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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Bangsa-bangsa terdahulu Tugas para Nabi Menyeru kepada jalan Allah Cobaan pada saat berdakwah

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कुल आयत : 193
87
Q.S अल-बकराह (2:87)

وَلَقَدْ اٰتَيْنَا مُوْسَى الْكِتٰبَ وَقَفَّيْنَا مِنْۢ بَعْدِهٖ بِالرُّسُلِ ۖ وَاٰتَيْنَا عِيْسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنٰتِ وَاَيَّدْنٰهُ بِرُوْحِ الْقُدُسِۗ اَفَكُلَّمَا جَاۤءَكُمْ رَسُوْلٌۢ بِمَا لَا تَهْوٰىٓ اَنْفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ ۚ فَفَرِيْقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيْقًا تَقْتُلُوْنَ

wa laqad ātainā mūsal-kitāba wa qaffainā mim ba‘dihī bir-rusul(i), wa ātainā ‘īsabna maryamal-bayyināti wa ayyadnāhu birūḥil-qudus(i), afakullamā jā'akum rasūlum bimā lā tahwā anfusukumustakbartum, fafarīqan każżabtum wa farīqan taqtulūn(a).

आरू सचमुच, हम मूसा क॑ किताब (तोराह) देलऽ छेलियै, आरू हम्में प्रेरित सिनी के साथ ओकरऽ पीछू-पीछू चललऽ छेलियै, आरू हम्में मरियम केरऽ बेटा यीशु क॑ सच्चाई के प्रमाण देलकै आरू हम्में ओकरा पवित्र आत्मा (जिब्रिल) स॑ मजबूत करलियै । कियैक जखन-जखन कोनो दूत अहाँ लग कोनो चीज (पाठ) (आनैत) अबैत अछि जे अहाँ नहि चाहैत छी, अहाँ ओहि पर घमंड करैत छी, फेर ओहि मे सँ किछु पर झूठ बाजि दैत छी आ किछु केँ मारि दैत छी?


91
Q.S अल-बकराह (2:91)

وَاِذَا قِيْلَ لَهُمْ اٰمِنُوْا بِمَآ اَنْزَلَ اللّٰهُ قَالُوْا نُؤْمِنُ بِمَآ اُنْزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُوْنَ بِمَا وَرَاۤءَهٗ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُوْنَ اَنْۢبِيَاۤءَ اللّٰهِ مِنْ قَبْلُ اِنْ كُنْتُمْ مُّؤْمِنِيْنَ

wa iżā qīla lahum āminū bimā anzalallāhu qālū nu'minu bimā unzila ‘alainā wa yakfurūna bimā warā'ah(ū), wa huwal-ḥaqqu muṣaddiqal limā ma‘ahum, qul falima taqtulūna ambiyā'allāhi min qablu in kuntum mu'minīn(a).

आरू जब॑ ओकरा सिनी स॑ कहलऽ जाय छै कि, "अल्लाह जे कुछ (कुरान) क॑ उतारलऽ छै, ओकरा प॑ विश्वास करऽ," त॑ वू जवाब दै छै, "हमरा सब प॑ जे कुछ उतारलऽ गेलऽ छै ओकरा प॑ विश्वास करै छियै।" आरू जेकरा बाद आबै छै ओकरा नकार दै छै, भले ही (कुरान) वू सच्चाई छै जे ओकरा सिनी के साथ जे छै ओकरा जायज ठहराबै छै। (मुहम्मद) कहू, "अहाँ सब पहिने अल्लाह के पैगम्बर सब के कियैक मारने रही अगर अहाँ सब मुसलमान छलहुं?"


212
Q.S अल-बकराह (2:212)

زُيِّنَ لِلَّذِيْنَ كَفَرُوا الْحَيٰوةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُوْنَ مِنَ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا ۘ وَالَّذِيْنَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ۗ وَاللّٰهُ يَرْزُقُ مَنْ يَّشَاۤءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ

zuyyina lil-lażīna kafarul-ḥayātud-dun-yā wa yaskharūna minal-lażīna āmanū, wal-lażīnattaqau fauqahum yaumal-qiyāmah(ti), wallāhu yarzuqu may yasyā'u bigairi ḥisāb(in).

सांसारिक जीवन के अविश्वास करय वाला के नजर में सुन्दर बुझाइत अछि, आ विश्वास करय वाला के अपमान करैत अछि. भले ही पुण्यात्मा कयामत के दिन हुनका सब स ऊपर रहत। आरू अल्लाह जेकरा अपनऽ इच्छा छै ओकरा बिना कोनो गणना के रोजी-रोटी दै छै ।


214
Q.S अल-बकराह (2:214)

اَمْ حَسِبْتُمْ اَنْ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُمْ مَّثَلُ الَّذِيْنَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِكُمْ ۗ مَسَّتْهُمُ الْبَأْسَاۤءُ وَالضَّرَّاۤءُ وَزُلْزِلُوْا حَتّٰى يَقُوْلَ الرَّسُوْلُ وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا مَعَهٗ مَتٰى نَصْرُ اللّٰهِ ۗ اَلَآ اِنَّ نَصْرَ اللّٰهِ قَرِيْبٌ

am ḥasibtum an tadkhulul-jannata wa lammā ya'tikum maṡalul-lażīna khalau min qablikum, massathumul-ba'sā'u waḍ-ḍarrā'u wa zulzilū ḥattā yaqūlar-rasūlu wal-lażīna āmanū ma‘ahū matā naṣrullāh(i), alā inna naṣrallāhi qarīb(un).

या फेर अहाँ सोचैत छी जे अहाँ जन्नत मे प्रवेश करब जखन कि एहन (परीक्षा) एखन धरि अहाँ लग नहि आयल अछि जेना अहाँ सँ पहिने गुजरल लोक केँ आयल छल | ओ सभ गरीबी, कष्ट सँ त्रस्त छलाह, आ (विभिन्न परीक्षा सँ) हिलैत छलाह, जाबत धरि रसूलुल्लाह आ हुनका संग विश्वास करय बला लोकनि नहि कहलनि, "अल्लाह केर मदद कहिया आओत?" निश्चित रूप स अल्लाह क मदद नजदीक अछि।


217
Q.S अल-बकराह (2:217)

يَسْـَٔلُوْنَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيْهِۗ قُلْ قِتَالٌ فِيْهِ كَبِيْرٌ ۗ وَصَدٌّ عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَكُفْرٌۢ بِهٖ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَاِخْرَاجُ اَهْلِهٖ مِنْهُ اَكْبَرُ عِنْدَ اللّٰهِ ۚ وَالْفِتْنَةُ اَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُوْنَ يُقَاتِلُوْنَكُمْ حَتّٰى يَرُدُّوْكُمْ عَنْ دِيْنِكُمْ اِنِ اسْتَطَاعُوْا ۗ وَمَنْ يَّرْتَدِدْ مِنْكُمْ عَنْ دِيْنِهٖ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَاُولٰۤىِٕكَ حَبِطَتْ اَعْمَالُهُمْ فِى الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ ۚ وَاُولٰۤىِٕكَ اَصْحٰبُ النَّارِۚ هُمْ فِيْهَا خٰلِدُوْنَ

yas'alūnaka ‘anisy-syahril-ḥarāmi qitālin fīh(i), qul qitālun fīhi kabīr(un), wa ṣaddun ‘an sabīlillāhi wa kufrum bihī wal-masjidil-ḥarām(i), wa ikhrāju ahlihī minhu akbaru ‘indallāh(i), wal-fitnatu akbaru minal-qatl(i), wa lā yazālūna yuqātilūnakum ḥattā yaruddūkum ‘an dīnikum inistaṭā‘ū, wa may yartadid minkum ‘an dīnihī fa yamut wa huwa kāfirun fa ulā'ika ḥabiṭat a‘māluhum fid-dun-yā wal-ākhirah(ti), wa ulā'ika aṣḥābun-nār(i), hum fīhā khālidūn(a).

