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इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - नैतिकता और शिष्टाचार नैतिकता गंदी बातें अहंकारी और अभिमानी अहंकारी व्यक्ति का उत्तर

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कुल श्लोक : 5
25
Q.S एट-तौबाह (9:25)

لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللّٰهُ فِيْ مَوَاطِنَ كَثِيْرَةٍۙ وَّيَوْمَ حُنَيْنٍۙ اِذْ اَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنْكُمْ شَيْـًٔا وَّضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْاَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُمْ مُّدْبِرِيْنَۚ

laqad naṣarakumullāhu fī mawāṭina kaṡīrah(tin), wa yauma ḥunain(in), iż a‘jabatkum kaṡratukum falam tugni ‘ankum syai'aw wa ḍāqat ‘alaikumul-arḍu bimā raḥubat ṡumma wallaitum mudbirīn(a).

निश्चय ही अल्लाह ने तुम (मुसलमानों) को कई युद्धक्षेत्रों में सहायता दी, और (याद करो) हुनैन के युद्ध को, जब तुम्हारी बड़ी संख्या ने तुम्हें घमंडी बना दिया, लेकिन वह (संख्या) तुम्हारे लिए बिल्कुल भी उपयोगी नहीं हुई, और धरती, जो बहुत विस्तृत थी, तुम्हारे लिए तंग हो गई, फिर तुम पीठ फेरकर भाग खड़े हुए।


81
Q.S अल-क़सस (28:81)

فَخَسَفْنَا بِهٖ وَبِدَارِهِ الْاَرْضَ ۗفَمَا كَانَ لَهٗ مِنْ فِئَةٍ يَّنْصُرُوْنَهٗ مِنْ دُوْنِ اللّٰهِ ۖوَمَا كَانَ مِنَ الْمُنْتَصِرِيْنَ

fakhasafnā bihī wa bidārihil-arḍ(a), famā kāna lahū min fi'atiy yanṣurūnahū min dūnillāh(i), wa mā kāna minal-muntaṣirīn(a).

तो हमने उसे (क़ारून) और उसके घर को ज़मीन में धँसा दिया। तो उसके लिए कोई जमात न थी जो अल्लाह के सिवा उसकी मदद करे, और न वह ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर सका।


18
Q.S लुक़्मान (31:18)

وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِى الْاَرْضِ مَرَحًاۗ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُوْرٍۚ

wa lā tuṣa‘‘ir khaddaka lin-nāsi wa lā tamsyi fil-arḍi maraḥā(n), innallāha lā yuḥibbu kulla mukhtālin fakhūr(in).

और इंसानों से मुँह न फेर (घमंड में) और धरती पर अकड़कर न चल। बेशक, अल्लाह को न घमंडी पसंद हैं और न अपनी तारीफ़ करने वाले।


34
Q.S अल-Qiyamah (75:34)

اَوْلٰى لَكَ فَاَوْلٰىۙ

aulā laka fa'aulā.

हाय तुम पर! तो हाय!


35
Q.S अल-Qiyamah (75:35)

ثُمَّ اَوْلٰى لَكَ فَاَوْلٰىۗ

Ṡumma aulā laka fa'aulā.

फिर से, हाय तुम पर (इंसान)! तो हाय!