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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Bangsa-bangsa terdahulu Nabi-nabi Kekhususan para nabi Allah selalu mengikuti Nabi

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कुल आयत : 8
52
Q.S अल-अन'अम (6:52)

وَلَا تَطْرُدِ الَّذِيْنَ يَدْعُوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيْدُوْنَ وَجْهَهٗ ۗمَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ وَّمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِمْ مِّنْ شَيْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُوْنَ مِنَ الظّٰلِمِيْنَ

wa lā taṭrudil-lażīna yad‘ūna rabbahum bil-gadāti wal-‘asyiyyi yurīdūna wajhah(ū), mā ‘alaika min ḥisābihim min syai'iw wa mā min ḥisābika ‘alaihim min syai'in fa taṭrudahum fa takūna minaẓ-ẓālimīn(a).

भोर-साँझ अपन प्रभु के पुकारनिहार के नहि भगाउ, हुनकर प्रसन्नता के आशा करैत छथि | अहाँ हुनका लोकनिक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि लैत छथि आ ओ सभ अहाँक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि उठबैत छथि, जाहि कारणेँ अहाँ हुनका सभ केँ बाहर निकालबाक (अधिकार) छी, जाहि सँ अहाँ अपराधी मे सँ एक छी।


67
Q.S अल-अनफल (8:67)

مَاكَانَ لِنَبِيٍّ اَنْ يَّكُوْنَ لَهٗٓ اَسْرٰى حَتّٰى يُثْخِنَ فِى الْاَرْضِۗ تُرِيْدُوْنَ عَرَضَ الدُّنْيَاۖ وَاللّٰهُ يُرِيْدُ الْاٰخِرَةَۗ وَاللّٰهُ عَزِيْزٌحَكِيْمٌ

mā kāna linabiyyin ay yakūna lahū asrā ḥattā yuṡkhina fil-arḍ(i), turīdūna ‘araḍad-dun-yā, wallāhu yurīdul-ākhirah(ta), wallāhu ‘azīzun ḥakīm(un).

कोनो भविष्यवक्ता के लेल ई उचित नै होयत जे ओ पृथ्वी पर अपन दुश्मन के अपंग बनाबय स पहिने कैदी रहय। अहाँ सांसारिक सम्पत्ति के इच्छा रखैत छी जखन कि अल्लाह परलोक (अहाँक लेल) मे (इनाम) चाहैत छथि | अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञानी छथि।


68
Q.S अल-अनफल (8:68)

لَوْلَاكِتٰبٌ مِّنَ اللّٰهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيْمَآ اَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيْمٌ

lau lā kitābum minallāhi sabaqa lamassakum fīmā akhażtum ‘ażābun ‘aẓīm(un).

अगर अल्लाह के तरफ स पहिने कोनो फरमान नै रहैत त अहाँ के जे (फिरौती) लेलौं ओकर कारण अहाँ के बहुत पैघ यातना के मारल गेल रहैत।


43
Q.S अत-तौबाह (9:43)

عَفَا اللّٰهُ عَنْكَۚ لِمَ اَذِنْتَ لَهُمْ حَتّٰى يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذِيْنَ صَدَقُوْا وَتَعْلَمَ الْكٰذِبِيْنَ

‘afallāhu ‘ank(a), lima ażinta lahum ḥattā yatabayyana lakal-lażīna ṣadaqū wa ta‘lamal-kāżibīn(a).

अल्लाह अहाँ (हे मुहम्मद) के माफ क दैत छथि। जाबत धरि अहाँ केँ ई स्पष्ट नहि भ' गेल जे के सही मायने मे (रोकायल) अछि आ झूठ बाजनिहार केँ चिन्हबा सँ पहिने अहाँ हुनका सभ केँ अनुमति (युद्ध मे नहि जेबाक) किएक देलियैक?


