وَمَآ اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُّوْحِيْٓ اِلَيْهِمْ فَسْـَٔلُوْٓا اَهْلَ الذِّكْرِ اِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُوْنَۙ
wa mā arsalnā min qablika illā rijālan nūḥī ilaihim fas'alū ahlaż-żikri in kuntum lā ta‘lamūn(a).
आ हम अहाँ सभक सोझाँ (मुहम्मद) नहि पठेलहुँ, बल्कि एहन लोक सभ केँ पठेलहुँ, जिनका हम सभ वही देलहुँ; तेँ जकरा ज्ञान छैक ओकरा सँ पूछू जँ अहाँ नहि जनैत छी,
وَمَآ اَرْسَلْنَا قَبْلَكَ اِلَّا رِجَالًا نُّوْحِيْٓ اِلَيْهِمْ فَسْـَٔلُوْٓا اَهْلَ الذِّكْرِ اِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُوْنَ
wa mā arsalnā qablaka illā rijālan nūḥī ilaihim fas'alū ahlaż-żikri in kuntum lā ta‘lamūn(a).
आ हम अहाँ (मुहम्मद) सँ पहिने (प्रेरित) नहि पठेलहुँ, बल्कि किछु एहन आदमी केँ पठेलहुँ, जिनका हम हुनका वहाई देलहुँ, तेँ ककरो सँ पूछू जिनका ज्ञान हो, जँ अहाँ नहि जनैत छी।