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Q.S अली इमरान (3:134)
الَّذِيْنَ يُنْفِقُوْنَ فِى السَّرَّۤاءِ وَالضَّرَّۤاءِ وَالْكٰظِمِيْنَ الْغَيْظَ وَالْعَافِيْنَ عَنِ النَّاسِۗ وَاللّٰهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِيْنَۚ
al-lażīna yunfiqūna fis-sarrā'i waḍ-ḍarrā'i wal-kāẓimīnal gaiẓa wal-‘āfīna ‘anin-nās(i), wallāhu yuḥibbul-muḥsinīn(a).
(अर्थात) जे दान करैत छथि, सहज आ कष्ट दुनू मे, आ जे अपन क्रोध केँ रोकैत छथि आ लोक केँ क्षमा करैत छथि | आ अल्लाह भलाई करय वाला स प्रेम करैत छथि,
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Q.S अल-मु'मिनुन (23:96)
اِدْفَعْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ السَّيِّئَةَۗ نَحْنُ اَعْلَمُ بِمَا يَصِفُوْنَ
idfa‘ bil-latī hiya aḥsanus-sayyi'ah(ta), naḥnu a‘lamu bimā yaṣifūn(a).
हुनकर खराब काज के नीक (तरफा) स नकारू, हम सब बेसी नीक स जनैत छी जे ओ सब की (अल्लाह) के जिम्मेदार ठहरबैत छथि।