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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Akhlak dan Adab Akhlak Akhlak Buruk Mencaci Mengutuk orang kafir dan mencacinya

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कुल आयत : 30
88
Q.S अल-बकराह के ह (2:88)

وَقَالُوْا قُلُوْبُنَا غُلْفٌ ۗ بَلْ لَّعَنَهُمُ اللّٰهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيْلًا مَّا يُؤْمِنُوْنَ

wa qālū qulūbunā gulf(un), bal la‘anahumullāhu bikufrihim faqalīlam mā yu'minūn(a).

आ ऊ लोग कहल कि, “हमनी के दिल बंद हो गइल बा.” ना! अल्लाह ओह लोग के ना आज्ञा ना माने के चलते गारी देले बाड़े, लेकिन ओ लोग में से बहुत कम लोग विश्वास करेले।


89
Q.S अल-बकराह के ह (2:89)

وَلَمَّا جَاۤءَهُمْ كِتٰبٌ مِّنْ عِنْدِ اللّٰهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْۙ وَكَانُوْا مِنْ قَبْلُ يَسْتَفْتِحُوْنَ عَلَى الَّذِيْنَ كَفَرُوْاۚ فَلَمَّا جَاۤءَهُمْ مَّا عَرَفُوْا كَفَرُوْا بِهٖ ۖ فَلَعْنَةُ اللّٰهِ عَلَى الْكٰفِرِيْنَ

wa lammā jā'akum kitābum min ‘indillāhi muṣaddiqul limā ma‘ahum, wa kānū min qablu yastaftiḥūna ‘alal-lażīna kafarū, falammā jā'ahum mā ‘arafū kafarū bih(ī), fala‘natullāhi ‘alal-kāfirīn(a).

आ अल्लाह के ओर से किताब (अल-कुरान) ओह लोग के लगे अइला के बाद जवन ओह लोग के लगे जवन बा ओकरा के पुष्टि करत रहे, जबकि पहिले उ लोग काफिरन पर जीत के मांग कईले रहे, त पता चलल कि जब उ लोग जवन जानत रहे उ उ लोग के लगे आईल त उ लोग एकरा से इनकार क देले। त अल्लाह के श्राप ओह लोग पर बा जे काफिर करेला।


159
Q.S अल-बकराह के ह (2:159)

اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْتُمُوْنَ مَآ اَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنٰتِ وَالْهُدٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا بَيَّنّٰهُ لِلنَّاسِ فِى الْكِتٰبِۙ اُولٰۤىِٕكَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللّٰعِنُوْنَۙ

innal-lażīna yaktumūna mā anzalnā minal-bayyināti wal-hudā mim ba‘di mā bayyannāhu lin-nāsi fil-kitāb(i), ulā'ika yal‘anuhumullāhu wa yal‘anuhumul-lā‘inūn(a).

दरअसल, जे लोग हमनी के जवन भेजले बानी जा ओकरा के जानकारी आ मार्गदर्शन के रूप में छिपावेला, हमनी के किताब (अल-कुरान) में इंसानियत के समझावे के बाद, उहे लोग ह जेकरा के अल्लाह के श्राप दिहल जाला आ गारी देवे वाला लोग के श्राप (साथे) होला,


161
Q.S अल-बकराह के ह (2:161)

اِنَّ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا وَمَاتُوْا وَهُمْ كُفَّارٌ اُولٰۤىِٕكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ اللّٰهِ وَالْمَلٰۤىِٕكَةِ وَالنَّاسِ اَجْمَعِيْنَۙ

innal-lażīna kafarū wa mātū wa hum kuffārun ulā'ika ‘alaihim la‘natullāhi wal-malā'ikati wan-nāsi ajma‘īn(a).

साँचहू जे काफिर होके काफिर बन के मर जाई, ओकरा के अल्लाह, फरिश्ता आ सगरी इंसान के श्राप दिहल जाई,


87
Q.S अली इमरान के ह (3:87)

اُولٰۤىِٕكَ جَزَاۤؤُهُمْ اَنَّ عَلَيْهِمْ لَعْنَةَ اللّٰهِ وَالْمَلٰۤىِٕكَةِ وَالنَّاسِ اَجْمَعِيْنَۙ

ulā'ika jazā'uhum anna ‘alaihim la‘natallāhi wal-malā'ikati wan-nāsi ajma‘īn(a).