ओ सभ अहाँ (मुहम्मद) सँ वर्जित मास मे लड़बाक विषय मे पूछलनि। कहब, "ओहि मास मे लड़ब एकटा पैघ (पाप) अछि। मुदा (लोक) केँ अल्लाह केर बाट सँ रोकब, हुनकर आज्ञा नहि मानब, (लोक केँ प्रवेश सँ रोकब) भव्य मस्जिद मे, आ लोक केँ ओकर आसपास सँ बाहर निकालब, अल्लाह केर नजरि मे पैघ (पाप) अछि। जखन कि निंदा हत्या सँ बेसी क्रूर अछि। ओ सब अहाँ सँ लड़ब ता धरि नहि छोड़त जाबत धरि अहाँ अपन धर्म सँ धर्मत्यागी (छोड़ि) नहि जायब, जँ ओ सक्षम होयब। जे कियो।" अहाँ सभ मे अपन धर्म सँ धर्मत्यागी, आ तखन ओ अविश्वास मे मरि जाइत छथि, तखन ओ सभ हुनकर सभक कर्म एहि संसार आ परलोक मे व्यर्थ भ' जाइत छथि, आ ओ सभ नरकक निवासी छथि, ओ सभ ओतहि सदाक लेल रहताह।"


21
Q.S अली इमरान (3:21)

اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْفُرُوْنَ بِاٰيٰتِ اللّٰهِ وَيَقْتُلُوْنَ النَّبِيّٖنَ بِغَيْرِحَقٍّۖ وَّيَقْتُلُوْنَ الَّذِيْنَ يَأْمُرُوْنَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِۙ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ اَلِيْمٍ

innal-lażīna yakfurūna bi'āyātillāhi wa yaqtulūnan nabiyyīna bigairi ḥaqq(in), wa yaqtulūnal-lażīna ya'murūna bil-qisṭi minan-nās(i), fabasysyirhum bi‘ażābin alīm(in).

सचमुच, जे अल्लाह के आयत के नकारैत अछि आ बिना सही (न्यायिक कारण) के पैगम्बर के मारैत अछि आ लोक के मारय वाला लोक के मारैत अछि जे लोक के न्याय करय लेल कहैत अछि, ओ हुनका सब के खुशखबरी पहुंचबैत अछि, जे एकटा कष्टदायक सजा अछि।


54
Q.S अली इमरान (3:54)

وَمَكَرُوْا وَمَكَرَ اللّٰهُ ۗوَاللّٰهُ خَيْرُ الْمٰكِرِيْنَ ࣖ

wa makarū wa makarallāh(u), wallāhu khairul-mākirīn(a).

आ ओ सभ (काफिर) ठकैत छल, तेँ अल्लाह ठकबाक बदला लेलनि। आ अल्लाह छलक सबसँ नीक बदला लेनिहार छथि।


111
Q.S अली इमरान (3:111)

لَنْ يَّضُرُّوْكُمْ اِلَّآ اَذًىۗ وَاِنْ يُّقَاتِلُوْكُمْ يُوَلُّوْكُمُ الْاَدْبَارَۗ ثُمَّ لَا يُنْصَرُوْنَ

lay yaḍurrūkum illā ażā(n), wa iy yuqātilūkum yuwallūkumul-adbār(a), ṡumma lā yunṣarūn(a).

छोट-छोट बात छोड़ि अहाँ केँ कोनो नुकसान नहि पहुँचाओत, आ जँ अहाँ सँ लड़त तऽ अवश्य पाछू घुरि जायत आ पराजित भ' जायत। तखन हुनका लोकनि केँ कोनो मददि नहि हेतनि।


120
Q.S अली इमरान (3:120)

اِنْ تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْۖ وَاِنْ تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌ يَّفْرَحُوْا بِهَا ۗ وَاِنْ تَصْبِرُوْا وَتَتَّقُوْا لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْـًٔا ۗ اِنَّ اللّٰهَ بِمَا يَعْمَلُوْنَ مُحِيْطٌ ࣖ

in tamsaskum ḥasanatun tasu'hum, wa in tuṣibkum sayyi'atuy yafraḥū bihā, wa in taṣbirū wa tattaqū lā yaḍurrukum kaiduhum syai'ā(n), innallāha bimā ya‘malūna muḥīṭ(un).

जँ नीक भेटत तँ (अनिवार्य रूपसँ) ओ सभ दुखी हेताह , मुदा जँ अहाँकेँ कोनो विपत्ति आबि जाएत तँ ओ सभ एहिसँ खुश हेताह । धैर्य आ पुण्यवान रहब त हुनकर सबहक चाल अहाँ के कनिको परेशान नहि करत। सचमुच, अल्लाह हुनकऽ हर काम म॑ सर्वव्यापी छै ।


161
Q.S अली इमरान (3:161)

وَمَا كَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَّغُلَّ ۗوَمَنْ يَّغْلُلْ يَأْتِ بِمَا غَلَّ يَوْمَ الْقِيٰمَةِ ۚ ثُمَّ تُوَفّٰى كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُوْنَ

wa mā kāna linabiyyin ay yagull(a), wa may yaglul ya'ti bimā galla yaumal-qiyāmah(ti), ṡumma tuwaffā kullu nafsim mā kasabat wa hum lā yuẓlamūn(a).

आ कोनो भविष्यवक्ता के लेल विश्वासघात करब असंभव अछि (युद्ध लूट के मामला में)। जे विश्वासघात करत, निश्चित रूप सँ कयामतक दिन ओ जे विश्वासघात केलक से ल' क' आओत। तखन सभकेँ ओकर काजक अनुसार पूर्ण इनाम देल जेतैक, आ ओकरा सभसँ कोनो अन्याय नहि होयत।


166
Q.S अली इमरान (3:166)

وَمَآ اَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعٰنِ فَبِاِذْنِ اللّٰهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِيْنَۙ

wa mā aṣābakum yaumal-taqal-jam‘āni fa bi'iżnillāhi wa liya‘lamal-mu'minīn(a).

आ जखन दुनू सेना के भेंट भेल छल तखन अहाँ पर जे भेल से अल्लाह के अनुमति पर छल, आ अल्लाह ओहि लोक के परखय जे सच्चा मुसलमान छल।


183
Q.S अली इमरान (3:183)

اَلَّذِيْنَ قَالُوْٓا اِنَّ اللّٰهَ عَهِدَ اِلَيْنَآ اَلَّا نُؤْمِنَ لِرَسُوْلٍ حَتّٰى يَأْتِيَنَا بِقُرْبَانٍ تَأْكُلُهُ النَّارُ ۗ قُلْ قَدْ جَاۤءَكُمْ رُسُلٌ مِّنْ قَبْلِيْ بِالْبَيِّنٰتِ وَبِالَّذِيْ قُلْتُمْ فَلِمَ قَتَلْتُمُوْهُمْ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِيْنَ

al-lażīna qālū innallāha ‘ahida ilainā allā nu'mina lirasūlin ḥattā ya'tiyanā biqurbānin ta'kuluhun-nār(u), qul qad jā'akum rusulum min qablī bil-bayyināti wa bil-lażī qultum falima qataltumūhum in kuntum ṣādiqīn(a).

(अर्थात) ओ (यहूदी) जे कहैत छथि, "वास्तव मे अल्लाह हमरा सभ केँ आज्ञा देने छथि जे हमरा सभ केँ कोनो दूत पर विश्वास नहि करबाक चाही, जा धरि ओ हमरा सभ केँ आगि सँ भस्म भ गेल बलिदान नहि अनत।" कहू (मुहम्मद), "सत्ते, हमरा सँ पहिने कतेको दूत अहाँ लग आबि गेल छथि, (साथ मे) स्पष्ट सबूत ल' क' आ जे बात अहाँ कहलहुँ से ल' क' आबि गेल छथि, मुदा जँ अहाँ सच्चा लोक छलहुँ त' हुनका सभ केँ किएक मारलियैक।"


184
Q.S अली इमरान (3:184)

فَاِنْ كَذَّبُوْكَ فَقَدْ كُذِّبَ رُسُلٌ مِّنْ قَبْلِكَ جَاۤءُوْ بِالْبَيِّنٰتِ وَالزُّبُرِ وَالْكِتٰبِ الْمُنِيْرِ

fa in każżabūka faqad kużżiba rusulum min qablika jā'ū bil-bayyināti waz-zuburi wal-kitābil-munīr(i).

