इस्लाम स्वीकार करें, यहाँ क्लिक करें
इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - अल-कुरान कुरान का रहस्योद्घाटन कुरान कुरैश जनजाति की भाषा में लिखा गया था

श्लोक खोज परिणाम :
कुल श्लोक : 14
2
Q.S यूसुफ (12:2)

اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُوْنَ

innā anzalnāhu qur'ānan ‘arabiyyal la‘allakum ta‘qilūn(a).

निश्चित रूप से हमने इसे अरबी भाषा में क़ुरआन के रूप में उतारा, ताकि तुम समझ सको।


37
Q.S अर-रअद (13:37)

وَكَذٰلِكَ اَنْزَلْنٰهُ حُكْمًا عَرَبِيًّاۗ وَلَىِٕنِ اتَّبَعْتَ اَهْوَاۤءَهُمْ بَعْدَمَا جَاۤءَكَ مِنَ الْعِلْمِۙ مَا لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ وَّلِيٍّ وَّلَا وَاقٍ ࣖ

wa każālika anzalnāhu ḥukman ‘arabiyyā(n), wa la'inittaba‘ta ahwā'ahum ba‘da mā jā'aka minal-‘ilm(i), mā laka minallāhi miw waliyyiw wa lā wāq(in).

और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला


103
Q.S एक Nahl (16:103)

وَلَقَدْ نَعْلَمُ اَنَّهُمْ يَقُوْلُوْنَ اِنَّمَا يُعَلِّمُهٗ بَشَرٌۗ لِسَانُ الَّذِيْ يُلْحِدُوْنَ اِلَيْهِ اَعْجَمِيٌّ وَّهٰذَا لِسَانٌ عَرَبِيٌّ مُّبِيْنٌ

wa laqad na‘lamu annahum yaqūlūna innamā yu‘allimuhū basyar(un), lisānul-lażī yulḥidūna ilaihi a‘jamiyyuw wa hāżā lisānun ‘arabiyyum mubīn(un).

और हम निश्चित रूप से जानते हैं कि वे कहते हैं, 'निश्चित रूप से इसे (मुहम्मद को) एक इंसान ने सिखाया।' जिस व्यक्ति की तरफ़ वे इशारा करते हैं, उसकी ज़बान अजमी है, जबकि यह (क़ुरआन) साफ़ अरबी ज़बान में है।


97
Q.S मरयम (19:97)

فَاِنَّمَا يَسَّرْنٰهُ بِلِسَانِكَ لِتُبَشِّرَ بِهِ الْمُتَّقِيْنَ وَتُنْذِرَ بِهٖ قَوْمًا لُّدًّا

fa innamā yassarnāhu bilisānika litubasysyira bihil-muttaqīna wa tunżira bihī qaumal luddā(n).

तो (ऐ मुहम्मद) हमने इसे (कुरआन को) तेरी ज़बान में आसान कर दिया, ताकि तू इसके ज़रिए तकवा वालों को खुशखबरी दे और ज़िद्दी कौम को खबरदार करे।


113
Q.S टा-हा (20:113)

وَكَذٰلِكَ اَنْزَلْنٰهُ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا وَّصَرَّفْنَا فِيْهِ مِنَ الْوَعِيْدِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُوْنَ اَوْ يُحْدِثُ لَهُمْ ذِكْرًا

wa każālika anzalnāhu qur'ānan ‘arabiyyaw wa ṣarrafnā fīhi minal-wa‘īdi la‘allahum yattaqūna au yuḥdiṡu lahum żikrā(n).

और इस तरह हमने इसे अरबी कुरआन के रूप में उतारा, और इसमें हमने कई तरह की ताक़ीद को बार-बार बयान किया, ताकि वे तकवा इख्तियार करें, या यह उनके लिए एक नसीहत पैदा करे।


195
Q.S ऐश-शुअरा (26:195)

بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُّبِيْنٍ ۗ

bilisānin ‘arabiyyim mubīn(in).

स्पष्ट अरबी ज़बान में।


198
Q.S ऐश-शुअरा (26:198)

وَلَوْ نَزَّلْنٰهُ عَلٰى بَعْضِ الْاَعْجَمِيْنَ ۙ

wa lau nazzalnāhū ‘alā ba‘ḍil-a‘jamīn(a).

और अगर हमने (कुरआन) को गैर-अरब लोगों में से किसी पर उतारा होता।


28
Q.S अज़-ज़ुमर (39:28)

قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا غَيْرَ ذِيْ عِوَجٍ لَّعَلَّهُمْ يَتَّقُوْنَ

qur'ānan ‘arabiyyan gaira żī ‘iwajil la‘allahum yattaqūn(a).

(यह) अरबी क़ुरआन है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं ताकि वे तक़वा इख्तियार करें।


3
Q.S उधम मचाना (41:3)

كِتٰبٌ فُصِّلَتْ اٰيٰتُهٗ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لِّقَوْمٍ يَّعْلَمُوْنَۙ

kitābun fuṣṣilat āyātuhū qur'ānan ‘arabiyyal liqaumiy ya‘lamūn(a).

