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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - 6 Rukun Iman Para Nabi dan Rasul (rukun iman no.4) Para sahabat Nabi Shallallahu Alaihi Wasallam. Perintah untuk mengikuti para sahabat Nabi

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कुल आयत : 4
115
Q.S अन-निसा (4:115)

وَمَنْ يُّشَاقِقِ الرَّسُوْلَ مِنْۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُ الْهُدٰى وَيَتَّبِعْ غَيْرَ سَبِيْلِ الْمُؤْمِنِيْنَ نُوَلِّهٖ مَا تَوَلّٰى وَنُصْلِهٖ جَهَنَّمَۗ وَسَاۤءَتْ مَصِيْرًا ࣖ

wa may yusyāqiqir-rasūla mim ba‘di mā tabayyana lahul-hudā wa yattabi‘ gaira sabīlil-mu'minīna nuwallihī mā tawallā wa nuṣlihī jahannam(a), wa sā'at maṣīrā(n).

आरू जे भी रसूलुल्लाह (मुहम्मद) केरऽ विरोध करै छै, जेकरा बाद ओकरा सच्चाई साफ होय गेलऽ छै, आरू वू रास्ता पर चलै छै जे मुसलमानऽ के रास्ता नै छै, ओकरा हम्में ओकरा द्वारा करलऽ गेलऽ गलती में छोड़ी दै छियै आरू ओकरा नरक में सौंप देबै, आरू वू सबसें खराब जगह छै जेकरा पर वापस आबै के छै।


8
Q.S अल-हशर (59:8)

لِلْفُقَرَاۤءِ الْمُهٰجِرِيْنَ الَّذِيْنَ اُخْرِجُوْا مِنْ دِيَارِهِمْ وَاَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُوْنَ فَضْلًا مِّنَ اللّٰهِ وَرِضْوَانًا وَّيَنْصُرُوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗ ۗ اُولٰۤىِٕكَ هُمُ الصّٰدِقُوْنَۚ

lil-fuqarā'il-muhājirīnal-lażīna ukhrijū min diyārihim wa amwālihim yabtagūna faḍlam minallāhi wa riḍwānaw wa yanṣurūnallāha wa rasūlah(ū), ulā'ika humuṣ-ṣādiqūn(a).

(लूट सेहो) ओहि गरीब लोकक लेल अछि जे पलायन कएने छल जे अपन सासुर सँ निकालि देल गेल छल आ अल्लाह सँ कृपा आ (हुनकर) प्रसन्नताक लेल आ (उनकर) रसूलुल्लाहक (धर्मक) मदद करबाक चक्कर मे अपन सम्पत्ति छोड़ि गेल छल | ओ सभ सच्चा लोक छथि।


9
Q.S अल-हशर (59:9)

وَالَّذِيْنَ تَبَوَّءُو الدَّارَ وَالْاِيْمَانَ مِنْ قَبْلِهِمْ يُحِبُّوْنَ مَنْ هَاجَرَ اِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُوْنَ فِيْ صُدُوْرِهِمْ حَاجَةً مِّمَّآ اُوْتُوْا وَيُؤْثِرُوْنَ عَلٰٓى اَنْفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ ۗوَمَنْ يُّوْقَ شُحَّ نَفْسِهٖ فَاُولٰۤىِٕكَ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَۚ

wal-lażīna tabawwa'ud-dāra wal-īmāna min qablihim yuḥibbūna man hājara ilaihim wa lā yajidūna fī ṣudūrihim ḥājatam mimmā ūtū wa yu'ṡirūna ‘alā anfusihim wa lau kāna bihim khaṣāṣah(tun), wa may yūqa syuḥḥa nafsihī fa ulā'ika humul-mufliḥūn(a).

आ जे लोक (अंसार) मदीना शहर पर कब्जा कएने छल आ ओकरा (मुहाजिरीन) के (आगमन) स पहिने विश्वास केने छल, ओ सब ओहि लोक स प्रेम करैत छल जे अपन जगह पर प्रवास केलक। आ जे किछु ओकरा सभ केँ (मुहाजिरीन) देल गेल छलैक ताहि लेल ओ सभ अपन हृदय मे इच्छा नहि रखैत छलाह; आरू वू (मुहाजिरीन) क॑ प्राथमिकता दै छै, खुद स॑ ऊपर, भले ही ओकरा भी जरूरत छै । आ जे कंजूस स अपना के बचा लैत अछि, तखन ओ सब भाग्यशाली लोक छथि।


10
Q.S अल-हशर (59:10)

وَالَّذِيْنَ جَاۤءُوْ مِنْۢ بَعْدِهِمْ يَقُوْلُوْنَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِاِخْوَانِنَا الَّذِيْنَ سَبَقُوْنَا بِالْاِيْمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِيْ قُلُوْبِنَا غِلًّا لِّلَّذِيْنَ اٰمَنُوْا رَبَّنَآ اِنَّكَ رَءُوْفٌ رَّحِيْمٌ ࣖ

wal-lażīna jā'ū mim ba‘dihim yaqūlūna rabbanagfir lanā wa li'ikhwāninal-lażīna sabaqūnā bil-īmāni wa lā taj‘al fī qulūbinā gillal lil-lażīna āmanū rabbanā innaka ra'ūfur raḥīm(un).

आ हुनका लोकनिक बाद जे लोकनि (मुहाजिरीन आ अंसार) आयल छलाह, ओ सभ प्रार्थना केलनि, "हे हमर प्रभु, हमरा सभ केँ आ हमरा सभ सँ पहिने विश्वास करय बला भाइ सभ केँ क्षमा करू, आ विश्वास करयवला सभक प्रति हमरा सभक हृदय मे दुर्भावना नहि पैदा करू। हे हमर प्रभु, वास्तव मे, अहाँ परम दयालु, परम दयालु छी।"