ओह लोग खातिर बदला ई बा कि अल्लाह, फरिश्ता आ सगरी इंसान के श्राप ओह लोग पर गिर जाई.


46
Q.S अन-निसा के बा (4:46)

مِنَ الَّذِيْنَ هَادُوْا يُحَرِّفُوْنَ الْكَلِمَ عَنْ مَّوَاضِعِهٖ وَيَقُوْلُوْنَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَاسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍ وَّرَاعِنَا لَيًّاۢ بِاَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًا فِى الدِّيْنِۗ وَلَوْ اَنَّهُمْ قَالُوْا سَمِعْنَا وَاَطَعْنَا وَاسْمَعْ وَانْظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ وَاَقْوَمَۙ وَلٰكِنْ لَّعَنَهُمُ اللّٰهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوْنَ اِلَّا قَلِيْلًا

minal-lażīna hādū yuḥarrifūnal-kalima ‘am mawāḍi‘ihī wa yaqūlūna sami‘nā wa ‘aṣainā wasma‘ gaira musmi‘iw wa rā‘inā layyam bi'alsinatihim wa ṭa‘nan fid-dīn(i), wa lau annahum qālū sami‘nā wa aṭa‘nā wasma‘ wanẓurnā lakāna khairal lahum wa aqwam(a), wa lākil la‘anahumullāhu bikufrihim falā yu'minūna illā qalīlā(n).

(अर्थात) यहूदी लोग में, जे शब्दन के अपना जगह से बदल देला। उ लोग कहले, “हम सुनले बानी, लेकिन हमनी के बात ना मानब जा।” आ (उ लोग इहो कहल कि), "सुनऽ," जबकि (तू मुहम्मद असल में) कुछ ना सुननी। आ (कहला) “रईना” जीभ के मोड़ के धर्म के निंदा करेले। अगर उ लोग कहले रहते कि, "हमनी के सुनतानी अवुरी बात मानतानी, अवुरी सुनतानी, अवुरी हमनी प ध्यान देतानी" त उ लोग खाती इहे निमन अवुरी सही रहित, लेकिन अल्लाह उनुका के गारी देले रहित, काहेंकी ओ लोग के अविश्वास के चलते। बहुत कम लोग के छोड़ के उ लोग विश्वास ना करेले।


47
Q.S अन-निसा के बा (4:47)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ اٰمِنُوْا بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُمْ مِّنْ قَبْلِ اَنْ نَّطْمِسَ وُجُوْهًا فَنَرُدَّهَا عَلٰٓى اَدْبَارِهَآ اَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّآ اَصْحٰبَ السَّبْتِ ۗ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُوْلًا

yā ayyuhal-lażīna ūtul-kitāba āminū bimā nazzalnā muṣaddiqal limā ma‘akum min qabli an naṭmisa wujūhan fa naruddahā ‘alā adbārihā au nal‘anahum kamā la‘annā aṣḥābas-sabt(i), wa kāna amrullāhi maf‘ūlā(n).

हे लोग जेकरा के किताब दिहल गइल बा! हमनी के जवन नीचे भेजले बानी जा (कुरान) ओकरा प विश्वास करीं जवन कि किताब के पुष्टि करेला जवन कि आपके संगे बा, ओकरा से पहिले कि हमनी के (रउरा) चेहरा बदल देनी जा, फिर हमनी के ओ लोग के पीछे मुड़ देनी जा या हमनी के ओ लोग के गारी देवेनी जा जईसे हमनी के सब्त (शनिवार) के (शनिवार) के (शनिवार) के (अनैतिकता करे वाला) के गारी देवेनी। आ भगवान के फरमान जरूर लागू होई।


52
Q.S अन-निसा के बा (4:52)

اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ ۗوَمَنْ يَّلْعَنِ اللّٰهُ فَلَنْ تَجِدَ لَهٗ نَصِيْرًا

ulā'ikal-lażīna la‘anahumullāh(u), wa may yal‘anillāhu falan tajida lahū naṣīrā(n).

इहे लोग ह जेकरा के अल्लाह गारी देले रहले। आ जेकरा के अल्लाह के गारी दिहल जाई ओकरा खातिर रउरा कवनो सहायक ना होखी.


