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Q.S अल-मैदाह (5:87)
يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تُحَرِّمُوْا طَيِّبٰتِ مَآ اَحَلَّ اللّٰهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوْا ۗاِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِيْنَ
yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tuḥarrimū ṭayyibāti mā aḥallallāhu lakum wa lā ta‘tadū, innallāha lā yuḥibbul-mu‘tadīn(a).
हे विश्वास करनिहार! जे नीक काज अल्लाह अहाँ सभक लेल हलाल केने छथि ओकरा मना नहि करू आ सीमा सँ बेसी नहि करू। सचमुच अल्लाह के सीमा के उल्लंघन करय वाला लोक पसंद नै छैन्ह।
88
Q.S अल-मैदाह (5:88)
وَكُلُوْا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللّٰهُ حَلٰلًا طَيِّبًا ۖوَّاتَّقُوا اللّٰهَ الَّذِيْٓ اَنْتُمْ بِهٖ مُؤْمِنُوْنَ
wa kulū mimmā razaqakumullāhu ḥalālan ṭayyibā(n), wattaqullāhal-lażī antum bihī mu'minūn(a).
आ जे किछु अल्लाह अहाँ सभ केँ हलाल आ नीक रोजी-रोटीक रूप मे देने छथि ताहि मे सँ खाउ आ हुनका मे अल्लाह सँ डरू।