त अगर ओ सब अहाँ (मुहम्मद) स झूठ बाजैत छथि त (जानू जे) अहाँ स पहिने के रसूलुस सब स सेहो झूठ बाजल गेल छल (ओहो), ओ सब असली चमत्कार, जुबुर आ किताब ल क आयल छल जे एकदम सही व्याख्या दैत अछि।


186
Q.S अली इमरान (3:186)

۞ لَتُبْلَوُنَّ فِيْٓ اَمْوَالِكُمْ وَاَنْفُسِكُمْۗ وَلَتَسْمَعُنَّ مِنَ الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَمِنَ الَّذِيْنَ اَشْرَكُوْٓا اَذًى كَثِيْرًا ۗ وَاِنْ تَصْبِرُوْا وَتَتَّقُوْا فَاِنَّ ذٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْاُمُوْرِ

latublawunna fī amwālikum wa anfusikum, wa latasma‘unna minal-lażīna ūtul-kitāba min qablikum wa minal-lażīna asyrakū ażan kaṡīrā(n), wa in taṣbirū wa tattaqū fa inna żālika min ‘azmil-umūr(i).

अहाँक परीक्षा अपन धन आ अपना संग अवश्य होयत। आ निश्चित रूप स अहाँ सब स बहुत रास बहुत आहत करय वाला बात सुनब जे अहाँ स पहिने किताब देल गेल छल आ मुश्रिक स। जँ अहाँ धैर्यवान आ पुण्यात्मा छी तँ सचमुच ओ सभ एहन बात अछि जकरा प्राथमिकता (जेबाक चाही) ।


195
Q.S अली इमरान (3:195)

فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ اَنِّيْ لَآ اُضِيْعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِّنْكُمْ مِّنْ ذَكَرٍ اَوْ اُنْثٰى ۚ بَعْضُكُمْ مِّنْۢ بَعْضٍ ۚ فَالَّذِيْنَ هَاجَرُوْا وَاُخْرِجُوْا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاُوْذُوْا فِيْ سَبِيْلِيْ وَقٰتَلُوْا وَقُتِلُوْا لَاُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّاٰتِهِمْ وَلَاُدْخِلَنَّهُمْ جَنّٰتٍ تَجْرِيْ مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهٰرُۚ ثَوَابًا مِّنْ عِنْدِ اللّٰهِ ۗ وَاللّٰهُ عِنْدَهٗ حُسْنُ الثَّوَابِ

fastajāba lahum rabbuhum annī lā uḍī‘u ‘amala ‘āmilim minkum min żakarin au unṡā, ba‘ḍukum mim ba‘ḍ(in), fal-lażīna hājarū wa ukhrijū min diyārihim wa ūżū fī sabīlī wa qātalū wa qutilū la'ukaffiranna ‘anhum sayyi'ātihim wa la udkhilannahum jannātin tajrī min taḥtihal-anhār(u), ṡawābam min ‘indillāh(i), wallāhu ‘indahū ḥusnuṡ-ṡawāb(i).

तेँ हुनका लोकनिक प्रभु हुनका लोकनिक आग्रह (ई कहैत) केँ पूरा कयलनि, "सत्ते, हम अहाँ सभ मे सँ कियो नीक काज करय बला काज केँ बर्बाद नहि करैत छी, चाहे ओ पुरुष हो वा स्त्री, (कारण) अहाँ सभ मे सँ किछु गोटे दोसर सँ (वंशज) छी। तेँ जे लोकनि प्रवास कयलनि, आ अपन घर सँ निकालि देल गेलाह, आ हमर बाट मे नुकसान पहुँचल गेलाह, आ लड़लनि, आ मारल गेलाह, हम हुनका सभक दुष्कर्म केँ अवश्य लिखि क' नीचाँक गाछी मे प्रवेश देबनि।" जे नदी बहैत अछि, अल्लाह के इनाम के रूप में आ अल्लाह के संग एकटा नीक इनाम अछि।"


75
Q.S अन-निसा (4:75)

وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُوْنَ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَالْمُسْتَضْعَفِيْنَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاۤءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذِيْنَ يَقُوْلُوْنَ رَبَّنَآ اَخْرِجْنَا مِنْ هٰذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ اَهْلُهَاۚ وَاجْعَلْ لَّنَا مِنْ لَّدُنْكَ وَلِيًّاۚ وَاجْعَلْ لَّنَا مِنْ لَّدُنْكَ نَصِيْرًا

wa mā lakum lā tuqātilūna fī sabīlillāhi wal-mustaḍ‘afīna minar-rijāli wan-nisā'i wal-wildānil-lażīna yaqūlūna rabbanā akhrijnā min hāżihil-qaryatiẓ-ẓālimi ahluhā, waj‘al lanā mil ladunka waliyyā(n), waj‘al lanā mil ladunka naṣīrā(n).

आ अहाँ अल्लाह के रास्ता में लड़य चाहैत छी आ कमजोर के (रक्षा) किएक नै चाहैत छी, चाहे ओ पुरुष हो, महिला हो या बच्चा जे प्रार्थना करैत हो, "हमर प्रभु, हमरा सब के एहि भूमि (मक्का) स बाहर निकालू, जकर निवासी अन्यायी छथि। हमरा सब के अपन तरफ स एकटा रक्षक दिअ, आ अपन तरफ स हमरा सब के एकटा सहायक दिअ।"


100
Q.S अन-निसा (4:100)

۞ وَمَنْ يُّهَاجِرْ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ يَجِدْ فِى الْاَرْضِ مُرٰغَمًا كَثِيْرًا وَّسَعَةً ۗوَمَنْ يَّخْرُجْ مِنْۢ بَيْتِهٖ مُهَاجِرًا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ اَجْرُهٗ عَلَى اللّٰهِ ۗوَكَانَ اللّٰهُ غَفُوْرًا رَّحِيْمًا ࣖ

wa may yuhājir fī sabīlillāhi yajid fil-arḍi murāgaman kaṡīraw wa sa‘ah(tan), wa may yakhruj mim baitihī muhājiran ilallāhi wa rasūlihī ṡumma yudrik-hul-mautu faqad waqa‘a ajruhū ‘alallāh(i), wa kānallāhu gafūrar raḥīmā(n).

आ जे कियो अल्लाह के रास्ता में प्रवास करत, ओकरा एहि धरती पर प्रवास के लेल एकटा विस्तृत जगह आ बहुत रास (जीविका) जरूर भेटतैक। जे कियो अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के लेल प्रवास करबाक इरादा स अपन घर स निकलैत अछि, तखन ओकरा पर मौत भ जाइत अछि (अपन मंजिल तक पहुंचबा स पहिने), तखन सचमुच ओकर इनाम अल्लाह के संग स्थापित भ गेल अछि। आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


157
Q.S अन-निसा (4:157)

وَّقَوْلِهِمْ اِنَّا قَتَلْنَا الْمَسِيْحَ عِيْسَى ابْنَ مَرْيَمَ رَسُوْلَ اللّٰهِۚ وَمَا قَتَلُوْهُ وَمَا صَلَبُوْهُ وَلٰكِنْ شُبِّهَ لَهُمْ ۗوَاِنَّ الَّذِيْنَ اخْتَلَفُوْا فِيْهِ لَفِيْ شَكٍّ مِّنْهُ ۗمَا لَهُمْ بِهٖ مِنْ عِلْمٍ اِلَّا اتِّبَاعَ الظَّنِّ وَمَا قَتَلُوْهُ يَقِيْنًاۢ ۙ

wa qaulihim innā qatalnal-masīḥa ‘īsabna maryama rasūlallāh(i), wa mā qatalūhu wa mā ṣalabūhu wa lākin syubbiha lahum, wa innal-lażīnakhtalafū fīhi lafī syakkim minh(u), mā lahum bihī min ‘ilmin illattibā‘aẓ-ẓanni wa mā qatalūhu yaqīnā(n).

