجِيْلَ وَمَآ اُنْزِلَ اِلَيْهِمْ مِّنْ رَّبِّهِمْ لَاَكَلُوْا مِنْ فَوْقِهِمْ وَمِنْ تَحْتِ اَرْجُلِهِمْۗ مِنْهُمْ اُمَّةٌ مُّقْتَصِدَةٌ ۗ وَكَثِيْرٌ مِّنْهُمْ سَاۤءَ مَا يَعْمَلُوْنَ ࣖ

wa lau annahum aqāmut-taurāta wal-injīla wa mā unzila ilaihim mir rabbihim la'akalū min fauqihim wa min taḥti arjulihim, minhum ummatum muqtaṣidah(tun), wa kaṡīrum minhum sā'a mā ya‘malūn(a).

आरू अगर वू सही मायने में तोराह, सुसमाचार आरू (कुरान) के (नियम) के पालन करतै जे ओकरा सिनी के प्रभु के तरफ सें उतरलोॅ गेलोॅ छेलै, तबेॅ ओकरा सिनी कॅ ओकरा सिनी के ऊपर सें आरो पैर के नीचें सें भोजन जरूर मिलतै। ओहि मे इमानदार आ आज्ञाकारी लोकक एकटा समूह छल। आ कतेको गोटे जे काज करैत छथि ताहि मे बहुत खराब छथि।


68
Q.S अल-मैदाह (5:68)

قُلْ يٰٓاَهْلَ الْكِتٰبِ لَسْتُمْ عَلٰى شَيْءٍ حَتّٰى تُقِيْمُوا التَّوْرٰىةَ وَالْاِنْجِيْلَ وَمَآ اُنْزِلَ اِلَيْكُمْ مِّنْ رَّبِّكُمْ ۗوَلَيَزِيْدَنَّ كَثِيْرًا مِّنْهُمْ مَّآ اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَّبِّكَ طُغْيَانًا وَّكُفْرًاۚ فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْكٰفِرِيْنَ

qul yā ahlal-kitābi lastum ‘alā syai'in ḥattā tuqīmut-taurāta wal-injīla wa mā unzila ilaikum mir rabbikum, wa layazīdanna kaṡīram minhum mā unzila ilaika mir rabbika ṭugyānaw wa kufrā(n), falā ta'sa ‘alal-qaumil-kāfirīn(a).

कहू (मुहम्मद), "हे किताब के लोग! तोरा कनिको धार्मिक नै मानल जाइत अछि जाबे तक तोराह, सुसमाचार आ (कुरान) के शिक्षा के पालन नै करब जे तोहर प्रभु अहाँ सब पर उतारने छथि।" आ जे अहाँक प्रभु अहाँ पर प्रकट केने छथि से निश्चित रूप सँ हुनका सभ मे सँ बहुतो केँ बेसी आज्ञाकारी आ बेसी अवज्ञाकारी बना देत, तेँ जे अविश्वास करैत छथि हुनका सँ निराश नहि होउ।


81
Q.S अल-मैदाह (5:81)

وَلَوْ كَانُوْا يُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَالنَّبِيِّ وَمَآ اُنْزِلَ اِلَيْهِ مَا اتَّخَذُوْهُمْ اَوْلِيَاۤءَ وَلٰكِنَّ كَثِيْرًا مِّنْهُمْ فٰسِقُوْنَ

wa lau kānū yu'minūna billāhi wan-nabiyyi wa mā unzila ilaihi mattakhażūhum auliyā'a wa lākinna kaṡīram minhum fāsiqūn(a).

आ जँ ओ सभ अल्लाह, नबी (मुहम्मद) पर आ जे किछु हुनका पर उतारल गेल छल ताहि पर विश्वास कएने रहितथि तँ ओ सभ मुश्रिक सभकेँ अपन वफादार मित्र नहि बना दैतथि । मुदा ओहि मे सँ बहुतो दुष्ट लोक छथि।


83
Q.S अल-मैदाह (5:83)

وَاِذَا سَمِعُوْا مَآ اُنْزِلَ اِلَى الرَّسُوْلِ تَرٰٓى اَعْيُنَهُمْ تَفِيْضُ مِنَ الدَّمْعِ مِمَّا عَرَفُوْا مِنَ الْحَقِّۚ يَقُوْلُوْنَ رَبَّنَآ اٰمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشّٰهِدِيْنَ

wa iżā sami‘ū mā unzila ilar-rasūli tarā a‘yunahum tafīḍu minad-dam‘i mimmā ‘arafū minal-ḥaqq(i), yaqūlūna rabbanā āmannā faktubnā ma‘asy-syāhidīn(a).

