مَنْ كَفَرَ بِاللّٰهِ مِنْۢ بَعْدِ اِيْمَانِهٖٓ اِلَّا مَنْ اُكْرِهَ وَقَلْبُهٗ مُطْمَىِٕنٌّۢ بِالْاِيْمَانِ وَلٰكِنْ مَّنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِّنَ اللّٰهِ ۗوَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيْمٌ
man kafara billāhi mim ba‘di īmānihī illā man ukriha wa qalbuhū muṭma'innum bil-īmāni wa lākim man syaraḥa bil-kufri ṣadran fa ‘alaihim gaḍabum minallāh(i), wa lahum ‘ażābun aẓīm(un).
जे कियो विश्वास केलाक बाद अल्लाह के काफर करत (ओकरा अल्लाह के कोप भ जायत अछि), सिवाय ओहि व्यक्ति के जे विश्वास करय में ओकर दिल शांत रहला के बादो काफर करय लेल मजबूर भ जायत अछि (ओ पाप नै करैत अछि), मुदा जे व्यक्ति काफर करय लेल अपन छाती खोलत, तखन अल्लाह के कोप ओकरा पर पड़ि जायत आ ओकरा सब के बहुत पैघ सजा भेटत।
وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِيْنَ يَدْعُوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيْدُوْنَ وَجْهَهٗ وَلَا تَعْدُ عَيْنٰكَ عَنْهُمْۚ تُرِيْدُ زِيْنَةَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۚ وَلَا تُطِعْ مَنْ اَغْفَلْنَا قَلْبَهٗ عَنْ ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوٰىهُ وَكَانَ اَمْرُهٗ فُرُطًا
waṣbir nafsaka ma‘al-lażīna yad‘ūna rabbahum bil-gadāti wal-‘asyiyyi yurīdūna wajhahū wa lā ta‘du ‘aināka ‘anhum, turīdu zīnatal-ḥayātid-dun-yā, wa lā tuṭi‘ man agfalnā qalbahū ‘an żikrinā wattaba‘a hawāhu wa kāna amruhū furuṭā(n).
आ अहाँ (मुहम्मद) ओहि लोकनिक प्रति धैर्य राखू जे अपन प्रभुक प्रसन्नताक आशा मे भोर-साँझ अपन प्रभुक पुकार करैत छथि; आ ओकरा सभ सँ नजरि नहि घुमाउ (कारण) ओ सभ सांसारिक जीवनक गहना सभक आशा करैत छथि; आ जिनकर हृदय के हम सब हमरा सब के याद करय में उपेक्षा केने छी, आ हुनकर इच्छा के पालन नै करू आ जिनकर परिस्थिति सीमा पार क गेल अछि।