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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Sejarah Hijrah Persiapan Untuk Hijrah Berhijrah di jalan allah

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कुल आयत : 13
218
Q.S अल-बकराह (2:218)

اِنَّ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَالَّذِيْنَ هَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۙ اُولٰۤىِٕكَ يَرْجُوْنَ رَحْمَتَ اللّٰهِ ۗوَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

innal-lażīna āmanū wal-lażīna hājarū wa jāhadū fī sabīlillāh(i), ulā'ika yarjūna raḥmatallāh(i), wallāhu gafūrur raḥīm(un).

सचमुच, जे विश्वास करै छै, आरू जे प्रवास करै छै आरू अल्लाह के रास्ता में प्रयास करै छै, वू ही अल्लाह के दया के आशा करै छै। अल्लाह क्षमाशील, परम दयालु छथि।


195
Q.S अली इमरान (3:195)

فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ اَنِّيْ لَآ اُضِيْعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِّنْكُمْ مِّنْ ذَكَرٍ اَوْ اُنْثٰى ۚ بَعْضُكُمْ مِّنْۢ بَعْضٍ ۚ فَالَّذِيْنَ هَاجَرُوْا وَاُخْرِجُوْا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاُوْذُوْا فِيْ سَبِيْلِيْ وَقٰتَلُوْا وَقُتِلُوْا لَاُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّاٰتِهِمْ وَلَاُدْخِلَنَّهُمْ جَنّٰتٍ تَجْرِيْ مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهٰرُۚ ثَوَابًا مِّنْ عِنْدِ اللّٰهِ ۗ وَاللّٰهُ عِنْدَهٗ حُسْنُ الثَّوَابِ

fastajāba lahum rabbuhum annī lā uḍī‘u ‘amala ‘āmilim minkum min żakarin au unṡā, ba‘ḍukum mim ba‘ḍ(in), fal-lażīna hājarū wa ukhrijū min diyārihim wa ūżū fī sabīlī wa qātalū wa qutilū la'ukaffiranna ‘anhum sayyi'ātihim wa la udkhilannahum jannātin tajrī min taḥtihal-anhār(u), ṡawābam min ‘indillāh(i), wallāhu ‘indahū ḥusnuṡ-ṡawāb(i).

तेँ हुनका लोकनिक प्रभु हुनका लोकनिक आग्रह (ई कहैत) केँ पूरा कयलनि, "सत्ते, हम अहाँ सभ मे सँ कियो नीक काज करय बला काज केँ बर्बाद नहि करैत छी, चाहे ओ पुरुष हो वा स्त्री, (कारण) अहाँ सभ मे सँ किछु गोटे दोसर सँ (वंशज) छी। तेँ जे लोकनि प्रवास कयलनि, आ अपन घर सँ निकालि देल गेलाह, आ हमर बाट मे नुकसान पहुँचल गेलाह, आ लड़लनि, आ मारल गेलाह, हम हुनका सभक दुष्कर्म केँ अवश्य लिखि क' नीचाँक गाछी मे प्रवेश देबनि।" जे नदी बहैत अछि, अल्लाह के इनाम के रूप में आ अल्लाह के संग एकटा नीक इनाम अछि।"


89
Q.S अन-निसा (4:89)

وَدُّوْا لَوْ تَكْفُرُوْنَ كَمَا كَفَرُوْا فَتَكُوْنُوْنَ سَوَاۤءً فَلَا تَتَّخِذُوْا مِنْهُمْ اَوْلِيَاۤءَ حَتّٰى يُهَاجِرُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۗ فَاِنْ تَوَلَّوْا فَخُذُوْهُمْ وَاقْتُلُوْهُمْ حَيْثُ وَجَدْتُّمُوْهُمْ ۖ وَلَا تَتَّخِذُوْا مِنْهُمْ وَلِيًّا وَّلَا نَصِيْرًاۙ

waddū lau takfurūna kamā kafarū fa takūnūna sawā'an falā tattakhiżū minhum auliyā'a ḥattā yuhājirū fī sabīlillāh(i), fa in tawallau fa khużūhum waqtulūhum ḥaiṡu wajattumūhum, wa lā tattakhiżū minhum waliyyaw wa lā naṣīrā(n).