आरू जबेॅ वू सब सुनलकै कि (कुरान) रसूलुल्लाह (मुहम्मद) के सामने जे कुछ उतारलऽ गेलऽ छेलै, त॑ तोहें देखलकै कि ओकरऽ आँखऽ सें नोर बहा रहलऽ छै, कैन्हेंकि वू सच्चाई के कारण छेलै जेकरा वू (अपनऽ किताबऽ सें) जानत॑ छेलै, कहै छेलै, "हे प्रभु, हम्में विश्वास करी लेल॑ छियै, ई लेली हमरा सिनी क॑ वू लोगऽ के साथ रिकॉर्ड में डालऽ जे (कुरान केरऽ सच्चाई आरू मुहम्मद केरऽ पैगम्बर केरऽ) गवाह छै ।


19
Q.S अल-अन'अम (6:19)

قُلْ اَيُّ شَيْءٍ اَكْبَرُ شَهَادَةً ۗ قُلِ اللّٰهُ ۗشَهِيْدٌۢ بَيْنِيْ وَبَيْنَكُمْ ۗوَاُوْحِيَ اِلَيَّ هٰذَا الْقُرْاٰنُ لِاُنْذِرَكُمْ بِهٖ وَمَنْۢ بَلَغَ ۗ اَىِٕنَّكُمْ لَتَشْهَدُوْنَ اَنَّ مَعَ اللّٰهِ اٰلِهَةً اُخْرٰىۗ قُلْ لَّآ اَشْهَدُ ۚ قُلْ اِنَّمَا هُوَ اِلٰهٌ وَّاحِدٌ وَّاِنَّنِيْ بَرِيْۤءٌ مِّمَّا تُشْرِكُوْنَ

qul ayyu syai'in akbaru syahādah(tan), qulillāhu syahīdum bainī wa bainakum, wa ūḥiya ilayya hāżal-qur'ānu li'unżirakum bihī wa man balag(a), a'innakum latasyhadūna anna ma‘allāhi ālihatan ukhrā, qul lā asyhad(u), qul innamā huwa ilāhuw wāḥiduw wa innanī barī'um mimmā tusyrikūn(a).

कहू (मुहम्मद) "ककर गवाही बेसी मजबूत अछि?" कहब, "अल्लाह, ओ हमरा आ अहाँक बीच गवाह छथि। ई कुरान हमरा एहि लेल उतारल गेल अछि जे हम अहाँ केँ आ जे लोक केँ (हुनका कुरान) लग अबैत छथि हुनका चेतावनी द' सकब। की अहाँ सचमुच गवाही द' सकैत छी जे अल्लाहक संग अन्य देवता सेहो छथि?" कहू, “हम गवाही नहि दऽ सकैत छी।” कहब, "सत्ते, केवल ओ सर्वशक्तिमान भगवान छथि आ हम अहाँक कोनो चीज सँ मुक्त छी जे अहाँ (अल्लाह) सँ जोड़ैत छी।"


20
Q.S अल-अन'अम (6:20)

اَلَّذِيْنَ اٰتَيْنٰهُمُ الْكِتٰبَ يَعْرِفُوْنَهٗ كَمَا يَعْرِفُوْنَ اَبْنَاۤءَهُمْۘ اَلَّذِيْنَ خَسِرُوْٓا اَنْفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُوْنَ ࣖ

al-lażīna ātaināhumul-kitāba ya‘rifūnahū kamā ya‘rifūna abnā'ahum, al-lażīna khasirū anfusahum fahum lā yu'minūn(a).

जिनका हम किताब देने छी, ओ हुनका (मुहम्मद) के ओहिना जनैत छथि जेना अपन संतान के जनैत छथि | जे अपना के नुकसान पहुँचबैत अछि, ओ (अल्लाह) पर विश्वास नहि करैत अछि।


90
Q.S अल-अन'अम (6:90)

اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ هَدَى اللّٰهُ فَبِهُدٰىهُمُ اقْتَدِهْۗ قُلْ لَّآ اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًاۗ اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٰى لِلْعٰلَمِيْنَ ࣖ

ulā'ikal-lażīna hadallāhu fa bihudāūhumuqtadih, qul lā as'alukum ‘alaihi ajrā(n), in huwa illā żikrā lil-‘ālamīn(a).

