اِنْ يَّمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِّثْلُهٗ ۗوَتِلْكَ الْاَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِۚ وَلِيَعْلَمَ اللّٰهُ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا وَيَتَّخِذَ مِنْكُمْ شُهَدَاۤءَ ۗوَاللّٰهُ لَا يُحِبُّ الظّٰلِمِيْنَۙ
iy yamsaskum qarḥun faqad massal-qauma qarḥum miṡluh(ū), wa tilkal-ayyāmu nudāwiluhā binan-nās(i), wa liya‘lamallāhul-lażīna āmanū wa yattakhiża minkum syuhadā'(u), wallāhu lā yuḥibbuẓ-ẓālimīn(a).
जँ अहाँकेँ (उहुदक युद्धमे) घाव भेल तँ हुनका सभकेँ (बदरक युद्धमे) सेहो एहने घाव भेटलनि। आरू ई समय (सफलता आरू विनाश के) हम्में लोगऽ के बीच बारी-बारी सें रहै छियै (ताकि ओकरा सिखालऽ जाय), आरू ताकि अल्लाह मुसलमानऽ क॑ (काफिरऽ स॑) अलग करी सक॑ आरू तोरा म॑ स॑ कुछ क॑ (खस॑) शहीद करी सक॑ । आ अल्लाह गलत काज करय वाला स प्रेम नहि करैत छथि।
وَلَقَدْ صَدَقَكُمُ اللّٰهُ وَعْدَهٗٓ اِذْ تَحُسُّوْنَهُمْ بِاِذْنِهٖ ۚ حَتّٰىٓ اِذَا فَشِلْتُمْ وَتَنَازَعْتُمْ فِى الْاَمْرِ وَعَصَيْتُمْ مِّنْۢ بَعْدِ مَآ اَرٰىكُمْ مَّا تُحِبُّوْنَ ۗ مِنْكُمْ مَّنْ يُّرِيْدُ الدُّنْيَا وَمِنْكُمْ مَّنْ يُّرِيْدُ الْاٰخِرَةَ ۚ ثُمَّ صَرَفَكُمْ عَنْهُمْ لِيَبْتَلِيَكُمْ ۚ وَلَقَدْ عَفَا عَنْكُمْ ۗ وَاللّٰهُ ذُوْ فَضْلٍ عَلَى الْمُؤْمِنِيْنَ
wa laqad ṣadaqakumullāhu wa‘dahū iż taḥussūnahum bi'iżnih(ī), ḥattā iżā fasyiltum wa tanāza‘tum fil-amri wa ‘aṣaitum mim ba‘di mā arākum mā tuḥibbūn(a), minkum may yurīdud-dun-yā wa minkum may yurīdul-ākhirah(ta), ṡumma ṣarafakum ‘anhum liyabtaliyakum, wa laqad ‘afā ‘ankum, wallāhu żū faḍlin ‘alal-mu'minīn(a).
आरू सचमुच अल्लाह तोरा सिनी स॑ अपनऽ वादा पूरा करी लेल॑ छै, जब॑ तोहें ओकरऽ अनुमति स॑ ओकरा सब क॑ मारलकै जब॑ तलक कि तोहें कमजोर नै छेलियै आरू मामला म॑ विवाद नै करी रहलऽ छेलियै आरू अल्लाह केरऽ आज्ञा के अनदेखी करी क॑ अल्लाह न॑ तोरा जे अच्छा लगै छेलै ओकरा देखाबै के बाद । अहाँ सभ मे संसारक इच्छा करयवला लोक छथि आ अहाँ सभ मे परलोकक इच्छा रखनिहार (संगहि) छथि | तखन अल्लाह अहाँ केँ परखबाक लेल हुनका सभ सँ मुँह मोड़ि देलनि, मुदा ओ अहाँ केँ सचमुच माफ क' देलनि। आ अल्लाह के पास मुसलमान के वरदान (देल गेल) छै।
۞ اِذْ تُصْعِدُوْنَ وَلَا تَلْوٗنَ عَلٰٓى اَحَدٍ وَّالرَّسُوْلُ يَدْعُوْكُمْ فِيْٓ اُخْرٰىكُمْ فَاَثَابَكُمْ غَمًّا ۢبِغَمٍّ لِّكَيْلَا تَحْزَنُوْا عَلٰى مَا فَاتَكُمْ وَلَا مَآ اَصَابَكُمْ ۗ وَاللّٰهُ خَبِيْرٌ ۢبِمَا تَعْمَلُوْنَ
iż tuṣ‘idūna wa lā talwūna ‘alā aḥadiw war-rasūlu yad‘ūkum fī ukhrākum fa aṡābakum gammam bigammil likailā taḥzanū ‘alā mā fātakum wa lā mā aṣābakum, wallāhu khabīrum bimā taṣna‘ūn(a).