ओ सभ चाहैत छथि जे अहाँ सभ ओहिना काफिर बनि जाउ जेना ओ सभ काफिर बनि गेल छथि, जाहि सँ अहाँ सभ ओहिना भ' जाउ (हुनका सभक संग)। जाबे तक ओ अल्लाह के रास्ता पर नै आबि जायत ताबे तक हुनका सब में स कोनो के अपन दोस्त नै बनाउ। जँ ओ सभ मुँह घुमा लेत तँ ओकरा सभकेँ बंदी बनाउ आ जतय भेटत ओतय ओकरा सभकेँ मारि दियौक आ ओकरा सभमे सँ किनको निष्ठावान मित्र वा सहायक नहि बनाउ।


97
Q.S अन-निसा (4:97)

اِنَّ الَّذِيْنَ تَوَفّٰىهُمُ الْمَلٰۤىِٕكَةُ ظَالِمِيْٓ اَنْفُسِهِمْ قَالُوْا فِيْمَ كُنْتُمْ ۗ قَالُوْا كُنَّا مُسْتَضْعَفِيْنَ فِى الْاَرْضِۗ قَالُوْٓا اَلَمْ تَكُنْ اَرْضُ اللّٰهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوْا فِيْهَا ۗ فَاُولٰۤىِٕكَ مَأْوٰىهُمْ جَهَنَّمُ ۗ وَسَاۤءَتْ مَصِيْرًاۙ

innal-lażīna tawaffāhumul-malā'ikatu ẓālimī anfusihim qālū fīma kuntum, qālū kunnā mustaḍ‘afīna fil-arḍ(i), qālū alam takun arḍullāhi wāsi‘atan fa tuhājirū fīhā, fa ulā'ika ma'wāhum jahannam(u), wa sā'at maṣīrā(n).

सचमुच, जिनकर जान स्वर्गदूत अपना पर अत्याचार के अवस्था में छीन लेलक, ओ सब (स्वर्गदूत) पुछलखिन, "अहाँ केहन छी?" ओ सभ उत्तर देलक, "हम सभ पृथ्वी (मक्का) पर उत्पीड़ित लोक छी।" ओ सभ (फरिश्ता सभ) पुछलनि, "की अल्लाहक धरती चौड़ा नहि अछि, जाहि सँ अहाँ सभ एहि पर प्रवास (इम्हर-उम्हर) क' सकब?" त ओ लोक नरक मे छथि, आ ओ (जहानम) घुरबाक लेल सबसँ खराब जगह अछि,


100
Q.S अन-निसा (4:100)

۞ وَمَنْ يُّهَاجِرْ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ يَجِدْ فِى الْاَرْضِ مُرٰغَمًا كَثِيْرًا وَّسَعَةً ۗوَمَنْ يَّخْرُجْ مِنْۢ بَيْتِهٖ مُهَاجِرًا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ اَجْرُهٗ عَلَى اللّٰهِ ۗوَكَانَ اللّٰهُ غَفُوْرًا رَّحِيْمًا ࣖ

wa may yuhājir fī sabīlillāhi yajid fil-arḍi murāgaman kaṡīraw wa sa‘ah(tan), wa may yakhruj mim baitihī muhājiran ilallāhi wa rasūlihī ṡumma yudrik-hul-mautu faqad waqa‘a ajruhū ‘alallāh(i), wa kānallāhu gafūrar raḥīmā(n).

आ जे कियो अल्लाह के रास्ता में प्रवास करत, ओकरा एहि धरती पर प्रवास के लेल एकटा विस्तृत जगह आ बहुत रास (जीविका) जरूर भेटतैक। जे कियो अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के लेल प्रवास करबाक इरादा स अपन घर स निकलैत अछि, तखन ओकरा पर मौत भ जाइत अछि (अपन मंजिल तक पहुंचबा स पहिने), तखन सचमुच ओकर इनाम अल्लाह के संग स्थापित भ गेल अछि। आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


72
Q.S अल-अनफल (8:72)

اِنَّ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَالَّذِيْنَ اٰوَوْا وَّنَصَرُوْٓا اُولٰۤىِٕكَ بَعْضُهُمْ اَوْلِيَاۤءُ بَعْضٍۗ وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَلَمْ يُهَاجِرُوْا مَا لَكُمْ مِّنْ وَّلَايَتِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ حَتّٰى يُهَاجِرُوْاۚ وَاِنِ اسْتَنْصَرُوْكُمْ فِى الدِّيْنِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ اِلَّا عَلٰى قَوْمٍۢ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِّيْثَاقٌۗ وَاللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُوْنَ بَصِيْرٌ

innal-lażīna āmanū wa hājarū wa jāhadū bi'amwālihim wa anfusihim fī sabīlillāhi wal-lażīna āwaw wa naṣarū ulā'ika ba‘ḍuhum auliyā'u ba‘ḍ(in), wal-lażīna āmanū wa lam yuhājirū mā lakum miw walāyatihim min syai'in ḥattā yuhājirū, wa inistanṣarūkum fid-dīni fa ‘alaikumun naṣru illā ‘alā qaumim bainakum wa bainahum mīṡāq(un), wallāhu bimā ta‘malūna baṣīr(un).