ई ओ सब (नबी) छथि जिनका अल्लाह के मार्गदर्शन भेटल छनि, ताहि लेल हुनकर मार्गदर्शन के पालन करू। (मुहम्मद) कहू, "हम (कुरान) के संप्रेषण के बदला में अहाँ स किछु नहि मांगैत छी।" कुरान पूरा दुनिया मे (सब लोक) के लेल चेतावनी के अलावा किछु नहि अछि।


114
Q.S अल-अन'अम (6:114)

اَفَغَيْرَ اللّٰهِ اَبْتَغِيْ حَكَمًا وَّهُوَ الَّذِيْٓ اَنْزَلَ اِلَيْكُمُ الْكِتٰبَ مُفَصَّلًا ۗوَالَّذِيْنَ اٰتَيْنٰهُمُ الْكِتٰبَ يَعْلَمُوْنَ اَنَّهٗ مُنَزَّلٌ مِّنْ رَّبِّكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُوْنَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِيْنَ

afagairallāhi abtagī ḥakamaw wa huwal-lażī anzala ilaikumul-kitāba mufaṣṣalā(n), wal-lażīna ātaināhumul-kitāba ya‘lamūna annahū munazzalum mir rabbika bil-ḥaqqi falā takunanna minal-mumtarīn(a).

की हमरा अल्लाह के अलावा कोनो अन्य न्यायाधीश के खोज करबाक चाही, जखन कि ओ छथि जे अहाँ के किताब (कुरान) के विस्तार स उतारने छथि? जिनका हम किताब देने छी से जनैत छथि जे ई अहाँक प्रभु सँ सत्य मे प्रकट भेल अछि | तेँ संदेह करयवला मे नहि रहू।


158
Q.S अल-अ'रफ (7:158)

قُلْ يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ اِنِّيْ رَسُوْلُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْ جَمِيْعًا ۨالَّذِيْ لَهٗ مُلْكُ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضِۚ لَآ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ يُحْيٖ وَيُمِيْتُۖ فَاٰمِنُوْا بِاللّٰهِ وَرَسُوْلِهِ النَّبِيِّ الْاُمِّيِّ الَّذِيْ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَكَلِمٰتِهٖ وَاتَّبِعُوْهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُوْنَ

qul yā ayyuhan-nāsu innī rasūlullāhi ilaikum jamī‘anil-lażī lahū mulkus-samāwāti wal-arḍ(i), lā ilāha illā huwa yuḥyī wa yumīt(u), fa āminū billāhi wa rasūlihin-nabiyyil-ummiyyil-lażī yu'minu billāhi wa kalimatihī wattabi‘ūhu la‘allakum tahtadūn(a).

कहू (मुहम्मद), "हे लोक! सचमुच, हम अहाँ सब के लेल अल्लाह के दूत छी, जे आकाश आ धरती के राज्य के मालिक छी; कोनो देवता (जिनका इबादत के अधिकार छै) नै छैथ, सिवाय हुनकर, जे जीवन दैत छैथ आ मृत्यु के कारण बनैत छैथ, ताहि लेल अहाँ सब अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह पर विश्वास करैत छी, (अर्थात) उम्मी पैगम्बर जे अल्लाह आ हुनकर वचन (हुनकर किताब) पर विश्वास करैत छथि)। हुनकर पाछाँ लागि जाउ, जाहि सँ अहाँ सभ केँ मार्गदर्शन भेटय।”


104
Q.S योना (10:104)

قُلْ يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ اِنْ كُنْتُمْ فِيْ شَكٍّ مِّنْ دِيْنِيْ فَلَآ اَعْبُدُ الَّذِيْنَ تَعْبُدُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّٰهِ وَلٰكِنْ اَعْبُدُ اللّٰهَ الَّذِيْ يَتَوَفّٰىكُمْ ۖ وَاُمِرْتُ اَنْ اَكُوْنَ مِنَ الْمُؤْمِنِيْنَۙ

qul yā ayyuhan nāsu in kuntum fī syakkim min dīnī falā a‘budul-lażīna ta‘budūna min dūnillāhi wa lākin a‘budullāhal-lażī yatawaffākum, wa umirtu an akūna minal-mu'minīn(a).

