مَا يَفْعَلُ اللّٰهُ بِعَذَابِكُمْ اِنْ شَكَرْتُمْ وَاٰمَنْتُمْۗ وَكَانَ اللّٰهُ شَاكِرًا عَلِيْمًا ۔
mā yaf‘alullāhu bi‘ażābikum in syakartum wa āmantum, wa kānallāhu syākiran ‘alīmā(n).
अल्लाह अहाँ के यातना नै देत, अगर अहाँ आभारी छी आ इमानदार छी। आ अल्लाह सब कृतज्ञ, सर्वज्ञ छथि।
لِيُوَفِّيَهُمْ اُجُوْرَهُمْ وَيَزِيْدَهُمْ مِّنْ فَضْلِهٖۗ اِنَّهٗ غَفُوْرٌ شَكُوْرٌ
liyuwaffiyahum ujūrahum wa yazīdahum min faḍlih(ī), innahū gafūrun syakūr(un).
ताकि अल्लाह हुनका सब पर अपन इनाम पूरा करथि आ अपन इनाम बढ़ा सकथि। सचमुच अल्लाह परम क्षमाशील, परम आभारी छथि।
ذٰلِكَ الَّذِيْ يُبَشِّرُ اللّٰهُ عِبَادَهُ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَعَمِلُوا الصّٰلِحٰتِۗ قُلْ لَّآ اَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ اَجْرًا اِلَّا الْمَوَدَّةَ فِى الْقُرْبٰىۗ وَمَنْ يَّقْتَرِفْ حَسَنَةً نَّزِدْ لَهٗ فِيْهَا حُسْنًا ۗاِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ شَكُوْرٌ
Żālikal-lażī yubasysyirullāhu ‘ibādahul-lażīna āmanū wa ‘amiluṣ-ṣāliḥāt(i), qul lā as'alukum ‘alaihi ajran illal-mawaddata fil-qurbā, wa may yaqtarif ḥasanatan nazid lahū fīhā ḥusnā(n), innallāha gafūrun syakūr(un).
ओ (उपहार) अल्लाह द्वारा अपन सेवक के खुश करय लेल घोषित कयल गेल अछि जे विश्वास करैत छथि आ नीक काज करैत छथि | (मुहम्मद) कहू, "हम अपन आह्वानक बदला मे अहाँ सँ पारिवारिक स्नेह छोड़ि किछु नहि माँगैत छी |" आ जे नीक काज करत, ओकरा हम सभ भलाई जोड़ि देब। सचमुच अल्लाह परम क्षमाशील, परम आभारी छथि।
اِنْ تُقْرِضُوا اللّٰهَ قَرْضًا حَسَنًا يُّضٰعِفْهُ لَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْۗ وَاللّٰهُ شَكُوْرٌ حَلِيْمٌۙ
in tuqriḍullāha qarḍan ḥasanay yuḍā‘ifhu lakum wa yagfir lakum, wallāhu syakūrun ḥalīm(un).
जँ अहाँ अल्लाह केँ नीक उधार देब तँ निश्चित रूप सँ ओ अहाँक लेल गुणा-भाग (बदली) करताह आ अहाँ केँ माफ करताह। आ अल्लाह परम कृपालु, परम दयालु छथि।