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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Akhlak Akhlak Mulia Berbuat baik Berbakti kepada orang tua Hubungan orang kafir dengan orang tuanya yang muslim

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कुल आयत : 6
8
Q.S अल-'अंकबूत के ह (29:8)

وَوَصَّيْنَا الْاِنْسَانَ بِوَالِدَيْهِ حُسْنًا ۗوَاِنْ جَاهَدٰكَ لِتُشْرِكَ بِيْ مَا لَيْسَ لَكَ بِهٖ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۗاِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَاُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ

wa waṣṣainal-insāna biwālidaihi ḥusnā(n), wa in jāhadāka litusyrika bī mā laisa laka bihī ‘ilmun falā tuṭi‘humā, ilayya marji‘ukum fa'unabbi'ukum bimā kuntum ta‘malūn(a).

आ हमनी के इंसान के अपना माई-बाबूजी के भलाई (करल) अनिवार्य बना देले बानी जा। आ अगर ऊ लोग रउरा के मजबूरी में हमरा के कवनो अइसन चीज से जोड़त बा जवना के रउरा कवनो जानकारी नइखे त ओह लोग के बात मत मानीं. खाली हमरा लगे तोहार वापसी बा, आ हम तोहरा के बताइब कि तू जवन कइले बाड़ू।


15
Q.S लुकमान के ह (31:15)

وَاِنْ جَاهَدٰكَ عَلٰٓى اَنْ تُشْرِكَ بِيْ مَا لَيْسَ لَكَ بِهٖ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا وَصَاحِبْهُمَا فِى الدُّنْيَا مَعْرُوْفًا ۖوَّاتَّبِعْ سَبِيْلَ مَنْ اَنَابَ اِلَيَّۚ ثُمَّ اِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَاُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ

wa in jāhadāka ‘alā an tusyrika bī mā laisa laka bihī ‘ilmun falā tuṭi‘humā wa ṣāḥibhumā fid-dun-yā ma‘rūfā(n), wattabi‘ sabīla man anāba ilayya(a), ṡumma ilayya marji‘ukum fa unabbi'ukum bimā kuntum ta‘malūn(a).

आ अगर दुनु जने रउरा के हमरा से साझीदारन के ओह चीज से जोड़े खातिर मजबूर करसु जवना के रउरा कवनो जानकारी नइखे त ओह लोग के बात मत मानीं, आ दुनिया में ओह लोग के बढ़िया से जोड़ दीं आ हमरा लगे लवट आवे वाला लोग के राह पर चलीं. तब हमरा लगे तोहार वापसी बा, तब हम तोहरा के बताइब कि तू का कइले बाड़ू।


22
Q.S अल-मुजादिला के ह (58:22)

لَا تَجِدُ قَوْمًا يُّؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ وَالْيَوْمِ الْاٰخِرِ يُوَاۤدُّوْنَ مَنْ حَاۤدَّ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ وَلَوْ كَانُوْٓا اٰبَاۤءَهُمْ اَوْ اَبْنَاۤءَهُمْ اَوْ اِخْوَانَهُمْ اَوْ عَشِيْرَتَهُمْۗ اُولٰۤىِٕكَ كَتَبَ فِيْ قُلُوْبِهِمُ الْاِيْمَانَ وَاَيَّدَهُمْ بِرُوْحٍ مِّنْهُ ۗوَيُدْخِلُهُمْ جَنّٰتٍ تَجْرِيْ مِنْ تَحْتِهَا الْاَنْهٰرُ خٰلِدِيْنَ فِيْهَاۗ رَضِيَ اللّٰهُ عَنْهُمْ وَرَضُوْا عَنْهُۗ اُولٰۤىِٕكَ حِزْبُ اللّٰهِ ۗ اَلَآ اِنَّ حِزْبَ اللّٰهِ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ ࣖ

lā tajidu qaumay yu'minūna billāhi wal-yaumil ākhiri yuwāddūna man ḥāddallāha wa rasūlahū wa lau kānū ābā'ahum au abnā'ahum au ikhwānahum au ‘asyīratahum, ulā'ika kataba fī qulūbihimul-īmāna wa ayyadahum birūḥim minh(u), wa yudkhiluhum jannātin tajrī min taḥtihal-anhāru khālidīna fīhā, raḍiyallāhu ‘anhum wa raḍū ‘anh(u), ulā'ika ḥizbullāh(i), alā inna ḥizballāhi humul-mufliḥūn(a).

