وَلَا تَطْرُدِ الَّذِيْنَ يَدْعُوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيْدُوْنَ وَجْهَهٗ ۗمَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِّنْ شَيْءٍ وَّمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِمْ مِّنْ شَيْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُوْنَ مِنَ الظّٰلِمِيْنَ
wa lā taṭrudil-lażīna yad‘ūna rabbahum bil-gadāti wal-‘asyiyyi yurīdūna wajhah(ū), mā ‘alaika min ḥisābihim min syai'iw wa mā min ḥisābika ‘alaihim min syai'in fa taṭrudahum fa takūna minaẓ-ẓālimīn(a).
भोर-साँझ अपन प्रभु के पुकारनिहार के नहि भगाउ, हुनकर प्रसन्नता के आशा करैत छथि | अहाँ हुनका लोकनिक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि लैत छथि आ ओ सभ अहाँक काजक कनिको जिम्मेदारी नहि उठबैत छथि, जाहि कारणेँ अहाँ हुनका सभ केँ बाहर निकालबाक (अधिकार) छी, जाहि सँ अहाँ अपराधी मे सँ एक छी।
وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِيْنَ يَدْعُوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَدٰوةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيْدُوْنَ وَجْهَهٗ وَلَا تَعْدُ عَيْنٰكَ عَنْهُمْۚ تُرِيْدُ زِيْنَةَ الْحَيٰوةِ الدُّنْيَاۚ وَلَا تُطِعْ مَنْ اَغْفَلْنَا قَلْبَهٗ عَنْ ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوٰىهُ وَكَانَ اَمْرُهٗ فُرُطًا
waṣbir nafsaka ma‘al-lażīna yad‘ūna rabbahum bil-gadāti wal-‘asyiyyi yurīdūna wajhahū wa lā ta‘du ‘aināka ‘anhum, turīdu zīnatal-ḥayātid-dun-yā, wa lā tuṭi‘ man agfalnā qalbahū ‘an żikrinā wattaba‘a hawāhu wa kāna amruhū furuṭā(n).
आ अहाँ (मुहम्मद) ओहि लोकनिक प्रति धैर्य राखू जे अपन प्रभुक प्रसन्नताक आशा मे भोर-साँझ अपन प्रभुक पुकार करैत छथि; आ ओकरा सभ सँ नजरि नहि घुमाउ (कारण) ओ सभ सांसारिक जीवनक गहना सभक आशा करैत छथि; आ जिनकर हृदय के हम सब हमरा सब के याद करय में उपेक्षा केने छी, आ हुनकर इच्छा के पालन नै करू आ जिनकर परिस्थिति सीमा पार क गेल अछि।