13
Q.S अल-मैदाह के ह (5:13)

فَبِمَا نَقْضِهِمْ مِّيْثَاقَهُمْ لَعَنّٰهُمْ وَجَعَلْنَا قُلُوْبَهُمْ قٰسِيَةً ۚ يُحَرِّفُوْنَ الْكَلِمَ عَنْ مَّوَاضِعِهٖۙ وَنَسُوْا حَظًّا مِّمَّا ذُكِّرُوْا بِهٖۚ وَلَا تَزَالُ تَطَّلِعُ عَلٰى خَاۤىِٕنَةٍ مِّنْهُمْ اِلَّا قَلِيْلًا مِّنْهُمْ ۖ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاصْفَحْ ۗاِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِيْنَ

fabimā naqḍihim mīṡāqahum la‘annāhum wa ja‘alnā qulūbahum qāsiyah(tan), yuḥarrifūnal-kalima ‘am mawāḍi‘ih(ī), wa nasū ḥaẓẓam mimmā żukkirū bih(ī), wa lā tazālu taṭṭali‘u ‘alā khā'inatim minhum illā qalīlam minhum fa‘fu ‘anhum waṣfaḥ, innallāha yuḥibbul-muḥsinīn(a).

(लेकिन) काहे कि उ लोग आपन वादा तूड़ले, हमनी के ओ लोग के गारी देनी अवुरी हमनी के ओ लोग के दिल कठोर क देनी। उ लोग (अल्लाह के) शब्द के ओकरा जगह से बदलल पसंद करेले, अवुरी उ लोग (जानबूझ के) कुछ संदेश के भूला जाले, जवना से उनुका के चेतावल गईल रहे। रउआ (हे मुहम्मद) ओह लोग से गद्दारी देखत रहब सिवाय ओह लोग में से एगो छोट समूह (जे धोखा ना करेला), एहसे ओह लोग के माफ कर दीं आ छोड़ दीं. सचमुच अल्लाह भलाई करे वाला लोग से प्यार करेले।


60
Q.S अल-मैदाह के ह (5:60)

قُلْ هَلْ اُنَبِّئُكُمْ بِشَرٍّ مِّنْ ذٰلِكَ مَثُوْبَةً عِنْدَ اللّٰهِ ۗمَنْ لَّعَنَهُ اللّٰهُ وَغَضِبَ عَلَيْهِ وَجَعَلَ مِنْهُمُ الْقِرَدَةَ وَالْخَنَازِيْرَ وَعَبَدَ الطَّاغُوْتَۗ اُولٰۤىِٕكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَّاَضَلُّ عَنْ سَوَاۤءِ السَّبِيْلِ

qul hal unabbi'ukum bisyarrim min żālika maṡūbatan ‘indallāh(i), mal la‘anahullāhu wa gaḍiba ‘alaihi wa ja‘ala minhumul-qiradata wal-khanāzīra wa ‘abadaṭ-ṭāgūt(a), ulā'ika syarrum makānaw wa aḍallu ‘an sawā'is-sabīl(i).

कह (मुहम्मद) "का हम रउआ के अइसन लोग के बारे में बताइब जिनकर बदला अल्लाह के नजर में (दुष्ट) से भी बुरा बा? यानी कि अल्लाह से श्रापित आ गुस्सा वाला लोग, ओहमें (उ लोग) लोग बा जेकरा के बंदर आ सुअर बनावल जाला आ (जे) थघुत के पूजा करेला।" उ लोग अउरी खराब जगह प बाड़े अवुरी सीधा रास्ता से जादे भटकल बाड़े।


64
Q.S अल-मैदाह के ह (5:64)

وَقَالَتِ الْيَهُوْدُ يَدُ اللّٰهِ مَغْلُوْلَةٌ ۗغُلَّتْ اَيْدِيْهِمْ وَلُعِنُوْا بِمَا قَالُوْا ۘ بَلْ يَدٰهُ مَبْسُوْطَتٰنِۙ يُنْفِقُ كَيْفَ يَشَاۤءُۗ وَلَيَزِيْدَنَّ كَثِيْرًا مِّنْهُمْ مَّآ اُنْزِلَ اِلَيْكَ مِنْ رَّبِّكَ طُغْيَانًا وَّكُفْرًاۗ وَاَلْقَيْنَا بَيْنَهُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاۤءَ اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَةِۗ كُلَّمَآ اَوْقَدُوْا نَارًا لِّلْحَرْبِ اَطْفَاَهَا اللّٰهُ ۙوَيَسْعَوْنَ فِى الْاَرْضِ فَسَادًاۗ وَاللّٰهُ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِيْنَ

