فَبِمَا رَحْمَةٍ مِّنَ اللّٰهِ لِنْتَ لَهُمْ ۚ وَلَوْ كُنْتَ فَظًّا غَلِيْظَ الْقَلْبِ لَانْفَضُّوْا مِنْ حَوْلِكَ ۖ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِى الْاَمْرِۚ فَاِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ ۗ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُتَوَكِّلِيْنَ
fabimā raḥmatim minallāhi linta lahum, wa lau kunta faẓẓan galīẓal-qalbi lanfaḍḍū min ḥaulik(a), fa‘fu ‘anhum wastagfir lahum wa syāwirhum fil-amr(i), fa iżā ‘azamta fa tawakkal ‘alallāh(i), innallāha yuḥibbul-mutawakkilīn(a).
त अल्लाह के कृपा के बदौलत रउआ (मुहम्मद) ओह लोग के प्रति कोमल रहनी। अगर रउरा कड़ा काम करीं आ दिल रफ बा त ऊ लोग रउरा आसपास के लोग से जरूर दूर हो जाई. एह से ओह लोग के माफ करीं आ ओह लोग खातिर माफी माँगीं आ एह मामिला में ओह लोग से सलाह लीं. फेर जब तू आपन मन बना लेब त फेर अल्लाह प भरोसा करीं। सचमुच अल्लाह उ लोग से प्यार करेले, जवन कि उनुका प भरोसा करेले।
خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَاَعْرِضْ عَنِ الْجٰهِلِيْنَ
khużil-‘afwa wa'mur bil-‘urfi wa a‘riḍ ‘anil-jāhilīn(a).
माफ करे वाला रहीं आ लोग से कह दीं कि जवन बुद्धिमानी बा ऊ करऽ, आ बेवकूफ लोग पर ध्यान मत दीं.
وَلَا يَأْتَلِ اُولُو الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَالسَّعَةِ اَنْ يُّؤْتُوْٓا اُولِى الْقُرْبٰى وَالْمَسٰكِيْنَ وَالْمُهٰجِرِيْنَ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۖوَلْيَعْفُوْا وَلْيَصْفَحُوْاۗ اَلَا تُحِبُّوْنَ اَنْ يَّغْفِرَ اللّٰهُ لَكُمْ ۗوَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْمٌ
wa lā ya'tali ulul-faḍli minkum was-sa‘ati ay yu'tū ulil-qurbā wal-masākīna wal-muhājirīna fī sabīlillāh(i), wal ya‘fū wal yaṣfaḥū, alā tuḥibbūna ay yagfirallāhu lakum, wallāhu gafūrur raḥīm(un).
आ रउरा सभे में जेकरा लगे फायदा आ मौका बा ऊ कसम मत खाए कि ऊ लोग (अपना) रिश्तेदारन, गरीबन आ अल्लाह के राह में प्रवास करे वाला लोग के (मदद ना) दी आ माफ करे आ सहिष्णु होखे. का रउवा इ ना पसंद बा कि अल्लाह रउवा के माफ कर देले? आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु हवें।