(हे मुहम्मद) कहू, "हे मनुष्य! जँ अहाँ केँ एखनो हमर धर्म पर संदेह अछि, तखन (जानू जे) हम अल्लाह के अलावा जिनकर पूजा करैत छी, हुनकर पूजा नहि करैत छी, बल्कि हम अल्लाह के इपासना करैत छी जे अहाँ के मौत के कारण बनौताह, आ हमरा मुसलमान मे रहबाक आज्ञा देल गेल अछि।"


108
Q.S योना (10:108)

قُلْ يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاۤءَكُمُ الْحَقُّ مِنْ رَّبِّكُمْ ۚفَمَنِ اهْتَدٰى فَاِنَّمَا يَهْتَدِيْ لِنَفْسِهٖ ۚوَمَنْ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۚوَمَآ اَنَا۠ عَلَيْكُمْ بِوَكِيْلٍۗ

qul yā ayyuhan-nāsu qad jā'akumul-ḥaqqu mir rabbikum, fa manihtadā fa innamā yahtadī linafsih(ī), wa man ḍalla fa innamā yaḍillu ‘alaihā, wa mā ana ‘alaikum biwakīl(in).

(मुहम्मद) कहू, "हे लोक! सच्चाई (कुरान) अहाँ सभक पास अहाँक रब सँ आयल अछि, तेँ जे कियो मार्गदर्शन प्राप्त करैत अछि, ओ वास्तव मे (मार्गदर्शन) अपन (नीक) लेल अछि। आ जे कियो भटकैत अछि, ओ सचमुच ओकर भ्रामकता (हानि) करैत अछि। आ हम अहाँक रक्षक नहि छी।"


36
Q.S अर-रा'द (13:36)

وَالَّذِيْنَ اٰتَيْنٰهُمُ الْكِتٰبَ يَفْرَحُوْنَ بِمَآ اُنْزِلَ اِلَيْكَ وَمِنَ الْاَحْزَابِ مَنْ يُّنْكِرُ بَعْضَهٗ ۗ قُلْ اِنَّمَآ اُمِرْتُ اَنْ اَعْبُدَ اللّٰهَ وَلَآ اُشْرِكَ بِهٖ ۗاِلَيْهِ اَدْعُوْا وَاِلَيْهِ مَاٰبِ

wal-lażīna ātaināhumul-kitāba yafraḥūna bimā unzila ilaika wa minal-aḥzābi may yunkiru ba‘ḍah(ū), qul innamā umirtu an a‘budallāha wa lā usyrika bih(ī), ilaihi ad‘ū wa ilaihi ma'āb(i).

आरू जेकरा हम्में किताब देल॑ छियै, वू तोरा (हे मुहम्मद) के सामने जे कुछ प्रकट होय गेलऽ छै, ओकरा पर आनन्दित होय छै, आरू कुछ (यहूदी आरू ईसाई) भी छै जे ओकरा म॑ स॑ कुछ के नकार॑ छै । कहू, "हमरा केवल अल्लाह के इबादत करबाक आज्ञा देल गेल अछि आ हुनका संग कोनो बात नहि करबाक आज्ञा देल गेल अछि। हम हुनका लग (लोक) बजबैत छी आ हुनका लग वापस आबि जाइत छी।"


64
Q.S अन-नहल (16:64)

وَمَآ اَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتٰبَ اِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ الَّذِى اخْتَلَفُوْا فِيْهِۙ وَهُدًى وَّرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُّؤْمِنُوْنَ

wa mā anzalnā ‘alaikal-kitāba illā litubayyina lahumul-lażikhtalafū fīh(i), wa hudaw wa raḥmatal liqaumiy yu'minūn(a).

आ हम ई किताब (कुरान) अहाँ (मुहम्मद) के पास नै पठौने छी, बल्कि एहि लेल जे अहाँ हुनका सब के बुझा सकब जे ओ सब की विवाद करैत छथि, आ विश्वास करय वाला के लेल मार्गदर्शक आ दया बनब।


107
Q.S अल-अनबिया (21:107)

وَمَآ اَرْسَلْنٰكَ اِلَّا رَحْمَةً لِّلْعٰلَمِيْنَ

wa mā arsalnāka illā raḥmatal lil-‘ālamīn(a).

आ हम अहाँकेँ (मुहम्मद) नहि पठेलहुँ अपितु समस्त लोकक दया (बन) लेल पठेलहुँ।


49
Q.S अल-हज (22:49)

قُلْ يٰٓاَيُّهَا النَّاسُ اِنَّمَآ اَنَا۠ لَكُمْ نَذِيْرٌ مُّبِيْنٌ ۚ

qul yā ayyuhan-nāsu innamā ana lakum nażīrum mubīn(un).