सचमुच, जे लोग विश्वास करै छै आरू प्रवास करै छै आरू अपनऽ धन आरू आत्मा के साथ अल्लाह के रास्ता में प्रयास करै छै आरू जे (मुहाजिरीन के) आश्रय दै छै आरू सहायता करै छै, वू एक-दूसरा के रक्षा करै छै। आ (जेकरा लेल) जे विश्वास करैत छथि मुदा प्रवास नहि केने छथि, हुनका सभक रक्षा करबाक अहाँक कोनो दायित्व नहि अछि, जाबत धरि ओ प्रवास नहि करैत छथि | (मुदा) जँ ओ सभ अहाँसँ धर्म (रक्षा)मे मददि माँगैत छथि तँ अहाँकेँ ओहि लोककेँ छोड़ि मददि देबाक बाध्यता अछि जे अहाँ आ हुनका सभक बीच समझौता कएने छथि। आ अल्लाह अहाँक काजक सर्वदर्शी छथि।


74
Q.S अल-अनफल (8:74)

وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَالَّذِيْنَ اٰوَوْا وَّنَصَرُوْٓا اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْمُؤْمِنُوْنَ حَقًّاۗ لَهُمْ مَّغْفِرَةٌ وَّرِزْقٌ كَرِيْمٌ

wal-lażīna āmanū wa hājarū wa jāhadū fī sabīlillāhi wal-lażīna āwaw wa naṣarū ulā'ika humul-mu'minūna ḥaqqā(n), lahum magfirtuw wa rizqun karīm(un).

आरू जे लोग विश्वास करै छै आरू प्रवास करै छै आरू अल्लाह के रास्ता पर प्रयास करै छै, आरू जे लोग (मुहाजिरीन के) आश्रय दै छै आरू सहायता करै छै, वू सच्चा मुसलमान छै। क्षमा आ उदात्त पोषण (अनुग्रह) प्राप्त करैत छथि |


20
Q.S अत-तौबाह (9:20)

اَلَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَهَاجَرُوْا وَجَاهَدُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ بِاَمْوَالِهِمْ وَاَنْفُسِهِمْۙ اَعْظَمُ دَرَجَةً عِنْدَ اللّٰهِ ۗوَاُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْفَاۤىِٕزُوْنَ

allażīna āmanū wa hājarū wa jāhadū fī sabīlillāhi bi'amwālihim wa anfusihim, a‘ẓamu darajatan ‘indallāh(i), wa ulā'ika humul-fā'izūn(a).

जे लोग विश्वास करै छै आरू प्रवास करै छै आरू अपनऽ धन आरू आत्मा के साथ अल्लाह के रास्ता पर प्रयास करै छै, वू अल्लाह के नजर म॑ उच्च पद के छै । ओ सभ जीतैत छथि।


41
Q.S अन-नहल (16:41)

وَالَّذِيْنَ هَاجَرُوْا فِى اللّٰهِ مِنْۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوْا لَنُبَوِّئَنَّهُمْ فِى الدُّنْيَا حَسَنَةً ۗوَلَاَجْرُ الْاٰخِرَةِ اَكْبَرُۘ لَوْ كَانُوْا يَعْلَمُوْنَۙ

wal-lażīna hājarū fillāhi mim ba‘di mā ẓulimū lanubawwi'annahum fid-dun-yā ḥasanah(tan), wa la'ajrul-ākhirati akbar(u), lau kānū ya‘lamūn(a).