एक किताब जिसकी आयतें खुली हुई और बयान की गई हैं, अरबी क़ुरआन में, उन लोगों के लिए जो समझ रखते हैं।


44
Q.S उधम मचाना (41:44)

وَلَوْ جَعَلْنٰهُ قُرْاٰنًا اَعْجَمِيًّا لَّقَالُوْا لَوْلَا فُصِّلَتْ اٰيٰتُهٗ ۗ ءَاَ۬عْجَمِيٌّ وَّعَرَبِيٌّ ۗ قُلْ هُوَ لِلَّذِيْنَ اٰمَنُوْا هُدًى وَّشِفَاۤءٌ ۗوَالَّذِيْنَ لَا يُؤْمِنُوْنَ فِيْٓ اٰذَانِهِمْ وَقْرٌ وَّهُوَ عَلَيْهِمْ عَمًىۗ اُولٰۤىِٕكَ يُنَادَوْنَ مِنْ مَّكَانٍۢ بَعِيْدٍ ࣖ

wa lau ja‘alnāhu qur'ānan a‘jamiyyal laqālū lau lā fuṣṣilat āyātuh(ū), a'a‘jamiyyuw wa ‘arabiyy(un), qul huwa lil-lażīna āmanū hudaw wa syifā'(un), wal-lażīna lā yu'minūna fī āżānihim waqruw wa huwa ‘alaihim ‘amā(n), ulā'ika yunādauna mim makānim ba‘īd(in).

और अगर हम क़ुरआन को ग़ैर-अरबी ज़बान में बनाते, तो वे कहते, 'इसकी आयतें क्यों नहीं खुलीं?' क्या (क़ुरआन) ग़ैर-अरबी हो और (रसूल) अरबी? कह दे, 'यह उन लोगों के लिए हिदायत और शिफ़ा है जो ईमान लाए। और जो लोग ईमान नहीं लाते, उनके कानों में बोझ है, और यह (क़ुरआन) उनके लिए अंधेरा है। वे ऐसे हैं जैसे किसी को दूर से पुकारा जाए।'


7
Q.S राख शूरा (42:7)

وَكَذٰلِكَ اَوْحَيْنَآ اِلَيْكَ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لِّتُنْذِرَ اُمَّ الْقُرٰى وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنْذِرَ يَوْمَ الْجَمْعِ لَا رَيْبَ فِيْهِ ۗفَرِيْقٌ فِى الْجَنَّةِ وَفَرِيْقٌ فِى السَّعِيْرِ

wa każālika auḥainā ilaika qur'ānan ‘arabiyyal litunżira ummal-qurā wa man ḥaulahā wa tunżira yaumal-jam‘i lā raiba fīh(i), farīqun fil-jannati wa farīqun fis-sa‘īr(i).

और इस तरह हमने तुझ पर अरबी ज़बान में क़ुरआन की वह्य की, ताकि तू मक्का की माँ (बस्ती) और इसके आसपास वालों को चेतावनी दे और उस इकट्ठा होने वाले दिन (क़ियामत) के बारे में चेतावनी दे, जिसमें कोई शक नहीं। एक गिरोह जन्नत में जाएगा और एक गिरोह जहन्नम में।


3
Q.S अज़-ज़ुख़रुफ़ (43:3)

اِنَّا جَعَلْنٰهُ قُرْاٰنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُوْنَۚ

innā ja‘alnāhu qur'ānan ‘arabiyyal la‘allakum ta‘qilūn(a).

हमने इसे अरबी ज़बान में बनाया ताकि तुम समझ सको।


58
Q.S विज्ञापन डख़ान (44:58)

فَاِنَّمَا يَسَّرْنٰهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُوْنَ

fa innamā yassarnāhu bilisānika la‘allahum yatażakkarūn(a).

निश्चय ही, हमने इस क़ुरआन को तेरी ज़बान में आसान कर दिया ताकि वे नसीहत लें।


12
Q.S अल Ahqaf (46:12)

وَمِنْ قَبْلِهٖ كِتٰبُ مُوْسٰٓى اِمَامًا وَّرَحْمَةً ۗوَهٰذَا كِتٰبٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنْذِرَ الَّذِيْنَ ظَلَمُوْا ۖوَبُشْرٰى لِلْمُحْسِنِيْنَ

wa min qablihī kitābu mūsā imāmaw wa raḥmah(tan), wa hāżā kitābum muṣaddiqul lisānan ‘arabiyyal liyunżiral-lażīna ẓalamū, wa busyrā lil-muḥsinīn(a).

और इससे पहले मूसा की किताब हिदायत और रहमत के तौर पर थी। और यह (क़ुरआन) एक किताब है जो अरबी ज़बान में इसे तस्दीक़ करती है ताकि ज़ालिम लोगों को चेतावनी दे और नेक काम करने वालों को खुशखबरी दे।