لَوْ خَرَجُوْا فِيْكُمْ مَّا زَادُوْكُمْ اِلَّا خَبَالًا وَّلَاَوْضَعُوْا خِلٰلَكُمْ يَبْغُوْنَكُمُ الْفِتْنَةَۚ وَفِيْكُمْ سَمّٰعُوْنَ لَهُمْۗ وَاللّٰهُ عَلِيْمٌۢ بِالظّٰلِمِيْنَ
wa lau kharajū fīkum mā zādūkum illā khabālaw wa la'auḍa‘ū khilālakum yabgūnakumul-fitnah(ta), wa fīkum sammā‘ūna lahum, wallāhu ‘alīmum biẓ-ẓālimīn(a).
जँ (ओ सभ अहाँक संग जायत) तँ ओ सभ अहाँक (शक्ति) अवश्य नहि बढ़ौताह, बल्कि ओ सभ मात्र अराजकता उत्पन्न करत, आ ओ सभ निश्चित रूप सँ अहाँक पंक्तिक अंतराल मे आगू दौड़ैत अराजकता उत्पन्न करत (अहाँक पंक्ति मे); जखन कि अहाँ सब मे एहन लोक छथि जे हुनकर (शब्द) सुनब सचमुच नीक लगैत छथि | अल्लाह गलत करय वाला के जानय छथिन्ह.
هَمَّازٍ مَّشَّاۤءٍۢ بِنَمِيْمٍۙ
hammāzim masysyā'im binamīm(in).
आलोचना करब नीक लगैत अछि, जे तेजीसँ निंदा पसारैत अछि,