قُلْ اَمَرَ رَبِّيْ بِالْقِسْطِۗ وَاَقِيْمُوْا وُجُوْهَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَّادْعُوْهُ مُخْلِصِيْنَ لَهُ الدِّيْنَ ەۗ كَمَا بَدَاَكُمْ تَعُوْدُوْنَۗ
qul amara rabbī bil-qisṭ(i), wa aqīmū wujūhakum ‘inda kulli masjidiw wad‘ūhu mukhliṣīna lahud-dīn(a), kamā bada'akum ta‘ūdūn(a).
कहो, 'मेरे रब ने मुझे न्याय करने का हुक्म दिया है। हर नमाज़ में (अल्लाह की ओर) अपने चेहरों को स्थिर करो, और केवल उसी की इबादत करो, अपनी नीयत को ख़ालिस करके। जैसा उसने तुम्हें पहले बनाया था, उसी तरह तुम उसकी ओर लौटाए जाओगे।'
فِيْ بُيُوْتٍ اَذِنَ اللّٰهُ اَنْ تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيْهَا اسْمُهٗۙ يُسَبِّحُ لَهٗ فِيْهَا بِالْغُدُوِّ وَالْاٰصَالِ ۙ
fī buyūtin ażinallāhu an turfa‘a wa yużkara fīhasmuh(ū), yusabbiḥu lahū fīhā bil-guduwwi wal-āṣāl(i).
(वह नूर) उन घरों में है जिन्हें अल्लाह ने आदर करने का हुक्म दिया है, और जिनमें उसका नाम लिया जाता है; उनमें सुबह और शाम उसकी तसबीह की जाती है,