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Q.S अन-निसा (4:65)
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُوْنَ حَتّٰى يُحَكِّمُوْكَ فِيْمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوْا فِيْٓ اَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوْا تَسْلِيْمًا
falā wa rabbika lā yu'minūna ḥattā yuḥakkimūka fīmā syajara bainahum ṡumma lā yajidū fī anfusihim ḥarajam mimmā qaḍaita wa yusallimū taslīmā(n).
अस्तु, अहाँक प्रभुक कसम, ओ सभ ता धरि विश्वास नहि करताह जा धरि ओ अहाँ (मुहम्मद) केँ ओहि मामला मे न्यायाधीश नहि बना देताह जाहि मे ओ विवाद क' रहल छथि, (जाहि सँ) तखन हुनका लोकनिक हृदय मे अहाँक निर्णय पर कोनो आपत्ति नहि होयत, आ ओ सभ एकरा पूर्णतः स्वीकार क' लेताह।