wa qālatil-yahūdu yadullāhi maglūlah(tun), gullat aidīhim wa lu‘inū bimā qālū, bal yadāhu mabsūṭatān(i), yunfiqu kaifa yasyā'(u), wa layazīdanna kaṡīram minhum mā unzila ilaika mir rabbika ṭugyānaw wa kufrā(n), wa alqainā bainahumul-‘adāwata wal-bagḍā'a ilā yaumil-qiyāmah(ti), kullamā auqadū nāral lil-ḥarbi aṭfa'ahallāh(u), wa yas‘auna fil-arḍi fasādā(n), wallāhu lā yuḥibbul-mufsidīn(a).

आ यहूदी लोग कहले, “परमेशवर के हाथ बान्हल बा.” असल में ई ओह लोग के हाथ ह जवना के बेड़ी बान्हल बा आ ओह लोग के कहल बात का चलते गारी दिहल जाला, भलही अल्लाह के दुनु हाथ खुलल होखे; जइसे मन करेला रोजी-रोटी देला। आ (कुरान) जवन रउरा रब से रउरा लगे भेजल गइल बा, ऊ निश्चित रूप से ओहमें से अधिकतर लोग के आज्ञा ना माने आ अविश्वास के बढ़ा दी. आ हमनी के कयामत के दिन तक ओह लोग के बीच दुश्मनी आ नफरत पैदा कइनी जा। हर बेर जब युद्ध के आग जरावत रहले त अल्लाह ओकरा के बुझा देत रहले। आ ऊ लोग धरती पर विनाश (उत्पादन) करे के कोशिश करेला। आ नुकसान करे वाला लोग के अल्लाह पसंद नइखन करत.


78
Q.S अल-मैदाह के ह (5:78)

لُعِنَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْۢ بَنِيْٓ اِسْرَاۤءِيْلَ عَلٰى لِسَانِ دَاوٗدَ وَعِيْسَى ابْنِ مَرْيَمَ ۗذٰلِكَ بِمَا عَصَوْا وَّكَانُوْا يَعْتَدُوْنَ

lu‘inal-lażīna kafarū mim banī isrā'īla ‘alā lisāni dāwūda wa ‘īsabni maryam(a), żālika bimā ‘aṣaw wa kānū ya‘tadūn(a).

इस्राएल के संतान के काफिर लोग के दाऊद आ मरियम के बेटा ईसा के जीभ से श्राप मिलल रहे। एकर कारण रहे कि उ लोग आज्ञा ना मानत रहले अवुरी हमेशा उल्लंघन करत रहले।


44
Q.S अल-अ'रफ के ह (7:44)

وَنَادٰٓى اَصْحٰبُ الْجَنَّةِ اَصْحٰبَ النَّارِ اَنْ قَدْ وَجَدْنَا مَا وَعَدَنَا رَبُّنَا حَقًّا فَهَلْ وَجَدْتُّمْ مَّا وَعَدَ رَبُّكُمْ حَقًّا ۗقَالُوْا نَعَمْۚ فَاَذَّنَ مُؤَذِّنٌۢ بَيْنَهُمْ اَنْ لَّعْنَةُ اللّٰهِ عَلَى الظّٰلِمِيْنَ

wa nādā aṣḥābul-jannati aṣḥāban-nāri an qad wajadnā mā wa‘adanā rabbunā ḥaqqan fahal wajattum mā wa‘ada rabbukum ḥaqqā(n), qālū na‘am, fa ażżana mu'ażżinum bainahum al la‘natullāhi ‘alaẓ-ẓālimīn(a).