आरू (हमरा सिनी भी सजा देलऽ छेलियै) कैन्हेंकि वू लोगऽ न॑ कहलकै, "सत्ते, हम्में मसीहा, ईसा, मरियम केरऽ बेटा, अल्लाह केरऽ रसूलुल्लाह केरऽ हत्या करी देल॑ छियै," भले ही वू ओकरा नै मारलकै या (ना ही) ओकरा क्रूस पर चढ़ैलकै, बल्कि (जे वू मारलकै वू) एगो ऐसनऽ व्यक्ति छेलै जेकरऽ उपमा यीशु स॑ करलऽ गेलऽ छेलै। सचमुच, जे लोग यीशु के (हत्या के) के बारे में असहमत छै, ओकरा हमेशा संदेह में रहै छै कि के मारल गेलै। ओकरा सब के सचमुच में पता नै छेलै (ठीक के के मारलऽ गेलै), लेकिन खाली अनुमान के आधार पर छेलै, ई लेली ओकरा सब के ई बात के पक्का यकीन नै छेलै कि वू ओकरा मारलकै।


41
Q.S अल-मैदाह (5:41)

۞ يٰٓاَيُّهَا الرَّسُوْلُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِيْنَ يُسَارِعُوْنَ فِى الْكُفْرِ مِنَ الَّذِيْنَ قَالُوْٓا اٰمَنَّا بِاَفْوَاهِهِمْ وَلَمْ تُؤْمِنْ قُلُوْبُهُمْ ۛ وَمِنَ الَّذِيْنَ هَادُوْا ۛ سَمّٰعُوْنَ لِلْكَذِبِ سَمّٰعُوْنَ لِقَوْمٍ اٰخَرِيْنَۙ لَمْ يَأْتُوْكَ ۗ يُحَرِّفُوْنَ الْكَلِمَ مِنْۢ بَعْدِ مَوَاضِعِهٖۚ يَقُوْلُوْنَ اِنْ اُوْتِيْتُمْ هٰذَا فَخُذُوْهُ وَاِنْ لَّمْ تُؤْتَوْهُ فَاحْذَرُوْا ۗوَمَنْ يُّرِدِ اللّٰهُ فِتْنَتَهٗ فَلَنْ تَمْلِكَ لَهٗ مِنَ اللّٰهِ شَيْـًٔا ۗ اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ لَمْ يُرِدِ اللّٰهُ اَنْ يُّطَهِّرَ قُلُوْبَهُمْ ۗ لَهُمْ فِى الدُّنْيَا خِزْيٌ ۖوَّلَهُمْ فِى الْاٰخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيْمٌ

yā ayyuhar-rasūlu lā yaḥzunkal-lażīna yusāri‘ūna fil-kufri minal-lażīna qālū āmannā bi'afwāhihim wa lam tu'min qulūbuhum - wa minal-lażīna hādū - sammā‘ūna lil-każibi sammā‘ūna liqaumin ākharīna lam ya'tūk(a), yuḥarrifūnal-kalima mim ba‘di mawāḍi‘ih(ī), yaqūlūna in ūtītum hāżā fa khuż­hu wa illam tu'tauhu faḥżarū, wa may yuridillāhu fitnatahū falan tamlika lahū minallāhi syai'ā(n), ulā'ikal-lażīna lam yuridillāhu ay yuṭahhira qulūbahum, lahum fid-dun-yā khizyuw wa lahum fil-ākhirati ‘ażābun ‘aẓīm(un).

हे रसूल (मुहम्मद) ! दुखी नहि होउ, कारण ओ सभ अपन अविश्वास मे प्रतिस्पर्धा क' रहल छथि। अर्थात ओ (पाखंडी) जे मुँह सँ कहैत छथि, "हम सभ विश्वास कएने छी," भले ओकर हृदय एखन धरि विश्वास नहि कएने हो, आ संगहि यहूदी सभ जे वास्तव मे (समाचार) झूठ सुनब पसिन करैत छथि आ वास्तव मे दोसर लोकक (वचन) सुनब पसिन करैत छथि जे कहियो अहाँ लग नहि आयल छथि। ओ सभ शब्द (तोराह) केँ ओकर असली अर्थ सँ बदलि देलक। ओ सभ कहलक, "जँ ई अहाँ केँ देल गेल अछि (जे बदलल गेल अछि) त' स्वीकार करू, आ जँ अहाँ केँ किछु एहन देल गेल अछि जे ई नहि अछि, तखन सावधान रहू।" जेकरा अल्लाह ओकरा भटकय देबय चाहैत छथि, अहाँ अल्लाह सँ (ओकर मदद करय लेल) कोनो बात केँ कनिको मना नहि क' सकब। ओ एहन लोक छथि जिनका भगवान आब हुनकर हृदय शुद्ध नहि करय चाहैत छथि । एहि संसार मे हुनका लोकनि केँ अपमानित कयल जायत आ परलोक मे हुनका लोकनि केँ बहुत पैघ दण्ड होयतनि |


49
Q.S अल-मैदाह (5:49)

وَاَنِ احْكُمْ بَيْنَهُمْ بِمَآ اَنْزَلَ اللّٰهُ وَلَا تَتَّبِعْ اَهْوَاۤءَهُمْ وَاحْذَرْهُمْ اَنْ يَّفْتِنُوْكَ عَنْۢ بَعْضِ مَآ اَنْزَلَ اللّٰهُ اِلَيْكَۗ فَاِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمْ اَنَّمَا يُرِيْدُ اللّٰهُ اَنْ يُّصِيْبَهُمْ بِبَعْضِ ذُنُوْبِهِمْ ۗوَاِنَّ كَثِيْرًا مِّنَ النَّاسِ لَفٰسِقُوْنَ

wa aniḥkum bainahum bimā anzalallāhu wa lā tattabi‘ ahwā'ahum waḥżarūhum ay yaftinūka ‘am ba‘ḍi mā anzalallāhu ilaik(a), fa in tawallau fa‘lam annamā yurīdullāhu ay yuṣībahum biba‘ḍi żunūbihim, wa inna kaṡīram minan-nāsi lafāsiqūn(a).

आरू अल्लाह केरऽ खुलासा के अनुसार ओकरा सिनी के बीच के मामला के फैसला करी क॑ ओकरऽ इच्छा के पालन नै करऽ । आ हुनका सभ सँ सावधान रहू, कहीं अल्लाह जे किछु अहाँ सभ पर उतारलनि अछि, ओहि मे सँ किछु भाग मे ओ सभ अहाँ सभ केँ धोखा नहि देत। यदि ओ सब (अल्लाह द्वारा उतारल गेल कानून स) मुँह मोड़ि लैत छथि, तखन ई जानि लिय जे अल्लाह हुनकर किछु पाप के कारण हुनका पर दुर्भाग्य लाबय के इरादा रखैत छथि। आ सच मे बेसी मनुक्ख दुष्ट लोक अछि।


57
Q.S अल-मैदाह (5:57)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِيْنَ اتَّخَذُوْا دِيْنَكُمْ هُزُوًا وَّلَعِبًا مِّنَ الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ اَوْلِيَاۤءَۚ وَاتَّقُوا اللّٰهَ اِنْ كُنْتُمْ مُّؤْمِنِيْنَ

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tattakhiżul-lażīnattakhażū dīnakum huzuwaw wa la‘ibam minal-lażīna ūtul-kitāba min qablikum wal-kuffāra auliyā'(a), wattaqullāha in kuntum mu'minīn(a).

