وَلَىِٕنْ سَاَلْتَهُمْ لَيَقُوْلُنَّ اِنَّمَا كُنَّا نَخُوْضُ وَنَلْعَبُۗ قُلْ اَبِاللّٰهِ وَاٰيٰتِهٖ وَرَسُوْلِهٖ كُنْتُمْ تَسْتَهْزِءُوْنَ
wa la'in sa'altahum layaqūlunna innamā kunnā nakhūḍū wa nal‘ab(u), qul abillāhi wa āyātihī wa rasūlihī kuntum tastahzi'ūn(a).
आ जँ अहाँ हुनका सभ सँ पूछब त' ओ सभ अवश्य जवाब देताह जे "असल मे हम सभ त' बस मजाक आ खेलाइत छलहुँ." कहब, "अहाँ सब सदिखन अल्लाह, आ हुनकर आयत आ हुनकर रसूलुल्लाह के मजाक किएक करैत छी?"
لَا تَعْتَذِرُوْا قَدْ كَفَرْتُمْ بَعْدَ اِيْمَانِكُمْ ۗ اِنْ نَّعْفُ عَنْ طَاۤىِٕفَةٍ مِّنْكُمْ نُعَذِّبْ طَاۤىِٕفَةً ۢ بِاَنَّهُمْ كَانُوْا مُجْرِمِيْنَ ࣖ
lā ta‘tażirū qad kafartum ba‘da īmānikum, in na‘fu ‘an ṭā'ifatim minkum nu‘ażżib ṭā'ifatam bi'annahum kānū mujrimīn(a).
अहाँ केँ माफी माँगबाक आवश्यकता नहि अछि, कारण अहाँ विश्वास केलाक बाद अविश्वास कएने छी। जँ हम अहाँ सभ मे सँ किछु गोटे केँ क्षमा करब (किएक तँ ओ सभ पश्चाताप कएने छथि) तँ हम सभ दोसर समूह केँ अवश्य सजा देब किएक तँ ओ सभ सचमुच पापी छथि ।