आ स्वर्ग के निवासी नरक के निवासी लोग के आवाज देले, "वास्तव में, हमनी के उहे मिलल बा जवन भगवान हमनी से वादा कईले रहले कि सच बा। का रउआ उहे पा लेले बानी जवन भगवान रउआ से वादा कईले रहले कि सच बा?" ऊ लोग जवाब दिहल, “ठीक बा.” तब फोन करे वाला (फरिशत) ओह लोग के बीच घोषणा कइलन कि "अल्लाह के श्राप गलतियन पर बा,


30
Q.S अत-तवबाह के बा (9:30)

وَقَالَتِ الْيَهُوْدُ عُزَيْرُ ِۨابْنُ اللّٰهِ وَقَالَتِ النَّصٰرَى الْمَسِيْحُ ابْنُ اللّٰهِ ۗذٰلِكَ قَوْلُهُمْ بِاَفْوَاهِهِمْۚ يُضَاهِـُٔوْنَ قَوْلَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ قَبْلُ ۗقَاتَلَهُمُ اللّٰهُ ۚ اَنّٰى يُؤْفَكُوْنَ

wa qālatil-yahūdu ‘uzairunibnullāhi wa qālatin-naṣāral-masīḥubnullāh(i), żālika qauluhum bi'afwāhihim, yuḍāhi'ūna qaulal-lażīna kafarū min qabl(u), qātalahumullāh(u), annā yu'fakūn(a).

आ यहूदी लोग कहल कि “अल्लाह के बेटा उजैर” आ ईसाई लोग कहल कि “अल्लाह के बेटा मसीहा.” उहे शब्द ह जवन ओह लोग के मुँह से निकलेला। उ लोग पहिले के काफिरन के बात के नकल करत रहले। अल्लाह ओह लोग के गारी देत बाड़े; कइसे उ लोग मुँह फेर लिहले?


68
Q.S अत-तवबाह के बा (9:68)

وَعَدَ اللّٰهُ الْمُنٰفِقِيْنَ وَالْمُنٰفِقٰتِ وَالْكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خٰلِدِيْنَ فِيْهَاۗ هِيَ حَسْبُهُمْ ۚوَلَعَنَهُمُ اللّٰهُ ۚوَلَهُمْ عَذَابٌ مُّقِيْمٌۙ

wa‘adallāhul-munāfiqīna wal-munāfiqāti wal-kuffāra nāra jahannama khālidīna fīhā, hiya ḥasbuhum, wa la‘anahumullāh(u), wa lahum ‘ażābum muqīm(un).

अल्लाह नर-मारी पाखंडी अवुरी काफिर से नरक के वादा (धमकी) करेले। उ लोग ओकरा में रह जाला। उ (नरक) उ लोग खातिर काफी बा। अल्लाह ओह लोग के गारी दिहले, आ ओह लोग के शाश्वत सजा मिल जाई,


18
Q.S ओढ़नी (11:18)

وَمَنْ اَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرٰى عَلَى اللّٰهِ كَذِبًاۗ اُولٰۤىِٕكَ يُعْرَضُوْنَ عَلٰى رَبِّهِمْ وَيَقُوْلُ الْاَشْهَادُ هٰٓؤُلَاۤءِ الَّذِيْنَ كَذَبُوْا عَلٰى رَبِّهِمْۚ اَلَا لَعْنَةُ اللّٰهِ عَلَى الظّٰلِمِيْنَ ۙ

wa man aẓlamu mimmaniftarā ‘alallāhi każibā(n), ulā'ika yu‘raḍūna ‘alā rabbihim wa yaqūlul-asyhādu hā'ulā'il-lażīna każabū ‘alā rabbihim, alā la‘natullāhi ‘alaẓ-ẓālimīn(a).

आ अल्लाह के खिलाफ झूठ के आविष्कार करे वाला से बेसी अन्याय के बा? ओह लोग के अपना मालिक का सोझा ले आवल जाई आ गवाह लोग कह दी कि "ई ऊ लोग ह जे अपना मालिक से झूठ बोलले रहुवे." याद रखीं, अल्लाह के अभिशाप गलत करे वाला लोग पर (लढ़ावल जाला)।


60
Q.S ओढ़नी (11:60)

وَاُتْبِعُوْا فِيْ هٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً وَّيَوْمَ الْقِيٰمَةِ ۗ اَلَآ اِنَّ عَادًا كَفَرُوْا رَبَّهُمْ ۗ اَلَا بُعْدًا لِّعَادٍ قَوْمِ هُوْدٍ ࣖ

wa utbi‘ū fī hażihid-dun-yā la‘nataw wa yaumal-qiyāmah(ti), alā inna ‘ādan kafarū rabbahum, alā bu‘dal li‘ādin qaumi hūd(in).

