اِنْ يَّنْصُرْكُمُ اللّٰهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۚ وَاِنْ يَّخْذُلْكُمْ فَمَنْ ذَا الَّذِيْ يَنْصُرُكُمْ مِّنْۢ بَعْدِهٖ ۗ وَعَلَى اللّٰهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُوْنَ
iy yanṣurkumullāhu falā gāliba lakum, wa iy yakhżulkum faman żal-lażī yanṣurukum mim ba‘dih(ī), wa ‘alallāhi falyatawakkalil-mu'minūn(a).
यदि अल्लाह तुम्हारी मदद करता है, तो कोई तुम्हें हरा नहीं सकता, लेकिन यदि अल्लाह तुम्हें (मदद न देकर) छोड़ दे, तो उसके बाद कौन तुम्हारी मदद करेगा? इसलिए मोमिनों को केवल अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए।
فَاِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ حَسْبِيَ اللّٰهُ لَآ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ ۗ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيْمِ ࣖ
fa in tawallau faqul ḥasbiyallāhu lā ilāha illā huw(a), ‘alaihi tawakkaltu wa huwa rabbul-‘arsyil-‘aẓīm(i).
तो यदि वे (ईमान से) मुंह फेर लें, तो कहो (मुहम्मद), 'मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है; उनके सिवा कोई ईश्वर नहीं है। मैंने उसी पर भरोसा किया, और वही अर्श (सिंहासन) का मालिक है जो महान है।'
وَقَالَ مُوْسٰى يٰقَوْمِ اِنْ كُنْتُمْ اٰمَنْتُمْ بِاللّٰهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُوْٓا اِنْ كُنْتُمْ مُّسْلِمِيْنَ
wa qāla mūsā yā qaumi in kuntum āmantum billāhi fa ‘alaihi tawakkalū in kuntum muslimīn(a).
और मूसा ने कहा, 'हे मेरी कौम! यदि तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो, तो उस पर भरोसा करो, यदि तुम वास्तव में मुस्लिम (आत्मसमर्पण करने वाले) हो।'
وَقَالَ يٰبَنِيَّ لَا تَدْخُلُوْا مِنْۢ بَابٍ وَّاحِدٍ وَّادْخُلُوْا مِنْ اَبْوَابٍ مُّتَفَرِّقَةٍۗ وَمَآ اُغْنِيْ عَنْكُمْ مِّنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۗ اِنِ الْحُكْمُ اِلَّا لِلّٰهِ ۗعَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُوْنَ
wa qāla yā baniyya lā tadkhulū mim bābiw wāḥidiw wadkhulū min abwābim mutafarriqah(tin), wa mā ugnī ‘ankum minallāhi min syai'(in), inil-ḥukmu illā lillāh(i), ‘alaihi tawakkaltu wa ‘alaihi falyatawakkalil-mutawakkilūn(a).
और उन्होंने (याक़ूब ने) कहा, 'ऐ मेरे बेटों! एक ही दरवाज़े से दाख़िल न होना, बल्कि अलग-अलग दरवाज़ों से दाख़िल होना; फिर भी मैं तुम्हें अल्लाह के (क़दर) से कुछ भी बचा नहीं सकता। हुक़्म सिर्फ़ अल्लाह का है। उसी पर मैं भरोसा करता हूँ और उसी पर भरोसा करने वालों को भरोसा करना चाहिए।'
۞ رَبِّ قَدْ اٰتَيْتَنِيْ مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِيْ مِنْ تَأْوِيْلِ الْاَحَادِيْثِۚ فَاطِرَ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضِۗ اَنْتَ وَلِيّٖ فِى الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِۚ تَوَفَّنِيْ مُسْلِمًا وَّاَلْحِقْنِيْ بِالصّٰلِحِيْنَ
rabbi qad ātaitanī minal-mulki wa ‘allamtanī min ta'wīlil-aḥādīṡ(i), fāṭiras-samāwāti wal-arḍ(i), anta waliyyī fid-dun-yā wal-ākhirah(ti), tawaffanī muslimaw wa alḥiqnī biṣ-ṣāliḥīn(a).
ऐ मेरे रब! तूने मुझे कुछ हुकूमत दी और मुझे सपनों की ताबीर का कुछ हिस्सा सिखाया। (ऐ रब) आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला, तू मेरा वली है दुनिया और आख़िरत में, मुझे मुसलमान की हालत में वफ़ात दे और मुझे नेक लोगों के साथ शामिल कर।'
وَلَا تُطِعِ الْكٰفِرِيْنَ وَالْمُنٰفِقِيْنَ وَدَعْ اَذٰىهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ ۗوَكَفٰى بِاللّٰهِ وَكِيْلًا
wa lā tuṭi‘il-kāfirīna wal-munāfiqīna wa da‘ ażāhum wa tawakkal ‘alallāh(i), wa kafā billāhi wakīlā(n).
और काफिरों और मुनाफिकों की बात न मान और उनकी सताने की परवाह न कर, और अल्लाह पर भरोसा कर। और अल्लाह वकील के लिए काफी है।
قَدْ كَانَتْ لَكُمْ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِيْٓ اِبْرٰهِيْمَ وَالَّذِيْنَ مَعَهٗۚ اِذْ قَالُوْا لِقَوْمِهِمْ اِنَّا بُرَءٰۤؤُا مِنْكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّٰهِ ۖ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَاۤءُ اَبَدًا حَتّٰى تُؤْمِنُوْا بِاللّٰهِ وَحْدَهٗٓ اِلَّا قَوْلَ اِبْرٰهِيْمَ لِاَبِيْهِ لَاَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَآ اَمْلِكُ لَكَ مِنَ اللّٰهِ مِنْ شَيْءٍۗ رَبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَاِلَيْكَ اَنَبْنَا وَاِلَيْكَ الْمَصِيْرُ
qad kānat lakum uswatun ḥasanatun fī ibrāhīma wal-lażīna ma‘ah(ū), iż qālū liqaumihim innā bura'ā'u minkum wa mimmā ta‘budūna min dūnillāh(i), kafarnā bikum wa badā bainanā wa bainakumul-‘adāwatu wal-bagḍā'u abadan ḥattā tu'minū billāhi waḥdahū illā qaula ibrāhīma li'abīhi la'astagfiranna laka wa mā amliku laka minallāhi min syai'(in), rabbanā ‘alaika tawakkalnā wa ilaika anabnā wa ilaikal-maṣīr(u).
निश्चित रूप से, इब्राहीम और उनके साथ वालों में तुम्हारे लिए अच्छी मिसाल है, जब उन्होंने अपनी कौम से कहा, 'हम तुमसे और तुम्हारे उन माबूदों से बरी हैं जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो, हम तुम्हारा (कुफ्र) इंकार करते हैं और हमारे और तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफरत हमेशा के लिए ज़ाहिर हो गई, जब तक कि तुम केवल अल्लाह पर ईमान न लाओ,' सिवाय इब्राहीम के अपने बाप से कहने के कि, 'मैं निश्चित रूप से तुम्हारे लिए माफी माँगूँगा, लेकिन मैं तुम्हारे लिए अल्लाह की सजा को कुछ भी नहीं रोक सकता।' (इब्राहीम ने कहा), 'ऐ हमारे रब, हम केवल तुझ पर भरोसा करते हैं और केवल तुझ की ओर रुजू करते हैं और केवल तुझ की ओर लौटना है,