रउरा (मुहम्मद) के अल्लाह आ परख में विश्वास करे वाला लोग ना मिली कि अल्लाह आ उनकर रसूलुल्लाह के विरोध करे वाला लोग से स्नेह होखे, भले ऊ लोग उनकर बाप, बेटा, भाई भा परिवार होखे. इहे उ लोग हवें जिनका दिल में अल्लाह इमान रोपले बाड़े अवुरी अल्लाह उनुका से मिलेवाला मदद से मजबूत कईले बाड़े। तब उ ओह लोग के बगइचा में डाल दिहलन जवना के नीचे नदी बहत रहीहें, जवना में ऊ लोग हमेशा खातिर रही. अल्लाह इनका से खुश बाड़े अवुरी उ लोग उनुका (दया के भरमार) से संतुष्ट बाड़े। उ लोग भगवान के समूह हवे। याद रखीं, वाकई अल्लाह के समूह भाग्यशाली बा।


1
Q.S अल-मुमतहानाह के ह (60:1)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَّخِذُوْا عَدُوِّيْ وَعَدُوَّكُمْ اَوْلِيَاۤءَ تُلْقُوْنَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوْا بِمَا جَاۤءَكُمْ مِّنَ الْحَقِّۚ يُخْرِجُوْنَ الرَّسُوْلَ وَاِيَّاكُمْ اَنْ تُؤْمِنُوْا بِاللّٰهِ رَبِّكُمْۗ اِنْ كُنْتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَادًا فِيْ سَبِيْلِيْ وَابْتِغَاۤءَ مَرْضَاتِيْ تُسِرُّوْنَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَاَنَا۠ اَعْلَمُ بِمَآ اَخْفَيْتُمْ وَمَآ اَعْلَنْتُمْۗ وَمَنْ يَّفْعَلْهُ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاۤءَ السَّبِيْلِ

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tattakhiżū ‘aduwwī wa ‘aduwwakum auliyā'a tulqūna ilaihim bil-mawaddati wa qad kafarū bimā jā'akum minal-ḥaqq(i), yukhrijūnar-rasūla wa iyyākum an tu'minū billāhi rabbikum, in kuntum kharajtum jihādan fī sabīlī wabtigā'a marḍātī tusirrūna ilaihim bil-mawaddah(ti), wa ana a‘lamu bimā akhfaitum wa mā a‘lantum, wa may yaf‘alhu minkum faqad ḍalla sawā'as-sabīl(i).

हे विश्वास करे वाला लोग! हमरा दुश्मनन आ अपना दुश्मनन के वफादार दोस्त मत बनाईं जेहसे कि रउरा ओह लोग के (मुहम्मद के खबर) पहुँचा दीं, करुणा से; भले ही उ लोग ओह सच्चाई के नकार देले होखस जवन तोहरा तक पहुंचावल गईल रहे। उ लोग रसूलुल्लाह अवुरी आपके खुद के बाहर क देले, काहेंकी आप अपना रब अल्लाह प विश्वास कईले रहनी। अगर रउआ सचमुच हमरा रास्ता खातिर प्रयास करे खातिर निकलत बानी आ हमार सुख खोजत बानी (अइसन मत करीं)। रउरा ओह लोग के (मुहम्मद के खबर) गुप्त रूप से, करुणा से बतावत बानी आ हम बेहतर जानत बानी कि रउरा का छिपावत बानी आ का उजागर करत बानी. आ तोहनी में से जे अइसन करी त साँचहू ऊ सीधा राह से भटक गइल बा.


8
Q.S अल-मुमतहानाह के ह (60:8)

لَا يَنْهٰىكُمُ اللّٰهُ عَنِ الَّذِيْنَ لَمْ يُقَاتِلُوْكُمْ فِى الدِّيْنِ وَلَمْ يُخْرِجُوْكُمْ مِّنْ دِيَارِكُمْ اَنْ تَبَرُّوْهُمْ وَتُقْسِطُوْٓا اِلَيْهِمْۗ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِيْنَ

lā yanhākumullāhu ‘anil-lażīna lam yuqātilūkum fid-dīni wa lam yukhrijūkum min diyārikum an tabarrūhum wa tuqsiṭū ilaihim, innallāha yuḥibbul-muqsiṭīn(a).

अल्लाह रउरा के भलाई करे से मना नइखन करत आ ओह लोग का साथे निष्पक्ष होखे के मना करत बाड़न जे रउरा से धर्म के मामिला में ना लड़त बा आ रउरा के रउरा नइहर से ना निकालत बा. सचमुच अल्लाह उ लोग से प्यार करेले, जवन कि न्यायसंगत काम करेले।


13
Q.S अल-मुमतहानाह के ह (60:13)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللّٰهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَىِٕسُوْا مِنَ الْاٰخِرَةِ كَمَا يَىِٕسَ الْكُفَّارُ مِنْ اَصْحٰبِ الْقُبُوْرِ ࣖ

yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tatawallau qauman gaḍiballāhu ‘alaihim qad ya'isū minal-ākhirati kamā ya'isal-kuffāru min aṣḥābil-qubūr(i).

हे विश्वास करे वाला लोग! जेकरा से अल्लाह नाराज बाड़े ओकरा के आपन सहायक मत बनाईं, वाकई में उ लोग परलोक से निराश हो गईल बाड़े ठीक ओसही जईसे कब्र में रहेवाला काफिर भी निराश हो गईल बाड़े।