आ ओह लोग के बाद हमेशा एह दुनिया में आ (ओही तरह) क़यामत के दिन गारी मिलत रहेला। याद राखीं कि अद के लोग अपना भगवान के काफर कइले. सचमुच 'अद के लोग, हुद के लोग, नाश हो जाई।


68
Q.S ओढ़नी (11:68)

كَاَنْ لَّمْ يَغْنَوْا فِيْهَا ۗ اَلَآ اِنَّ ثَمُوْدَا۟ كَفَرُوْا رَبَّهُمْ ۗ اَلَا بُعْدًا لِّثَمُوْدَ ࣖ

ka allam yagnau fīhā, alā inna ṡamūda kafarū rabbahum, alā bu‘dal liṡamūd(a).

जइसे ऊ लोग ओह जगहा पर कबो ना रहल होखे. याद राखीं समुद के लोग अपना भगवान के नकारत रहे। याद राखीं समुद के लोग नाश हो जाई।


95
Q.S ओढ़नी (11:95)

كَاَنْ لَّمْ يَغْنَوْا فِيْهَا ۗ اَلَا بُعْدًا لِّمَدْيَنَ كَمَا بَعِدَتْ ثَمُوْدُ ࣖ

ka allam yagnau fīhā, alā bu‘dal limadyana kamā ba‘idat ṡamūd(u).

जइसे कि ऊ लोग ओह जगहा कबो ना रहल होखे. याद रखीं, मदन के लोग ओइसहीं नाश हो जाई जइसे समुद के लोग (उहो) के नाश होई।


99
Q.S ओढ़नी (11:99)

وَاُتْبِعُوْا فِيْ هٰذِهٖ لَعْنَةً وَّيَوْمَ الْقِيٰمَةِۗ بِئْسَ الرِّفْدُ الْمَرْفُوْدُ

wa utbi‘ū fī hāżihī la‘nataw wa yaumal-qiyāmah(ti), bi'sar-rifdul-marfūd(u).

आ ओह लोग के बाद इहाँ (दुनिया में) आ (ओही तरह) कयामत के दिन गारी दिहल जाला। (अनाथेमा) सबसे खराब उपहार दिहल जाला।


25
Q.S अर-रा'द के बा (13:25)

وَالَّذِيْنَ يَنْقُضُوْنَ عَهْدَ اللّٰهِ مِنْ ۢ بَعْدِ مِيْثَاقِهٖ وَيَقْطَعُوْنَ مَآ اَمَرَ اللّٰهُ بِهٖٓ اَنْ يُّوْصَلَ وَيُفْسِدُوْنَ فِى الْاَرْضِۙ اُولٰۤىِٕكَ لَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوْۤءُ الدَّارِ

wal-lażīna yanquḍūna ‘ahdallāhi mim ba‘di mīṡāqihī wa yaqṭa‘ūna mā amarallāhu bihī ay yūṣala wa yufsidūna fil-arḍ(i), ulā'ika lahumul-la‘natu wa lahum sū'ud-dār(i).

आ जे लोग अल्लाह के वादा बनला के बाद ओकरा के तोड़ेला, आ जवन अल्लाह के हुकुम कइले बा ओकरा के तोड़ के धरती पर बदमाशी करेला, ओह लोग खातिर अभिशाप आ एगो बुरा निवास (नरक) ह।


57
Q.S अल-अहजाब के ह (33:57)

اِنَّ الَّذِيْنَ يُؤْذُوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ فِى الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ وَاَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا مُّهِيْنًا

innal-lażīna yu'żūnallāha wa rasūlahū la‘anahumullāhu fid-dun-yā wal-ākhirati wa a‘adda lahum ‘ażābam muhīnā(n).

दरअसल, (विरुद्ध) जे लोग अल्लाह आ उनकर रसूलुल्लाह के नाराज करेला, अल्लाह ओह लोग के दुनिया आ परलोक में गारी दिहे, आ ओह लोग खातिर अपमानजनक सजा देईहे।


64
Q.S अल-अहजाब के ह (33:64)

اِنَّ اللّٰهَ لَعَنَ الْكٰفِرِيْنَ وَاَعَدَّ لَهُمْ سَعِيْرًاۙ

innallāha la‘anal-kāfirīna wa a‘adda lahum sa‘īrā(n).

सचमुच अल्लाह काफिरन के गारी देले बाड़े अवुरी उनुका खाती एगो धधकत आग (नरक) तैयार कईले बाड़े,


68
Q.S अल-अहजाब के ह (33:68)

رَبَّنَآ اٰتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ الْعَذَابِ وَالْعَنْهُمْ لَعْنًا كَبِيْرًا ࣖ

rabbanā ātihim ḍi‘faini minal-‘ażābi wal‘anhum la‘nan kabīrā(n).