हे विश्वास करनिहार! अपन नेता के एहन लोक नै बनाउ जे अहाँक धर्म के उपहास आ खेल के वस्तु बना दैत अछि, (अर्थात) अहाँ स पहिने जे किताब देल गेल छल आ काफिर (मुश्रिक) के बीच। आ अल्लाह सँ डरू जँ अहाँ मुसलमान छी।


70
Q.S अल-मैदाह (5:70)

لَقَدْ اَخَذْنَا مِيْثَاقَ بَنِيْٓ اِسْرَاۤءِيْلَ وَاَرْسَلْنَآ اِلَيْهِمْ رُسُلًا ۗ كُلَّمَا جَاۤءَهُمْ رَسُوْلٌۢ بِمَا لَا تَهْوٰٓى اَنْفُسُهُمْۙ فَرِيْقًا كَذَّبُوْا وَفَرِيْقًا يَّقْتُلُوْنَ

laqad akhażnā mīṡāqa banī isrā'īla wa arsalnā ilaihim rusulā(n), kullamā jā'ahum rasūlum bimā lā tahwā anfusuhum, farīqan każżabū wa farīqay yaqtulūn(a).

सचमुच, हम इस्राएलक सन्तान सभसँ वाचा लऽ लेने छी आ हुनका सभ लग दूत पठौने छी। मुदा प्रत्येक प्रेरित हुनका सभक लग एहन चीज ल' क' अबैत छलाह जे हुनकर इच्छाक अनुसार नहि छल, (त') किछु (प्रेरित सभ मे सँ) ओ सभ झूठ बाजल आ किछु केँ मारि देलक।


110
Q.S अल-मैदाह (5:110)

اِذْ قَالَ اللّٰهُ يٰعِيْسَى ابْنَ مَرْيَمَ اذْكُرْ نِعْمَتِيْ عَلَيْكَ وَعَلٰى وَالِدَتِكَ ۘاِذْ اَيَّدْتُّكَ بِرُوْحِ الْقُدُسِۗ تُكَلِّمُ النَّاسَ فِى الْمَهْدِ وَكَهْلًا ۚوَاِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتٰبَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرٰىةَ وَالْاِنْجِيْلَ ۚوَاِذْ تَخْلُقُ مِنَ الطِّيْنِ كَهَيْـَٔةِ الطَّيْرِ بِاِذْنِيْ فَتَنْفُخُ فِيْهَا فَتَكُوْنُ طَيْرًاۢ بِاِذْنِيْ وَتُبْرِئُ الْاَكْمَهَ وَالْاَبْرَصَ بِاِذْنِيْ ۚوَاِذْ تُخْرِجُ الْمَوْتٰى بِاِذْنِيْ ۚوَاِذْ كَفَفْتُ بَنِيْٓ اِسْرَاۤءِيْلَ عَنْكَ اِذْ جِئْتَهُمْ بِالْبَيِّنٰتِ فَقَالَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْهُمْ اِنْ هٰذَآ اِلَّا سِحْرٌ مُّبِيْنٌ

iż qālallāhu yā ‘īsabna maryamażkur ni‘matī ‘alaika wa ‘alā wālidatik(a), iż ayyattuka birūḥil-qudus(i), tukallimun-nāsa fil-mahdi wa kahlā(n), wa iż ‘allamtukal-kitāba wal-ḥikmata wat-taurāta wal-injīl(a), wa iż takhluqu minaṭ-ṭīni kahai'atiṭ-ṭairi bi'iżnī fa tanfukhu fīhā fa takūnu ṭairam bi'iżnī wa tubri'ul-akmaha wal-abraṣa bi'iżnī, wa iż tukhrijul-mautā bi'iżnī, wa iż kafaftu banī isrā'īla ‘anka iż ji'tahum bil-bayyināti fa qālal-lażīna kafarū minhum in hāżā illā siḥrum mubīn(un).

आ याद राखू जखन अल्लाह कहने छलाह, "हे ईसा, मरियमक बेटा! हमर एहसान मोन राखू जखन हम अहाँ पर पवित्र आत्मा सँ मजबूत केने रही। अहाँ मनुक्ख सँ गप्प करबा मे सक्षम छलहुँ जखन अहाँ एखनो पालना मे छलहुँ आ जखन अहाँ वयस्क छलहुँ। आ मोन राखू जखन हम अहाँ केँ लिखब सिखबैत छलहुँ, (संगहि) बुद्धि, तौराह आ सुसमाचार। आ मोन राखू जखन अहाँ हमर अनुमति सँ धरती सँ चिड़ै बनौने रही, तखन अहाँ।" उड़ा देलक, तखन ई हमर अनुमति सँ (असली) चिड़ै बनि गेल जखन अहाँ हमर अनुमति सँ ककरो जन्म सँ आन्हर आ कोढ़ी केँ ठीक केलहुँ आ मोन राखू जखन हम इस्राएलक संतान केँ (अहाँ केँ मारबाक इच्छा सँ) रोकने रही, तखन हुनका लोकनिक बीच मे काफिर लोकनि कहलनि असली जादू के अलावा किछु नहि।"


10
Q.S अल-अन'अम (6:10)

وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّنْ قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذِيْنَ سَخِرُوْا مِنْهُمْ مَّا كَانُوْا بِهٖ يَسْتَهْزِءُوْنَ ࣖ

wa laqadistuhzi'a birusulim min qablika fa ḥāqa bil-lażīna sakhirū minhum mā kānū bihī yastahzi'ūn(a).

आ सचमुच अहाँ (मुहम्मद) सँ पहिने के किछु दूत के मजाक उड़ाओल गेल छल, जाहि स सजा ओहि लोक पर उतरि गेल छल जे हुनकर उपहास के जवाब में हुनकर मजाक उड़ाबैत छल |


25
Q.S अल-अन'अम (6:25)

وَمِنْهُمْ مَّنْ يَّسْتَمِعُ اِلَيْكَ ۚوَجَعَلْنَا عَلٰى قُلُوْبِهِمْ اَكِنَّةً اَنْ يَّفْقَهُوْهُ وَفِيْٓ اٰذَانِهِمْ وَقْرًا ۗوَاِنْ يَّرَوْا كُلَّ اٰيَةٍ لَّا يُؤْمِنُوْا بِهَا ۗحَتّٰٓى اِذَا جَاۤءُوْكَ يُجَادِلُوْنَكَ يَقُوْلُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْٓا اِنْ هٰذَآ اِلَّآ اَسَاطِيْرُ الْاَوَّلِيْنَ

wa minhum may yastami‘u ilaik(a), wa ja‘alnā ‘alā qulūbihim akinnatan ay yafqahūhu wa fī āżānihim waqrā(n), wa iy yarau kulla āyatil lā yu'minū bihā, ḥattā iżā jā'ūka yujādilūnaka yaqūlul-lażīna kafarū in hāżā illā asāṭīrul-awwalīn(a).

आ ओहि मे एहन लोक छथि जे अहाँक (मुहम्मद) के पढ़ाई सुनैत छथि, आ हम हुनकर दिल के बंद क देने छी (जाहि स ओ सब नहि बुझैत छथि), आ हुनकर कान बंद भ गेल अछि। आ जँ ओ सभ (सत्यक) सभ संकेत देखितथि तखनो ओ सभ एहि पर विश्वास नहि करितथि । ताकि जखन ओ सभ अहाँक खंडन करबाक लेल अहाँक लग अबैत छथि तखन काफिर सभ कहैत छथि, "ई (कुरान) प्राचीन लोकक परीकथाक अतिरिक्त किछु नहि अछि |"


34
Q.S अल-अन'अम (6:34)

وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِّنْ قَبْلِكَ فَصَبَرُوْا عَلٰى مَا كُذِّبُوْا وَاُوْذُوْا حَتّٰٓى اَتٰىهُمْ نَصْرُنَا ۚوَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمٰتِ اللّٰهِ ۚوَلَقَدْ جَاۤءَكَ مِنْ نَّبَإِ۟ى الْمُرْسَلِيْنَ

wa laqad kużżibat rusulum min qablika fa ṣabarū ‘alā mā kużżibū wa ūżū ḥattā atāhum naṣrunā, wa lā mubaddila likalimātillāh(i), wa laqad jā'aka min naba'il-mursalīn(a).

