قَالَ رَبِّ اجْعَلْ لِّيْٓ اٰيَةً ۗ قَالَ اٰيَتُكَ اَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلٰثَةَ اَيَّامٍ اِلَّا رَمْزًا ۗ وَاذْكُرْ رَّبَّكَ كَثِيْرًا وَّسَبِّحْ بِالْعَشِيِّ وَالْاِبْكَارِ ࣖ
qāla rabbij‘al lī āyah(tan), qāla āyatuka allā tukalliman-nāsa ṡalāṡata ayyāmin illā ramzā(n), ważkur rabbaka kaṡīraw wa sabbiḥ bil-‘asyiyyi wal-ibkār(i).
ओ (जकारिया) कहलनि, “हे हमर प्रभु, हमरा एकटा निशानी दिअ।” अल्लाह कहलनि, "अहाँ सभक लेल एकटा निशानी ई अछि जे अहाँ सभ तीन दिन धरि मनुक्ख सँ बात नहि करब, सिवाय निशानीक संग। आ अपन प्रभुक (नाम) बहुत उल्लेख करू, आ साँझ आ भोर मे हुनकर महिमा (उनकर स्तुति) करू।"
قَالَ رَبِّ اجْعَلْ لِّيْٓ اٰيَةً ۗقَالَ اٰيَتُكَ اَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلٰثَ لَيَالٍ سَوِيًّا
qāla rabbij‘al lī āyah(tan), qāla āyatuka allā tukalliman-nāsa ṡalāṡa layālin sawiyyā(n).
ओ (जकारिया) कहलनि, “हे हमर प्रभु, हमरा एकटा निशानी दिअ।” (अल्लाह) कहलनि, "अहाँक निशानी ई अछि जे अहाँ स्वस्थ रहितो तीन राति मनुक्ख सँ गप्प नहि क' सकैत छी।"
فَخَرَجَ عَلٰى قَوْمِهٖ مِنَ الْمِحْرَابِ فَاَوْحٰٓى اِلَيْهِمْ اَنْ سَبِّحُوْا بُكْرَةً وَّعَشِيًّا
fa kharaja ‘alā qaumihī minal-miḥrābi fa auḥā ilaihim an sabbiḥū bukrataw wa ‘asyiyyā(n).
तेँ ओ मिहराब सँ बाहर अपन लोक लग आबि गेलाह, तखन हुनका सभ केँ इशारा कयलनि; भोरे-साँझ अपन महिमामंडन करू।