हमनी के प्रभु, ओह लोग पर दोहरा सजा ले आवऽ आ ओह लोग के बड़हन अभिशाप से श्राप दीं."


6
Q.S अल-फत के ह (48:6)

وَّيُعَذِّبَ الْمُنٰفِقِيْنَ وَالْمُنٰفِقٰتِ وَالْمُشْرِكِيْنَ وَالْمُشْرِكٰتِ الظَّاۤنِّيْنَ بِاللّٰهِ ظَنَّ السَّوْءِۗ عَلَيْهِمْ دَاۤىِٕرَةُ السَّوْءِۚ وَغَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَاَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَۗ وَسَاۤءَتْ مَصِيْرًا

wa yu‘ażżibal-munāfiqīna wal-munāfiqāti wal-musyrikīna wal-musyrikātiẓ-ẓānnīna billāhi ẓannas-sau'(i), ‘alaihim dā'iratus-sau'(i), wa gaḍiballāhu ‘alaihim wa la‘anahum wa a‘adda lahum jahannam(a), wa sā'at maṣīrā(n).

आ ऊ पाखंडी, मरद मेहरारू, आ (साथे-साथे) मुश्रिक, मरद मेहरारू के सजा दिहलन जे अल्लाह के बारे में खराब राय राखत रहले. ओह लोग के बुरा मोड़ (सजा) होखी आ अल्लाह ओह लोग पर नाराज हो के ओह लोग के गारी दीहें आ ओह लोग खातिर नरक के तइयारी करीहें. आ (नरक) वापसी खातिर सबसे खराब जगह ह।


10
Q.S अध-धारियत के बा (51:10)

قُتِلَ الْخَرَّاصُوْنَۙ

qutilal-kharrāṣūn(a).

श्रापित बा लोग जे कई गो झूठ बोलेला,


4
Q.S अल-मुनाफिकून के ह (63:4)

۞ وَاِذَا رَاَيْتَهُمْ تُعْجِبُكَ اَجْسَامُهُمْۗ وَاِنْ يَّقُوْلُوْا تَسْمَعْ لِقَوْلِهِمْۗ كَاَنَّهُمْ خُشُبٌ مُّسَنَّدَةٌ ۗيَحْسَبُوْنَ كُلَّ صَيْحَةٍ عَلَيْهِمْۗ هُمُ الْعَدُوُّ فَاحْذَرْهُمْۗ قَاتَلَهُمُ اللّٰهُ ۖاَنّٰى يُؤْفَكُوْنَ

wa iżā ra'aitahum tu‘jibuka ajsāmuhum, wa iy yaqūlū tasma‘ liqaulihim, ka'annahum khusyubum musannadah(tun), yaḥsabūna kulla ṣaiḥatin ‘alaihim, humul-‘aduwwu faḥżarhum, qātalahumullāh(u), annā yu'fakūn(a).

आ जब रउरा ओह लोग के देखब त ओह लोग के देह रउरा के अचरज में डाल देला. आ अगर ऊ लोग बोलत बा त रउरा ओह लोग के बात सुनत बानी. झुकल लकड़ी जइसन होला। उ लोग के लागल कि हर चिल्लाहट उ लोग के ओर बा। ऊ लोग (असली) दुश्मन हवे, एहसे ओह लोग से सावधान रहीं; अल्लाह इनका के तबाह कर दिहले। कइसे ओह लोग के (सत्य से) मोड़ल जा सकेला?


19
Q.S अल-मुद्दथथिर के ह (74:19)

فَقُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَۙ

faqutila kaifa qaddar(a).

तब ओकरा पर धिक्कार बा! ऊ कइसे तय करेला?


20
Q.S अल-मुद्दथथिर के ह (74:20)

ثُمَّ قُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَۙ

Ṡumma qutila kaifa qaddar(a).

फेरु ओकरा पर धिक्कार बा! ऊ कइसे तय करेला?


17
Q.S अबसा के बा (80:17)

قُتِلَ الْاِنْسَانُ مَآ اَكْفَرَهٗۗ

qutilal-insānu mā akfarah(ū).

आदमी के हाय! ऊ केतना कृतघ्न बा!