आ सचमुच अहाँ सभ सँ पहिने के दूत सभ सँ झूठ बाजल गेल छल, मुदा ओ सभ हुनका सभ पर जे झूठ आ प्रताड़ना (करल गेल) छल, ताबत धरि धैर्य रखैत छल, जाबत धरि हमरा सभक मददि हुनका सभ लग नहि आबि गेल। आ अल्लाह के वाक्य (फरमान) के कोनो चीज नै बदलि सकैत अछि। आ सच मे, अहाँ सभ लग प्रेरित सभक संदेशक किछु भाग आबि गेल अछि।


112
Q.S अल-अन'अम (6:112)

وَكَذٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوًّا شَيٰطِيْنَ الْاِنْسِ وَالْجِنِّ يُوْحِيْ بَعْضُهُمْ اِلٰى بَعْضٍ زُخْرُفَ الْقَوْلِ غُرُوْرًا ۗوَلَوْ شَاۤءَ رَبُّكَ مَا فَعَلُوْهُ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُوْنَ

wa każālika ja‘alnā likulli nabiyyin ‘aduwwan syayāṭīnal-insi wal-jinni yūḥī ba‘ḍuhum ilā ba‘ḍin zukhrufal-qauli gurūrā(n), wa lau syā'a rabbuka mā fa‘alūhu fa żarhum wa mā yaftarūn(a).

आ एहि तरहेँ हर पैगम्बरक लेल हम सभ शैतान, मनुक्ख आ जिन्न सँ बनल दुश्मन बनेलहुँ, जाहि मे किछु गोटे दोसर केँ धोखाक रूप मे सुन्दर शब्द फुसफुसाइत छलाह | आ जँ अहाँक प्रभु चाहथि तँ ओ सभ नहि करताह , तेँ जे (झूठ) बनबैत छथि ताहिसँ रहथि ।


60
Q.S अल-अ'रफ (7:60)

قَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِهٖٓ اِنَّا لَنَرٰىكَ فِيْ ضَلٰلٍ مُّبِيْنٍ

qālal mala'u min qaumihī innā lanarāka fī ḍalālim mubīn(in).

हुनकर लोकक नेता सभ कहलनि, "सत्ते, हम सभ देखैत छी जे अहाँ सभ सचमुच स्पष्ट गलती मे छी।"


61
Q.S अल-अ'रफ (7:61)

قَالَ يٰقَوْمِ لَيْسَ بِيْ ضَلٰلَةٌ وَّلٰكِنِّيْ رَسُوْلٌ مِّنْ رَّبِّ الْعٰلَمِيْنَ

qāla yā qaumi laisa bī ḍalālatuw wa lākinnī rasūlum mir rabbil-‘ālamīn(a).

ओ (नूह) उत्तर देलथिन, "हे हमर लोक! हम भटकल नहि छी; मुदा हम समस्त लोकक प्रभुक दूत छी।"


66
Q.S अल-अ'रफ (7:66)

قَالَ الْمَلَاُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ قَوْمِهٖٓ اِنَّا لَنَرٰىكَ فِيْ سَفَاهَةٍ وَّاِنَّا لَنَظُنُّكَ مِنَ الْكٰذِبِيْنَ

qālal-mala'ul-lażīna kafarū min qaumihī innā lanarāka fī safāhatiw wa innā lanaẓunnuka minal-kāżibīn(a).

हुनक लोकक काफिरक नेता सभ कहलनि, "सत्ते, हम सभ अहाँ केँ पूर्णतः पागल मानैत छी आ हमरा सभ केँ लगैत अछि जे अहाँ झूठ बाज' बला लोक मे सँ छी।"


67
Q.S अल-अ'रफ (7:67)

قَالَ يٰقَوْمِ لَيْسَ بِيْ سَفَاهَةٌ وَّلٰكِنِّيْ رَسُوْلٌ مِّنْ رَّبِّ الْعٰلَمِيْنَ

qāla yā qaumi laisa bī safāhatuw wa lākinnī rasūlum mir rabbil-‘ālamīn(a).

ओ (हुद) उत्तर देलथिन, "हे हमर लोक! एहन नहि जे हम पागल छी, बल्कि हम सब लोकक प्रभुक दूत छी।"


77
Q.S अल-अ'रफ (7:77)

فَعَقَرُوا النَّاقَةَ وَعَتَوْا عَنْ اَمْرِ رَبِّهِمْ وَقَالُوْا يٰصٰلِحُ ائْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ اِنْ كُنْتَ مِنَ الْمُرْسَلِيْنَ

fa ‘aqarun-nāqata wa ‘atau ‘an amri rabbihim wa qālū yā ṣāliḥu'tinā bimā ta‘idunā in kunta minal-mursalīn(a).

तखन ओ सभ ऊँट केँ मारि देलक आ अपन प्रभुक आज्ञाक विरुद्ध अहंकारी काज केलक। ओ सभ कहलक, "हे सालेह! हमरा सभ केँ अपन धमकी साबित करू, जँ ई सत्य अछि जे अहाँ दूत मे सँ एक छी।"


82
Q.S अल-अ'रफ (7:82)

وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهٖٓ اِلَّآ اَنْ قَالُوْٓا اَخْرِجُوْهُمْ مِّنْ قَرْيَتِكُمْۚ اِنَّهُمْ اُنَاسٌ يَّتَطَهَّرُوْنَ

wa mā kāna jawāba qaumihī illā an qālū akhrijūhum min qaryatikum, innahum unāsuy yataṭahharūn(a).

आरू हुनकऽ लोगऽ के जवाब दोसरऽ नै छेलै कि ई कहना छेलै, "हुनी (लूत आरू ओकरऽ अनुयायी) क॑ अपनऽ देश स॑ निकाली दियौ, वू लोग छै जे खुद क॑ पवित्र समझै छै।"


88
Q.S अल-अ'रफ (7:88)

۞ قَالَ الْمَلَاُ الَّذِيْنَ اسْتَكْبَرُوْا مِنْ قَوْمِهٖ لَنُخْرِجَنَّكَ يٰشُعَيْبُ وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْا مَعَكَ مِنْ قَرْيَتِنَآ اَوْ لَتَعُوْدُنَّ فِيْ مِلَّتِنَاۗ قَالَ اَوَلَوْ كُنَّا كٰرِهِيْنَ

qālal-mala'ul-lażīnastakbarū min qaumihī lanukhrijannaka yā syu‘aibu wal-lażīna āmanū ma‘aka min qaryatinā au lata‘ūdunna fī millatinā, qāla awalau kunnā kārihīn(a).

शुएब जनजाति के अहंकारी नेता सब कहलकै, "हे शुएब! हम अहाँ आ विश्वासी के अपन देश स जरूर भगा देब, जाबत अहाँ हमर धर्म में वापस नै आबि जायब।" शुएब बजलाह, "अहाँ (अहाँ हमरा सभ केँ भगाबय जा रहल छी), भले हमरा सभ केँ नीक नहि लागय?


90
Q.S अल-अ'रफ (7:90)

وَقَالَ الْمَلَاُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ قَوْمِهٖ لَىِٕنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا اِنَّكُمْ اِذًا لَّخٰسِرُوْنَ

wa qālal-mala'ul-lażīna kafarū min qaumihī la'inittaba‘tum syu‘aiban innakum iżal lakhāsirūn(a).

आ हुनकर लोक (शुआइब) के नेता जे काफिर छलाह (एक दोसरा स कहलखिन) "सत्ते, जँ अहाँ शुएब के पाछाँ चलब त' अहाँ सभ अवश्य हारब।"


109
Q.S अल-अ'रफ (7:109)

قَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِ فِرْعَوْنَ اِنَّ هٰذَا لَسٰحِرٌ عَلِيْمٌۙ

qālal-mala'u min qaumi fir‘auna inna hāżā lasāḥirum ‘alīm(un).

फिरौन केरऽ नेता सिनी कहलकै, “ई आदमी सचमुच चतुर जादूगर छै, .


