۞ اَلَمْ تَرَ اِلَى الَّذِيْنَ نَافَقُوْا يَقُوْلُوْنَ لِاِخْوَانِهِمُ الَّذِيْنَ كَفَرُوْا مِنْ اَهْلِ الْكِتٰبِ لَىِٕنْ اُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيْعُ فِيْكُمْ اَحَدًا اَبَدًاۙ وَّاِنْ قُوْتِلْتُمْ لَنَنْصُرَنَّكُمْۗ وَاللّٰهُ يَشْهَدُ اِنَّهُمْ لَكٰذِبُوْنَ
alam tara ilal-lażīna nāfaqū yaqūlūna li'ikhwānihimul-lażīna kafarū min ahlil-kitābi la'in ukhrijtum lanakhrujanna ma‘akum wa lā nuṭī‘u fīkum aḥadan abadā(n), wa in qūtiltum lananṣurannakum, wallāhu yasyhadu innahum lakāżibūn(a).
की अहाँ ओहि पाखंडी सभ केँ नहि देखलहुँ जे किताबक लोक सभक बीच अपन काफिर भाइ सभ केँ कहैत छथि, “जँ अहाँ सभ केँ निष्कासित कयल जायत तँ हम सभ अहाँ सभक संग अवश्य बाहर निकलब, आ हम सभ अहाँ सभक लेल ककरो बात कहियो नहि मानब, आ जँ अहाँ सभ सँ लड़ल जाय तँ हम सभ अहाँक मददि अवश्य करब।” आ अल्लाह गवाही दैत छथि जे ओ सभ झूठा छथि।
لَىِٕنْ اُخْرِجُوْا لَا يَخْرُجُوْنَ مَعَهُمْۚ وَلَىِٕنْ قُوْتِلُوْا لَا يَنْصُرُوْنَهُمْۚ وَلَىِٕنْ نَّصَرُوْهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْاَدْبَارَۙ ثُمَّ لَا يُنْصَرُوْنَ
la'in ukhrijū lā yakhrujūna ma‘ahum, wa la'in qūtilū lā yanṣurūnahum, wa la'in naṣarūhum layuwallunnal-adbār(a), ṡumma lā yunṣarūn(a).
सत्ते, जँ ओकरा सभ केँ भगा देल जायत तँ पाखंडी सभ ओकरा सभक संग नहि निकलत, आ जँ ओकरा सभ सँ लड़ल जायत। ओ सभ (नहि) ओकर मदद करत; आ जँ ओकर मददि करत तखनो ओ सभ निश्चित रूपसँ मुँह घुमा कऽ पाछू दौड़त, तखन ओकरा सभकेँ मददि नहि भेटतैक।
لَاَنْتُمْ اَشَدُّ رَهْبَةً فِيْ صُدُوْرِهِمْ مِّنَ اللّٰهِ ۗذٰلِكَ بِاَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُوْنَ
la'antum asyaddu rahbatan fī ṣudūrihim minallāh(i), żālika bi'annahum qaumul lā yafqahūn(a).
सचमुच, हुनका सब के दिल में अहाँ (मुसलमान) अल्लाह स बेसी डरल छी। से एहि लेल जे ओ सभ एहन लोक छथि जे नहि बुझैत छथि ।