۞ وَاِنْ جَنَحُوْا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللّٰهِ ۗاِنَّهٗ هُوَ السَّمِيْعُ الْعَلِيْمُ
wa in janaḥū lis-salmi fajnaḥ lahā wa tawakkal ‘alallāh(i), innahū huwas-samī‘ul-‘alīm(u).
लेकिन यदि वे (काफ़िर) शांति की ओर झुकें, तो तुम भी उसे स्वीकार करो और अल्लाह पर भरोसा रखो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।
اِلَّا الَّذِيْنَ عَاهَدْتُّمْ مِّنَ الْمُشْرِكِيْنَ ثُمَّ لَمْ يَنْقُصُوْكُمْ شَيْـًٔا وَّلَمْ يُظَاهِرُوْا عَلَيْكُمْ اَحَدًا فَاَتِمُّوْٓا اِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ اِلٰى مُدَّتِهِمْۗ اِنَّ اللّٰهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِيْنَ
illal-lażīna ‘āhattum minal-musyrikīna ṡumma lam yanquṣūkum syai'aw wa lam yuẓāhirū ‘alaikum aḥadan fa atimmū ilaihim ‘ahdahum ilā muddatihim, innallāha yuḥibbul-muttaqīn(a).
सिवाय उन मुश्रिकों के जिनके साथ तुमने संधि की थी और उन्होंने (संधि के) किसी भी हिस्से को कम नहीं किया और न ही तुम्हारे खिलाफ़ किसी की सहायता की, तो उनके साथ उनकी संधि को उसके निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह तक़वा रखने वालों से प्रेम करता है।