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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Hukum umum atau sipil Perceraian Khulu' (tebusan talak) Menzalimi istri

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कुल आयत : 4
229
Q.S अल-बकराह (2:229)

اَلطَّلَاقُ مَرَّتٰنِ ۖ فَاِمْسَاكٌۢ بِمَعْرُوْفٍ اَوْ تَسْرِيْحٌۢ بِاِحْسَانٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ اَنْ تَأْخُذُوْا مِمَّآ اٰتَيْتُمُوْهُنَّ شَيْـًٔا اِلَّآ اَنْ يَّخَافَآ اَلَّا يُقِيْمَا حُدُوْدَ اللّٰهِ ۗ فَاِنْ خِفْتُمْ اَلَّا يُقِيْمَا حُدُوْدَ اللّٰهِ ۙ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيْمَا افْتَدَتْ بِهٖ ۗ تِلْكَ حُدُوْدُ اللّٰهِ فَلَا تَعْتَدُوْهَا ۚوَمَنْ يَّتَعَدَّ حُدُوْدَ اللّٰهِ فَاُولٰۤىِٕكَ هُمُ الظّٰلِمُوْنَ

aṭ-ṭalāqu marratān(i), fa imsākum bima‘rūfin au tasrīḥum bi'iḥsān(in), wa lā yaḥillu lakum an ta'khużū mimmā ātaitumūhunna syai'an illā ay yakhāfā allā yuqīmā ḥudūdullāh(i), fa in khiftum allā yuqīmā ḥudūdullāh(i) falā junāḥa ‘alaihimā fīmaftadat bih(ī), tilka ḥudūdullāhi falā ta‘tadūhā, wa may yata‘adda ḥudūdullāhi fa'ulā'ika humuẓ-ẓālimūn(a).

तलाक (जकर संदर्भ देल जा सकैत अछि) दू बेर अछि। (तकर बाद पति क' सकैत छथि) दयापूर्वक रोकि सकैत छथि, वा दयापूर्वक छोड़ि सकैत छथि । अहाँक लेल ई जायज नहि अछि जे अहाँ हुनका सभ केँ देल गेल कोनो वस्तु केँ वापस लेब, जाबत धरि दुनू (पति-पत्नी) केँ डर नहि हो जे ओ अल्लाह केर सीमा केँ पूरा नहि क' सकैत छथि। यदि अहाँ (संरक्षक) के डर अछि जे ओ अल्लाह के सीमा के पूरा नै क सकैत छथि त हुनका दुनु में स कोनो पर कोनो पाप नै अछि जे कीमत (जे (पत्नी द्वारा) देबय पड़त जे ओ अपना के छुटकारा पाबि सकय। ई सब अल्लाह के सीमा छै, ताहि लेल एकर उल्लंघन नै करू। जे अल्लाह के सीमा के उल्लंघन करैत अछि, ओ गलत अछि।


231
Q.S अल-बकराह (2:231)

وَاِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاۤءَ فَبَلَغْنَ اَجَلَهُنَّ فَاَمْسِكُوْهُنَّ بِمَعْرُوْفٍ اَوْ سَرِّحُوْهُنَّ بِمَعْرُوْفٍۗ وَلَا تُمْسِكُوْهُنَّ ضِرَارًا لِّتَعْتَدُوْا ۚ وَمَنْ يَّفْعَلْ ذٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهٗ ۗ وَلَا تَتَّخِذُوْٓا اٰيٰتِ اللّٰهِ هُزُوًا وَّاذْكُرُوْا نِعْمَتَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ وَمَآ اَنْزَلَ عَلَيْكُمْ مِّنَ الْكِتٰبِ وَالْحِكْمَةِ يَعِظُكُمْ بِهٖ ۗوَاتَّقُوا اللّٰهَ وَاعْلَمُوْٓا اَنَّ اللّٰهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيْمٌ ࣖ

wa iżā ṭallaqtumun-nisā'a fabalagna ajalahunna fa'amsikūhunna bima‘rūfin au sarriḥūhunna bima‘rūf(in), wa lā tumsikūhunna ḍirāral lita‘tadū, wa may yaf‘al żālika faqad ẓalama nafasah(ū), wa lā tattakhiżū āyātillāhi huzuwaw ważkurū ni‘matallāhi ‘alaikum wa mā anzala ‘alaikum minal-kitābi wal-ḥikmati ya‘iẓukum bih(ī), wattaqullāha wa‘lamū annallāha bikulli syai'in ‘alīm(un).

