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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Akhlak dan Adab Akhlak Akhlak Mulia Etika Terhadap Nabi Pembicaraan khusus dengan Nabi

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कुल आयत : 7
104
Q.S अल-बकराह (2:104)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَقُوْلُوْا رَاعِنَا وَقُوْلُوا انْظُرْنَا وَاسْمَعُوْا وَلِلْكٰفِرِيْنَ عَذَابٌ اَلِيْمٌ

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā taqūlū rā‘inā wa qūlunẓurnā wasma‘ū wa lil-kāfirīna ‘ażābun alīm(un).

हे विश्वास करनिहार! रा’इना नहि कहब, “उन्झुर्ना” कहि सुनू। आ जे अविश्वास करत ओकरा कष्टदायक सजा भेटतैक।


62
Q.S अन-नूर (24:62)

اِنَّمَا الْمُؤْمِنُوْنَ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا بِاللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖ وَاِذَا كَانُوْا مَعَهٗ عَلٰٓى اَمْرٍ جَامِعٍ لَّمْ يَذْهَبُوْا حَتّٰى يَسْتَأْذِنُوْهُۗ اِنَّ الَّذِيْنَ يَسْتَأْذِنُوْنَكَ اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ يُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖۚ فَاِذَا اسْتَأْذَنُوْكَ لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَنْ لِّمَنْ شِئْتَ مِنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمُ اللّٰهَ ۗاِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

innamal-mu'minūnal-lażīna āmanū billāhi wa rasūlihī wa iżā kānū ma‘ahū ‘alā amrin jāmi‘il lam yażhabū ḥattā yasta'żinūh(u), innal-lażīna yasta'żinūnaka ulā'ikal-lażīna yu'minūna billāhi wa rasūlih(ī), fa iżasta'żanūka liba‘ḍi sya'nihim fa'żal liman syi'ta minhum wastagfir lahumullāh(a), innallāha gafūrur raḥīm(un).

(कथित) मुसलमान केवल वैह होइत छथि जे अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह (मुहम्मद) पर विश्वास करैत छथि, आ जखन ओ हुनका (मुहम्मद) के संग कोनो साझा मामला मे एक संग रहैत छथि त हुनकर अनुमति लेबा स पहिने (अल्लाह के रसूलुल्लाह) स बाहर नहि निकलैत छथि | सचमुच, जे अहाँ (मुहम्मद) स अनुमति मांगैत छथि, ओ लोक छथि जे (सच मे) अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह पर विश्वास करैत छथि। अतः यदि ओ सब कोनो जरूरत के कारण अहाँ स अनुमति मांगैत छथि त हुनका सब में जेकरा अहाँ चाहैत छी ओकरा अनुमति दियौ आ हुनका सब लेल अल्लाह स माफी मांगू। सचमुच अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


3
Q.S अल-हुजुरात (49:3)

اِنَّ الَّذِيْنَ يَغُضُّوْنَ اَصْوَاتَهُمْ عِنْدَ رَسُوْلِ اللّٰهِ اُولٰۤىِٕكَ الَّذِيْنَ امْتَحَنَ اللّٰهُ قُلُوْبَهُمْ لِلتَّقْوٰىۗ لَهُمْ مَّغْفِرَةٌ وَّاَجْرٌ عَظِيْمٌ

innal-lażīna yaguḍḍūna aṣwātahum ‘inda rasūlillāhi ulā'ikal-lażīnamtaḥanallāhu qulūbahum lit-taqwā, lahum magfiratuw wa ajrun ‘aẓīm(un).

सचमुच, जे लोग अल्लाह के रसूलुल्लाह के कात में आवाज कम करै छै, वू वू लोग छै, जेकरऽ दिल के परख अल्लाह द्वारा भक्त होय के लेलऽ गेलऽ छै । क्षमा आ पैघ इनाम भेटतनि।


4
Q.S अल-हुजुरात (49:4)

اِنَّ الَّذِيْنَ يُنَادُوْنَكَ مِنْ وَّرَاۤءِ الْحُجُرٰتِ اَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُوْنَ

innal-lażīna yunādūnaka miw warā'il-ḥujurāti akṡaruhum lā ya‘qilūn(a).

सचमुच, बाहर (अहाँक) कोठली सँ अहाँ केँ (मुहम्मद) बजनिहार अधिकांश लोक नहि बुझैत छथि।


5
Q.S अल-हुजुरात (49:5)

وَلَوْ اَنَّهُمْ صَبَرُوْا حَتّٰى تَخْرُجَ اِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۗوَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

wa lau annahum ṣabarū ḥattā takhruja ilaihim lakāna khairal lahum, wallāhu gafūrur raḥīm(un).

आ जँ अहाँ हुनका सभसँ भेंट करय लेल बाहर नहि आबि गेलहुँ ता धरि ओ सभ धैर्य रखने रहितथि तँ हुनका सभक लेल नीक रहितनि । आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।


12
Q.S अल-मुजादिलाह (58:12)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُوْلَ فَقَدِّمُوْا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰىكُمْ صَدَقَةً ۗذٰلِكَ خَيْرٌ لَّكُمْ وَاَطْهَرُۗ فَاِنْ لَّمْ تَجِدُوْا فَاِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ

yā ayyuhal-lażīna āmanū iżā nājaitumur-rasūla fa qaddimū baina yaday najwākum ṣadaqah(tan), żālika khairul lakum wa aṭhar(u), fa'illam tajidū fa innallāha gafūrur raḥīm(un).

हे विश्वास करनिहार! जखन अहाँ रसूलुल्लाह सँ कोनो विशेष गप्प-सप्प करैत छी तखन गप्प-सप्प (करबा) सँ पहिने (गरीब केँ) दक्षिणा देबाक चाही। जे अहाँक लेल नीक आ साफ-सुथरा। मुदा जँ अहाँ सभ (जे दान मे देबाक अछि) नहि प्राप्त करैत छी तँ सचमुच अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि ।


13
Q.S अल-मुजादिलाह (58:13)

ءَاَشْفَقْتُمْ اَنْ تُقَدِّمُوْا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوٰىكُمْ صَدَقٰتٍۗ فَاِذْ لَمْ تَفْعَلُوْا وَتَابَ اللّٰهُ عَلَيْكُمْ فَاَقِيْمُوا الصَّلٰوةَ وَاٰتُوا الزَّكٰوةَ وَاَطِيْعُوا اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ ۗوَاللّٰهُ خَبِيْرٌ ۢبِمَا تَعْمَلُوْنَ ࣖ

a'asyfaqtum an tuqaddimū baina yaday najwākum ṣadaqāt(in), fa iż lam taf‘alū wa tāballāhu ‘alaikum fa'aqīmuṣ-ṣalāta wa ātuz-zakāta wa aṭī‘ullāha wa rasūlah(ūwallāhu khabīrum bimā ta‘malūn(a).

की अहाँ (गरीब बनय सँ) डरैत छी, कारण अहाँ रसूलुल्लाह सँ गप्प-सप्प करबा सँ पहिने भिक्षा देलहुँ? मुदा जँ अहाँ नै करब आ अल्लाह अहाँ के माफ क देने छथि त नमाज पूरा करू, आ जकात करू आ अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के बात मानू ! आ अल्लाह अहाँ जे काज करैत छी ताहि मे बहुत सावधान रहैत छथि।