124
Q.S अल-अ'रफ (7:124)

لَاُقَطِّعَنَّ اَيْدِيَكُمْ وَاَرْجُلَكُمْ مِّنْ خِلَافٍ ثُمَّ لَاُصَلِّبَنَّكُمْ اَجْمَعِيْنَ

la'uqaṭṭi‘anna aidiyakum wa arjulakum min khilāfin ṡumma la'uṣallibannakum ajma‘īn(a).

हम अहाँक हाथ-पैर केँ क्रिसक्रॉस तरीका सँ (दहिना हाथ आ बामा पैर वा एकर विपरीत) अवश्य काटि देब, तखन अहाँ सभ केँ क्रूस पर चढ़ा देब।”


127
Q.S अल-अ'रफ (7:127)

وَقَالَ الْمَلَاُ مِنْ قَوْمِ فِرْعَوْنَ اَتَذَرُ مُوْسٰى وَقَوْمَهٗ لِيُفْسِدُوْا فِى الْاَرْضِ وَيَذَرَكَ وَاٰلِهَتَكَۗ قَالَ سَنُقَتِّلُ اَبْنَاۤءَهُمْ وَنَسْتَحْيٖ نِسَاۤءَهُمْۚ وَاِنَّا فَوْقَهُمْ قٰهِرُوْنَ

wa qālal-mala'u min qaumi fir‘auna atażaru mūsā wa qaumahū liyufsidū fil-arḍi wa yażaraka wa ālihatak(a), qāla sanuqattilu abnā'ahum wa nastaḥyī nisā'ahum, wa innā fauqahum qāhirūn(a).

आ फिरौनक लोकक नेता सभ कहलथिन, “की अहाँ मूसा आ हुनकर लोक केँ एहि देश (मिस्र) मे तबाही मचाबय देब आ अहाँ आ अहाँक देवता सभ केँ छोड़ि देब?” (फिरौन) उत्तर देलथिन, "हम सभ हुनकर बेटा सभ केँ मारि देब आ हुनकर बेटी सभ केँ जीबय देब आ सचमुच हुनका सभ पर हमरा सभक पूरा अधिकार अछि।"


131
Q.S अल-अ'रफ (7:131)

فَاِذَا جَاۤءَتْهُمُ الْحَسَنَةُ قَالُوْا لَنَا هٰذِهٖ ۚوَاِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَّطَّيَّرُوْا بِمُوْسٰى وَمَنْ مَّعَهٗۗ اَلَآ اِنَّمَا طٰۤىِٕرُهُمْ عِنْدَ اللّٰهِ وَلٰكِنَّ اَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُوْنَ

fa iżā jā'athumul-ḥasanatu qālū lanā hāżihī, wa in tuṣibhum sayyi'atuy yaṭṭayyarū bimūsā wa mam ma‘ah(ū), alā innamā ṭā'iruhum ‘indallāhi wa lākinna aksṡarahum lā ya‘lamūn(a).

तखन जखन नीक (समृद्धि) हुनका सभ लग अबैत छनि त' कहैत छथि, "ई हमर सभक (प्रयास) के कारण अछि." आ जँ हुनका सभ केँ कोनो विपत्ति मे पड़लनि तँ ओ सभ दुर्भाग्यक दोष मूसा आ हुनकर अनुयायी सभ पर लगा दैत छलाह | ई जानि लिअ जे हुनकर भाग्य अल्लाह के हाथ मे अछि, मुदा अधिकांश के पता नहि छनि।


30
Q.S अल-अनफल (8:30)

وَاِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا لِيُثْبِتُوْكَ اَوْ يَقْتُلُوْكَ اَوْ يُخْرِجُوْكَۗ وَيَمْكُرُوْنَ وَيَمْكُرُ اللّٰهُ ۗوَاللّٰهُ خَيْرُ الْمٰكِرِيْنَ

wa iż yamkuru bikal-lażīna kafarū liyuṡbitūka au yaqtulūka au yukhrijūk(a), wa yamkurūna wa yamkurullāh(u), wallāhu khairul-mākirīn(a).

आ (याद राखू), जखन काफिर (कुरैश) अहाँ (मुहम्मद) के खिलाफ षड्यंत्र रचय के सोचलक जे अहाँ के गिरफ्तार क जेल में राखि देल जाय या अहाँ के मारल जाय, या अहाँ के बाहर क देल जाय। धोखा पैदा केलक आ अल्लाह धोखा के विफल क देलक। अल्लाह छल के सबस नीक बदला लेबय वाला छथिन्ह.


40
Q.S अत-तौबाह (9:40)

اِلَّا تَنْصُرُوْهُ فَقَدْ نَصَرَهُ اللّٰهُ اِذْ اَخْرَجَهُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا ثَانِيَ اثْنَيْنِ اِذْ هُمَا فِى الْغَارِ اِذْ يَقُوْلُ لِصَاحِبِهٖ لَا تَحْزَنْ اِنَّ اللّٰهَ مَعَنَاۚ فَاَنْزَلَ اللّٰهُ سَكِيْنَتَهٗ عَلَيْهِ وَاَيَّدَهٗ بِجُنُوْدٍ لَّمْ تَرَوْهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ الَّذِيْنَ كَفَرُوا السُّفْلٰىۗ وَكَلِمَةُ اللّٰهِ هِيَ الْعُلْيَاۗ وَاللّٰهُ عَزِيْزٌ حَكِيْمٌ

illā tanṣurūhu faqad naṣarahullāhu iż akhrajahul-lażīna kafarū ṡāniyaṡnaini iż humā fil-gāri iż yaqūlu liṣāḥibihī lā taḥzan innallāha ma‘anā, fa anzalallāhu sakīnatahū ‘alaihi wa ayyadahū bijunūdil lam tarauhā wa ja‘ala kalimatal-lażīna kafarus-suflā, wa kalimatullāhi hiyal-‘ulyā, wallāhu ‘azīzun ḥakīm(un).

जँ अहाँ हुनकर (मुहम्मद) के मदद नहि केने रहितहुँ तँ सचमुच अल्लाह हुनकर मददि केने रहितथि (अर्थात) जखन काफिर सभ हुनका (मक्का सँ) निकालि देने रहितथि; जखन कि ओ दू गोटे मे सँ एक छलाह जखन दुनू गोटे गुफा मे छलाह, ओहि समय ओ अपन मित्र केँ कहलनि, "दुःखी नहि होउ, सचमुच अल्लाह हमरा सभक संग छथि." तेँ अल्लाह हुनका (मुहम्मद) लग शांति पठौलनि आ एकटा सेना (फरिश्ता) सँ मदद केलनि जे अहाँ सभ नहि देखलहुँ, आ काफिर सभक आह्वान केँ नीचाँ क' देलनि। आ ई अल्लाह के वचन अछि जे उच्च अछि। अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी छथि।


61
Q.S अत-तौबाह (9:61)

وَمِنْهُمُ الَّذِيْنَ يُؤْذُوْنَ النَّبِيَّ وَيَقُوْلُوْنَ هُوَ اُذُنٌ ۗقُلْ اُذُنُ خَيْرٍ لَّكُمْ يُؤْمِنُ بِاللّٰهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِيْنَ وَرَحْمَةٌ لِّلَّذِيْنَ اٰمَنُوْا مِنْكُمْۗ وَالَّذِيْنَ يُؤْذُوْنَ رَسُوْلَ اللّٰهِ لَهُمْ عَذَابٌ اَلِيْمٌ

wa minhumul-lażīna yu'żūnan nabiyya wa yaqūlūna huwa użun(un), qul użunu khairil lakum yu'minu billāhi wa yu'minu lil-mu'minīna wa raḥmatul lil-lażīna āmanū minkum, wal-lażīna yu'żūna rasūlallāhi lahum ‘ażābun alīm(un).