आ जँ अहाँ (अपन) पत्नी सभकेँ तलाक दऽ दैत छी तँ हुनकर प्रार्थनाक (अंत) धरि, तखन हुनका सभकेँ नीक तरीकासँ रोकू, वा नीक तरीकासँ (ओहो) तलाक दियौक। आ ओकरा सभ पर अत्याचार करबाक दुष्ट इरादा सँ नहि रोकू। जे ई काज करैत अछि ओ अपना पर अन्याय केलक अछि। आ अल्लाह के आयत के उपहास के वस्तु के रूप में प्रयोग नै करू। अल्लाह केरऽ तोरा पर की एहसान केरऽ याद रखऽ, आरू अल्लाह केरऽ जे कुछ अल्लाह तोरा पर उतारलऽ छै, यानी कि किताब (अल-कुरान) आरू बुद्धि (सुन्नत), तोरा सिनी क॑ सिखाबै लेली । आ अल्लाह स डरू आ जानू जे अल्लाह सब किछु के सर्वज्ञ छथि।


19
Q.S अन-निसा (4:19)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا يَحِلُّ لَكُمْ اَنْ تَرِثُوا النِّسَاۤءَ كَرْهًا ۗ وَلَا تَعْضُلُوْهُنَّ لِتَذْهَبُوْا بِبَعْضِ مَآ اٰتَيْتُمُوْهُنَّ اِلَّآ اَنْ يَّأْتِيْنَ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ ۚ وَعَاشِرُوْهُنَّ بِالْمَعْرُوْفِ ۚ فَاِنْ كَرِهْتُمُوْهُنَّ فَعَسٰٓى اَنْ تَكْرَهُوْا شَيْـًٔا وَّيَجْعَلَ اللّٰهُ فِيْهِ خَيْرًا كَثِيْرًا

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā yaḥillu lakum an tariṡun-nisā'a karhā(n), wa lā ta‘ḍulūhunna litażhabū biba‘ḍi mā ātaitumūhunna illā ay ya'tīna bifāḥisyatim mubayyinah(tin), wa ‘āsyirūhunna bil-ma‘rūf(i), fa in karihtumūhunna fa ‘asā an takrahū syai'aw wa yaj‘alallāhu fīhi khairan kaṡīrā(n).

हे आस्तिक लोकनि! अहाँक लेल ई जायज नहि अछि जे अहाँ महिला केँ जबरदस्ती विरासत मे पाबि ली आ ओकरा परेशानी नहि दियौक, कारण ओ अहाँक देल गेल किछु हिस्सा वापस लेबय चाहैत अछि, जाबत धरि ओ सही मायने मे कोनो घृणित काज नहि करत। आ हुनका सभक संग उचित ढंग सँ संगति करू। जँ अहाँकेँ ओ सभ नीक नहि लगैत अछि तँ (तखन धैर्य राखू) कारण ई भ' सकैत अछि जे अहाँकेँ कोनो चीज नीक नहि लागय, भले अल्लाह ओकरा बहुत नीक बना देने होथि।


6
Q.S एट-तलक (65:6)

اَسْكِنُوْهُنَّ مِنْ حَيْثُ سَكَنْتُمْ مِّنْ وُّجْدِكُمْ وَلَا تُضَاۤرُّوْهُنَّ لِتُضَيِّقُوْا عَلَيْهِنَّۗ وَاِنْ كُنَّ اُولٰتِ حَمْلٍ فَاَنْفِقُوْا عَلَيْهِنَّ حَتّٰى يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّۚ فَاِنْ اَرْضَعْنَ لَكُمْ فَاٰتُوْهُنَّ اُجُوْرَهُنَّۚ وَأْتَمِرُوْا بَيْنَكُمْ بِمَعْرُوْفٍۚ وَاِنْ تَعَاسَرْتُمْ فَسَتُرْضِعُ لَهٗٓ اُخْرٰىۗ

askinūhunna min ḥaiṡu sakantum miw wujdikum wa lā tuḍārrūhunna lituḍayyiqū ‘alaihinn(a), wa in kunna ulāti ḥamlin fa anfiqū ‘alaihinna ḥattā yaḍa‘na ḥamlahunn(a), fa in arḍa‘na lakum fa ātūhunna ujūrahunn(a), wa'tamirū bainakum bima‘rūf(in), wa in ta‘āsartum fasaturḍi‘u lahū ukhrā.

अपन क्षमता के अनुसार हुनका (पत्नी) के जतय रहैत छी ओतय राखू आ हुनका (हृदय) के संकुचित करब कठिन नहि करू। आ जँ ओ (तलाकशुदा पत्नी) गर्भवती छथि, तखन हुनका सभ केँ जा धरि जन्म नहि देत ता धरि अपन गुजारा दिअ, तखन जँ ओ सभ अहाँक (बच्चा) केँ स्तनपान कराबैत छथि तखन हुनका सभ केँ इनाम दिअ; आ अहाँ सभक बीच (सब किछु) नीक जकाँ विचार-विमर्श करू; आ यदि अहां कें दिक्कत कें सामना करएय पड़एयत छै, तखन ओकरा लेल दोसर महिला (बच्चा) कें स्तनपान करा सकएय छै.