113
Q.S अत-तौबाह (9:113)

مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اَنْ يَّسْتَغْفِرُوْا لِلْمُشْرِكِيْنَ وَلَوْ كَانُوْٓا اُولِيْ قُرْبٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ اَنَّهُمْ اَصْحٰبُ الْجَحِيْمِ

mā kāna lin-nabiyyi wal-lażīna āmanū ay yastagfirū lil-musyrikīna wa lau kānū ulī qurbā mim ba‘di mā tabayyana lahum annahum aṣḥābul-jaḥīm(i).

पैगम्बर आरू मुसलमानऽ के लेलऽ ई उचित नै छै कि मुश्रिकऽ के लेलऽ (अल्लाह स॑) माफी माँगना, भले ही वू ओकरऽ रिश्तेदार होय, ओकरा बाद ओकरा ई बात साफ होय गेलऽ छै कि मुश्रिक नरक के निवासी छै ।


37
Q.S अल-अहजाब (33:37)

وَاِذْ تَقُوْلُ لِلَّذِيْٓ اَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ وَاَنْعَمْتَ عَلَيْهِ اَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللّٰهَ وَتُخْفِيْ فِيْ نَفْسِكَ مَا اللّٰهُ مُبْدِيْهِ وَتَخْشَى النَّاسَۚ وَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشٰىهُ ۗ فَلَمَّا قَضٰى زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًاۗ زَوَّجْنٰكَهَا لِكَيْ لَا يَكُوْنَ عَلَى الْمُؤْمِنِيْنَ حَرَجٌ فِيْٓ اَزْوَاجِ اَدْعِيَاۤىِٕهِمْ اِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًاۗ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُوْلًا

wa iż taqūlu lil-lażī an‘amallāhu ‘alaihi wa an‘amta ‘alaihi amsik ‘alaika zaujaka wattaqillāha wa tukhfī fī nafsika mallāhu mubdīhi wa takhsyan-nās(a), wallāhu aḥaqqu an takhsyāh(u), falammā qaḍā zaidum minhā waṭaran zawwajnākahā likai lā yakūna ‘alal-mu'minīna ḥarajun fī azwāji ad‘iyā'ihim iżā qaḍau minhunna waṭarā(n), wa kāna amrullāhi maf‘ūlā(n).

आ (याद राखू), जखन अहाँ (मुहम्मद) ओहि व्यक्ति सँ कहलियैक जकरा पर अल्लाह एहसान केने छल आ अहाँ (ओहो) ओकरा पर एहसान केने रही, "अपन पत्नी के राखू आ अल्लाह सँ डरू" जखन कि अहाँ अपन दिल मे नुका रहल छलहुँ जे अल्लाह की प्रकट करताह, आ अहाँ लोक सँ डरैत छलहुँ, भले अल्लाह केँ अहाँ सँ डरबाक बेसी अधिकार छल। त जखन जैद अपन पत्नी के लेल अपन जरूरत समाप्त क देने छल (तलाक द देने छल), त हम अहाँक विवाह हुनका (जैनाब) स केलहुं ताकि विश्वासी के अपन गोद लेल बच्चा के पत्नी स (विवाह) करय मे कोनो आपत्ति नहि हो, अगर गोद लेल बच्चा अपन पत्नी के लेल अपन जरूरत पूरा क लेने रहितथि। आ भगवानक फरमान अवश्य पूरा होयत।


1
Q.S अत-तहरीम (66:1)

يٰٓاَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَآ اَحَلَّ اللّٰهُ لَكَۚ تَبْتَغِيْ مَرْضَاتَ اَزْوَاجِكَۗ وَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

yā ayyuhan-nabiyyu lima tuḥarrimu mā aḥallallāhu lak(a), tabtagī marḍāta azwājik(a), wallāhu gafūrur raḥīm(un).

हे नबी ! अल्लाह जे अहाँ लेल हलाल केने छथि ओकरा अहाँ किएक मना करैत छी? की अहाँ अपन पत्नी सभकेँ प्रसन्न करय चाहैत छी? आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


1
Q.S अबसा (80:1)

عَبَسَ وَتَوَلّٰىٓۙ

‘abasa wa tawallā.

हुनका (मुहम्मद) के चेहरा खट्टा छलनि आ ओ मुँह घुमा लेलनि,