आ जे अन्याय के बाद अल्लाह के खातिर प्रवास करत, हम ओकरा दुनिया में नीक जगह जरूर देब। आ परलोक मे फल अवश्य बेसी होयत, जँ हुनका लोकनि केँ ई बुझल रहैत।


58
Q.S अल-हज (22:58)

وَالَّذِيْنَ هَاجَرُوْا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ثُمَّ قُتِلُوْٓا اَوْ مَاتُوْا لَيَرْزُقَنَّهُمُ اللّٰهُ رِزْقًا حَسَنًاۗ وَاِنَّ اللّٰهَ لَهُوَ خَيْرُ الرّٰزِقِيْنَ

wal-lażīna hājarū fī sabīlillāhi ṡumma qutilū au mātū layarzuqannahumullāhu rizqan ḥasanā(n), wa innallāha lahuwa khairur-rāziqīn(a).

आ जे अल्लाह के रास्ता में प्रवास करैत छथि, तखन मारल जाइत छथि या मरैत छथि, सचमुच अल्लाह हुनका सौभाग्य (स्वर्ग) देताह | आ सचमुच अल्लाह उत्तम रोजी-रोटी के दाता छथि।


22
Q.S अन-नूर (24:22)

وَلَا يَأْتَلِ اُولُو الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَالسَّعَةِ اَنْ يُّؤْتُوْٓا اُولِى الْقُرْبٰى وَالْمَسٰكِيْنَ وَالْمُهٰجِرِيْنَ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۖوَلْيَعْفُوْا وَلْيَصْفَحُوْاۗ اَلَا تُحِبُّوْنَ اَنْ يَّغْفِرَ اللّٰهُ لَكُمْ ۗوَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

wa lā ya'tali ulul-faḍli minkum was-sa‘ati ay yu'tū ulil-qurbā wal-masākīna wal-muhājirīna fī sabīlillāh(i), wal ya‘fū wal yaṣfaḥū, alā tuḥibbūna ay yagfirallāhu lakum, wallāhu gafūrur raḥīm(un).

आरू जेकरा तोरा सिनी के बीच फायदा आरू अवसर छै, वू कसम नै खाय कि वू (अपनऽ) रिश्तेदार, गरीब आरू अल्लाह के रास्ता म॑ प्रवास करै वाला क॑ (नहीं) देतै, आरू ओकरा माफ करी क॑ सहिष्णु होय जाय । की अहाँ के ई नीक नहि लगैत अछि जे अल्लाह अहाँ के माफ क दैत छथि? आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


8
Q.S अल-'अंकबुत (29:8)

وَوَصَّيْنَا الْاِنْسَانَ بِوَالِدَيْهِ حُسْنًا ۗوَاِنْ جَاهَدٰكَ لِتُشْرِكَ بِيْ مَا لَيْسَ لَكَ بِهٖ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۗاِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَاُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ

wa waṣṣainal-insāna biwālidaihi ḥusnā(n), wa in jāhadāka litusyrika bī mā laisa laka bihī ‘ilmun falā tuṭi‘humā, ilayya marji‘ukum fa'unabbi'ukum bimā kuntum ta‘malūn(a).

आ हम मनुक्ख के अपन माता-पिता के नीक (करब) अनिवार्य बना देने छी। आ जँ ओ सभ हमरा कोनो एहन बातक संग जोड़बा लेल बाध्य करैत छथि जकर अहाँकेँ कोनो ज्ञान नहि अछि तँ हुनकर आज्ञा नहि मानू। अहाँक वापसी मात्र हमरा लग अछि, आ अहाँ जे केलहुँ से हम अहाँ केँ कहब।


8
Q.S अल-हशर (59:8)

لِلْفُقَرَاۤءِ الْمُهٰجِرِيْنَ الَّذِيْنَ اُخْرِجُوْا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُوْنَ فَضْلًا مِّنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانًا وَّيَنْصُرُوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ ۗ اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الصّٰدِقُوْنَۚ

lil-fuqarā'il-muhājirīnal-lażīna ukhrijū min diyārihim wa amwālihim yabtagūna faḍlam minallāhi wa riḍwānaw wa yanṣurūnallāha wa rasūlah(ū), ulā'ika humuṣ-ṣādiqūn(a).

(लूट सेहो) ओहि गरीब लोकक लेल अछि जे पलायन कएने छल जे अपन सासुर सँ निकालि देल गेल छल आ अल्लाह सँ कृपा आ (हुनकर) प्रसन्नताक लेल आ (उनकर) रसूलुल्लाहक (धर्मक) मदद करबाक चक्कर मे अपन सम्पत्ति छोड़ि गेल छल | ओ सभ सच्चा लोक छथि।