आ ओहि मे (पाखंडी) एहन लोक छथि जे नबी (मुहम्मद) केँ ठेस पहुँचाबैत कहलनि जे, "नबी जे किछु सुनलनि ताहि पर विश्वास केलनि।" कहू, "ओ अहाँ सभक लेल जे किछु नीक अछि ताहि पर विश्वास करैत अछि, अल्लाह पर विश्वास करैत अछि, मुसलमान पर विश्वास करैत अछि, आ अहाँ सभक बीचक मुसलमान पर दया करैत अछि।" आ जे अल्लाह के रसूलुल्लाह के आहत करत ओकरा एकटा कष्टदायक सजा भेटतैक।


65
Q.S योना (10:65)

وَلَا يَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْۘ اِنَّ الْعِزَّةَ لِلّٰهِ جَمِيْعًاۗ هُوَ السَّمِيْعُ الْعَلِيْمُ

wa lā yaḥzunka qauluhum, innal-‘izzata lillāhi jamī‘ā(n), huwas-samī‘ul-‘alīm(u).

आ की अहाँ (मुहम्मद) हुनका लोकनिक बात सँ दुखी नहि होउ। सचमुच सब शक्ति अल्लाह के छै। ओ सर्वश्रवण, सर्वज्ञ छथि


76
Q.S योना (10:76)

فَلَمَّا جَاۤءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِنْدِنَا قَالُوْٓا اِنَّ هٰذَا لَسِحْرٌ مُّبِيْنٌ

falammā jā'ahumul-ḥaqqu min ‘indinā qālū inna hāżā lasiḥrum mubīn(un).

अस्तु जखन हमरा सभक दिस सँ सच्चाई हुनका सभ लग आबि गेलनि त' ओ सभ कहलनि, "ई असली जादू अछि."


83
Q.S योना (10:83)

فَمَآ اٰمَنَ لِمُوْسٰىٓ اِلَّا ذُرِّيَّةٌ مِّنْ قَوْمِهٖ عَلٰى خَوْفٍ مِّنْ فِرْعَوْنَ وَمَلَا۟ىِٕهِمْ اَنْ يَّفْتِنَهُمْ ۗوَاِنَّ فِرْعَوْنَ لَعَالٍ فِى الْاَرْضِۚ وَاِنَّهٗ لَمِنَ الْمُسْرِفِيْنَ

famā āmana limūsā illā żurriyyatum min qaumihī ‘alā khaufim min fir‘auna wa mala'ihim ay yaftinahum, wa inna fir‘auna la‘ālin fil-arḍ(i), wa innahū laminal-musrifīn(a).

तेँ मूसा पर हुनकर लोकक वंशज केँ छोड़ि कियो विश्वास नहि केलक, जे डरैत छल जे फिरौन आ ओकर नेता (लोक) ओकरा सभ केँ यातना देत। आरू सचमुच, फिरौन सचमुच में पृथ्वी पर अत्याचार करलकै, आरो सचमुच में उल्लंघन करै वाला में से एक छेलै।


12
Q.S टोप (11:12)

فَلَعَلَّكَ تَارِكٌۢ بَعْضَ مَا يُوْحٰىٓ اِلَيْكَ وَضَاۤىِٕقٌۢ بِهٖ صَدْرُكَ اَنْ يَّقُوْلُوْا لَوْلَآ اُنْزِلَ عَلَيْهِ كَنْزٌ اَوْ جَاۤءَ مَعَهٗ مَلَكٌ ۗ اِنَّمَآ اَنْتَ نَذِيْرٌ ۗ وَاللّٰهُ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ وَّكِيْلٌ ۗ

fa la‘allaka tārikum ba‘ḍa mā yūḥā ilaika wa ḍā'ikum bihī ṣadruka ay yaqūlū lau lā unzila ‘alaihi kanzun au jā'a ma‘ahū malak(un), innamā anta nażīr(un), wallāhu ‘alā kulli syai'in wakīl(un).

त' भ' सकैत अछि जे अहाँ (मुहम्मद) अहाँ पर जे किछु प्रकट भेल छल ओकरा छोड़ि देबय चाहैत छी आ एकर कारणेँ अहाँक छाती संकीर्ण भ' गेल अछि, कारण ओ सभ कहताह जे "हुनका लग खजाना (धन) किएक नहि पठाओल गेल वा हुनका संग कोनो स्वर्गदूत आबि गेल छल?" सचमुच अहाँ मात्र चेतावनी देबय वाला छी आ अल्लाह सब चीज के रक्षक छथि।


27
Q.S टोप (11:27)

فَقَالَ الْمَلَاُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ قَوْمِهٖ مَا نَرٰىكَ اِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرٰىكَ اتَّبَعَكَ اِلَّا الَّذِيْنَ هُمْ اَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِۚ وَمَا نَرٰى لَكُمْ عَلَيْنَا مِنْ فَضْلٍۢ بَلْ نَظُنُّكُمْ كٰذِبِيْنَ

fa qālal-mala'ul-lażīna kafarū min qaumihī mā narāka illā basyaram miṡlanā wa mā narākattaba‘aka illal-lażīna hum arāżilunā bādiyar-ra'y(i), wa mā narā lakum ‘alainā min faḍlim bal naẓunnukum kāżibīn(a).

अस्तु, अपन लोक मे अविश्वास करय बला नेता लोकनि कहलनि, "हम सभ अहाँ केँ नहि देखैत छी, बल्कि हमरा सभ सन (सामान्य) मनुक्ख केँ मात्र देखैत छी, आ अहाँक पाछाँ चलय बला केओ नहि देखैत छी, बल्कि हमरा सभ मे नीच लोक केँ देखैत छी जे जल्दी सँ विश्वास करैत अछि। हम सभ ई नहि देखैत छी जे अहाँक हमरा सभ पर कोनो फायदा अछि, वास्तव मे हम सभ अहाँ केँ झूठ बाज' बला मानैत छी।"


32
Q.S टोप (11:32)

قَالُوْا يٰنُوْحُ قَدْ جَادَلْتَنَا فَاَ كْثَرْتَ جِدَالَنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ اِنْ كُنْتَ مِنَ الصّٰدِقِيْنَ

qālū yā nūḥu qad jādaltanā fa akṡarta jidālanā fa'tinā bimā ta‘idunā in kunta minaṣ-ṣādiqīn(a).

ओ सभ कहलक, "हे नुह! सत्ते, अहाँ हमरा सभ सँ बहस केलहुँ, आ हमरा सभक विरुद्ध अपन तर्क केँ लम्बा क' देलहुँ, तेँ हमरा सभ पर ओ सजा आनि दियौक जे अहाँ धमकी देलहुँ, जँ अहाँ सत्यवादी मे छी।"


53
Q.S टोप (11:53)

قَالُوْا يٰهُوْدُ مَاجِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَّمَا نَحْنُ بِتَارِكِيْٓ اٰلِهَتِنَا عَنْ قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِيْنَ

qālū yā hūdu mā ji'tanā bibayyinatiw wa mā naḥnu bitārikī ālihatinā ‘an qaulika wa mā naḥnu laka bimu'minīn(a).

ओ सभ (अदक लोक) कहलथिन, "हे हुद! अहाँ हमरा सभक लेल कोनो स्पष्ट प्रमाण नहि अनलहुँ, आ हम सभ अहाँक बातक कारणेँ अपन मूर्ति सभ केँ नहि छोड़ब, आ ने अहाँक विश्वास करब।"


54
Q.S टोप (11:54)

اِنْ نَّقُوْلُ اِلَّا اعْتَرٰىكَ بَعْضُ اٰلِهَتِنَا بِسُوْۤءٍ ۗقَالَ اِنِّيْٓ اُشْهِدُ اللّٰهَ وَاشْهَدُوْٓا اَنِّيْ بَرِيْۤءٌ مِّمَّا تُشْرِكُوْنَ

in naqūlu illa‘tarāka ba‘ḍu ālihatinā bisū'(in), qāla innī usyhidullāha wasyhadū annī barī'um mimmā tusyrikūn(a).

हम सभ मात्र एतबे कहैत छी जे हमर किछु मूर्ति अहाँ सभ केँ पागलपन सँ पीड़ित केलक अछि।” ओ (हुद) कहलनि जे, सचमुच हम अल्लाह के गवाही दैत छी आ गवाही दैत छी जे हम ओहि चीज स मुक्त छी जे अहाँ हुनका संग संगत करैत छी।