(मुहम्मद) कहू, "हे लोक! सचमुच, हम अहाँ सब लग स्पष्ट चेतावनी के रूप में (पेजल गेल) छी।"


1
Q.S अल-फुरकान (25:1)

تَبٰرَكَ الَّذِيْ نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلٰى عَبْدِهٖ لِيَكُوْنَ لِلْعٰلَمِيْنَ نَذِيْرًا ۙ

tabārakal-lażī nazzalal-furqāna ‘alā ‘abdihī liyakūna lil-‘ālamīna nażīrā(n).

महिमा अल्लाह के हो जे फुरकान (अल-कुरान) के अपन सेवक (मुहम्मद) के पास भेजने छैथ, ताकि ओ सब प्रकृति (जिन्न आ मनुष्य) के लेल चेतावनी बनि जाय।


51
Q.S अल-फुरकान (25:51)

وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِيْ كُلِّ قَرْيَةٍ نَّذِيْرًا ۖ

wa lau syi'nā laba‘aṡnā fī kulli qaryatin nażīrā(n).

आ जँ हम सभ चाहितहुँ तँ हरेक भूमि पर एकटा चेतावक पठा दैतहुँ ।


28
Q.S सबा (34:28)

وَمَآ اَرْسَلْنٰكَ اِلَّا كَاۤفَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيْرًا وَّنَذِيْرًا وَّلٰكِنَّ اَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُوْنَ

wa mā arsalnāka illā kāffatal lin-nāsi basyīraw wa nażīraw wa lākinna akṡaran-nāsi lā ya‘lamūn(a).

आ हम अहाँ (मुहम्मद) के नहि पठेलहुँ, बल्कि सब मनुष्य के शुभ समाचार के वाहक के रूप में आ चेतावनी देबय वाला के रूप में पठेलहुं, मुदा बेसी लोक के ई पता नै छै।


41
Q.S अज-जुमार (39:41)

اِنَّآ اَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْكِتٰبَ لِلنَّاسِ بِالْحَقِّۚ فَمَنِ اهْتَدٰى فَلِنَفْسِهٖۚ وَمَنْ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۚوَمَآ اَنْتَ عَلَيْهِمْ بِوَكِيْلٍ ࣖ

innā anzalnā ‘alaikal-kitāba lin-nāsi bil-ḥaqq(i), fa manihtadā fa linafsih(ī), wa man ḍalla fa innamā yaḍillu ‘alaihā, wa mā anta ‘alaihim biwakīl(in).

सचमुच, हम अहाँ सभ लग ओ किताब (कुरान) पठा देने छी जे मनुक्खक लेल सच्चाई अनैत अछि; जेकरा मार्गदर्शन तखन (मार्गदर्शन) भेटैत छैक से अपना लेल छैक, आ जे भटकैत छैक तखन निश्चय गलती अपना लेल छैक, आ ओकरा लेल अहाँ जिम्मेदार नहि छी।


6
Q.S अस-सफ (61:6)

وَاِذْ قَالَ عِيْسَى ابْنُ مَرْيَمَ يٰبَنِيْٓ اِسْرَاۤءِيْلَ اِنِّيْ رَسُوْلُ اللّٰهِ اِلَيْكُمْ مُّصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنَ التَّوْرٰىةِ وَمُبَشِّرًاۢ بِرَسُوْلٍ يَّأْتِيْ مِنْۢ بَعْدِى اسْمُهٗٓ اَحْمَدُۗ فَلَمَّا جَاۤءَهُمْ بِالْبَيِّنٰتِ قَالُوْا هٰذَا سِحْرٌ مُّبِيْنٌ

wa iż qāla ‘īsabnu maryama yā banī isrā'īla innī rasūlullāhi ilaikum muṣaddiqal limā baina yadayya minat-taurāti wa mubasysyiram birasūliy ya'tī mim ba‘dismuhū aḥmad(u), falammā jā'ahum bil-bayyināti qālū hāżā siḥrum mubīn(un).

आरू (याद रखऽ) जब॑ मरियम केरऽ बेटा ईसा कहलकै, "हे इस्राएल केरऽ संतान! सचमुच, हम्में तोरा सिनी लेली अल्लाह केरऽ दूत छियै, जे हमरा सामने केरऽ किताब (जे उतरलै) के पुष्टि करी रहलऽ छियै, यानी तोराह आरू एक रसूलुल्लाह के बारे म॑ खुशखबरी दै छै जे हमरा बाद आबै वाला छै, जेकरऽ नाम अहमद (मुहम्मद) छै।" मुदा जखन रसूलुल्लाह स्पष्ट प्रमाण ल' क' हुनका सभ लग आबि गेलाह त' ओ सभ कहलनि, "ई असली जादू अछि."


9
Q.S अस-सफ (61:9)

هُوَ الَّذِيْٓ اَرْسَلَ رَسُوْلَهٗ بِالْهُدٰى وَدِيْنِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهٗ عَلَى الدِّيْنِ كُلِّهٖۙ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُوْنَ ࣖ

wa huwal-lażī arsala rasūlahū bil-hudā wa dīnil-ḥaqqi liyuẓhirahū ‘alad-dīni kullih(ī), wa lau karihal-musyrikūn(a).

ओ वैह छथि जे अपन दूत केँ मार्गदर्शन आ सत्यक धर्मक संग पठौलनि, जे एकरा सभ धर्म पर विजयी बनाबथि, भले ही मुश्रिक एकरा सँ घृणा करैत होथि |


3
Q.S अल-जुमुअह (62:3)

وَّاٰخَرِيْنَ مِنْهُمْ لَمَّا يَلْحَقُوْا بِهِمْۗ وَهُوَ الْعَزِيْزُ الْحَكِيْمُۙ

wa ākharīna minhum lammā yalḥaqū bihim, wa huwal-‘azīzul-ḥakīm(u).

आ (संगहि) जे हुनका लोकनिक संपर्क मे नहि आयल छथि हुनका सँ दोसर लोक केँ सेहो। आ ओ परम पराक्रमी, परम बुद्धिमान छथि।


52
Q.S अल-कलाम (68:52)

وَمَا هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعٰلَمِيْنَ ࣖ

wa mā huwa illā żikrul lil-‘ālamīn(a).

जखन कि (कुरान) प्रकृति के सब के लेल चेतावनी के अलावा किछु नै अछि |


27
Q.S अत-तकवीर (81:27)

اِنْ هُوَ اِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعٰلَمِيْنَۙ

in huwa illā żikrul lil-‘ālamīn(a).

(अल-कुरान) सब प्रकृति के चेतावनी के अलावा कुछ भी नै छै,


1
Q.S अल-बैयिनाह (98:1)

لَمْ يَكُنِ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ اَهْلِ الْكِتٰبِ وَالْمُشْرِكِيْنَ مُنْفَكِّيْنَ حَتّٰى تَأْتِيَهُمُ الْبَيِّنَةُۙ

lam yakunil-lażīna kafarū min ahlil-kitābi wal-musyrikīna munfakkīna ḥattā ta'tiyahumul-bayyinah(tu).

किताब के लोक आ मुश्रिक मे स काफिर करय वाला (अपन धर्म) ता धरि नहि छोड़त जा धरि हुनका लग स्पष्ट प्रमाण नहि आबि जायत,


4
Q.S अल-बैयिनाह (98:4)

وَمَا تَفَرَّقَ الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ اِلَّا مِنْۢ بَعْدِ مَا جَاۤءَتْهُمُ الْبَيِّنَةُ ۗ

wa mā tafarraqal-lażīna ūtul-kitāba illā mim ba‘di mā jā'athumul-bayyinah(tu).

आ किताबक लोक ताबत धरि बँटवारा नहि भेल जाबत धरि हुनका सभ लग स्पष्ट प्रमाण नहि आबि गेलनि ।


6
Q.S अल-बैयिनाह (98:6)

اِنَّ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ اَهْلِ الْكِتٰبِ وَالْمُشْرِكِيْنَ فِيْ نَارِ جَهَنَّمَ خٰلِدِيْنَ فِيْهَاۗ اُولٰۤىِٕكَ هُمْ شَرُّ الْبَرِيَّةِۗ

innal-lażīna kafarū min ahlil-kitābi wal-musyrikīna fī nāri jahannama khālidīna fīhā, ulā'ika hum syarrul-bariyyah(ti).

सचमुच, जे किताबक लोक आ मुश्रिक मे सँ काफिर करत, ओ (प्रवेश करत) नरक मे; ओ सभ ओहि मे सदिखन रहत। प्राणी जकाँ दुष्ट छथि।