(याद राखू) जखन अहाँ दौड़लहुँ आ ककरो दिस नहि तकलहुँ, जखन कि रसूलुल्लाह (मुहम्मद) जे अहाँक दोसर (मित्र) मे छलाह, अहाँ केँ (भागल समूह) बजौलनि, तखन अल्लाह अहाँ केँ दुखक बाद दुख देलनि, जाहि सँ अहाँ (आब) दुखी नहि होयब जे अहाँ सँ जे किछु बचि गेल आ जे अहाँ पर भेल ताहि लेल। आ अल्लाह अहाँ जे काज करैत छी ताहि सँ अवगत छथि।
ثُمَّ اَنْزَلَ عَلَيْكُمْ مِّنْۢ بَعْدِ الْغَمِّ اَمَنَةً نُّعَاسًا يَّغْشٰى طَۤاىِٕفَةً مِّنْكُمْ ۙ وَطَۤاىِٕفَةٌ قَدْ اَهَمَّتْهُمْ اَنْفُسُهُمْ يَظُنُّوْنَ بِاللّٰهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ ۗ يَقُوْلُوْنَ هَلْ لَّنَا مِنَ الْاَمْرِ مِنْ شَيْءٍ ۗ قُلْ اِنَّ الْاَمْرَ كُلَّهٗ لِلّٰهِ ۗ يُخْفُوْنَ فِيْٓ اَنْفُسِهِمْ مَّا لَا يُبْدُوْنَ لَكَ ۗ يَقُوْلُوْنَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْاَمْرِ شَيْءٌ مَّا قُتِلْنَا هٰهُنَا ۗ قُلْ لَّوْ كُنْتُمْ فِيْ بُيُوْتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذِيْنَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ اِلٰى مَضَاجِعِهِمْ ۚ وَلِيَبْتَلِيَ اللّٰهُ مَا فِيْ صُدُوْرِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِيْ قُلُوْبِكُمْ ۗ وَاللّٰهُ عَلِيْمٌ ۢبِذَاتِ الصُّدُوْرِ
Ṡumma anzala ‘alaikum mim ba‘dil-gammi amanatan nu‘āsay yagsyā ṭā'ifatam minkum, wa ṭā'ifatun qad ahammathum anfusuhum yaẓunnūna billāhi gairal-ḥaqqi ẓanal-jāhiliyyah(ti), yaqūlūna hal lanā minal-amri min syai'(in), qul innal-amra kullahū lillāh(i), yukhfūna fī anfusihim mā lā yubdūna lak(a), yaqūlūna lau kāna lanā minal-amri syai'um mā qutilnā hāhunā, qul lau kuntum fī buyūtikum labarazal-lażīna kutiba ‘alaihimul-qatlu ilā maḍāji‘ihim, wa liyabtaliyallāhu mā fī ṣudūrikum wa liyumaḥḥiṣa mā fī qulūbikum, wallāhu ‘alīmum biżātiṣ-ṣudūr(i).
तखन अहाँ उदासी सँ डूबल भेलाक बाद ओ अहाँ केँ (रूप मे) नींदक भाव नीचाँ पठौलनि जे अहाँक एकटा समूह केँ झाँपि देने छल, जखन कि दोसर समूह अपना लेल चिंतित छल; हुनका सब के लगै छै कि अल्लाह के बारे में जे बात सही नै छै, वू एगो अज्ञानी विचार के तरह छै। ओ सभ कहलकनि, “की हम सभ एहि मे किछु क’ सकैत छी?” (मुहम्मद) कहू, "वास्तव में सब बात अल्लाह के हाथ में अछि।" जे बात अहाँकेँ नहि प्रकट करैत छथि से ओ सभ अपन हृदयमे नुका लैत छथि । ओ सभ कहलक, "एहि मामला मे जँ किछु क' सकैत छलहुँ त' एतय हमरा सभ केँ मारल (पराजित) नहि होइत." (मुहम्मद) कहू, "अहाँ अपन घर मे रहितो, जिनकर किस्मत मे मारल गेल छनि, ओ निश्चित रूप सँ ओहि ठाम (ओहि ठाम) बाहर आबि जेताह जतय हुनका मारल गेल छलनि।" अल्लाह (ई करैत छथि) जे अहाँक छाती मे जे अछि ओकरा परखय लेल आ जे अहाँक दिल मे अछि ओकरा साफ करय लेल। आ अल्लाह दिल के सर्वज्ञ छैथ।
اِنَّ الَّذِيْنَ تَوَلَّوْا مِنْكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعٰنِۙ اِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطٰنُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُوْا ۚ وَلَقَدْ عَفَا اللّٰهُ عَنْهُمْ ۗ اِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ حَلِيْمٌ ࣖ
innal-lażīna tawallau minkum yaumal-taqal-jam‘ān(i), innamastazallahumusy-syaiṭānu biba‘ḍi mā kasabū, wa laqad ‘afallāhu ‘anhum, innallāha gafūrun ḥalīm(un).
सचमुच, जे लोकनि अहाँ सभक बीच जखन दुनू सेनाक बीच मुलाकात (युद्ध) भेल छल तखन हुनका लोकनि केँ वास्तव मे शैतान द्वारा पटरी सँ उतारल गेल छलनि, किछु गलती (पाप) केर कारण जे ओ सभ (पूर्व मे) केने छलाह, मुदा अल्लाह हुनका सभ केँ सचमुच माफ क' देने छथि। सचमुच अल्लाह परम क्षमाशील, परम दयालु छथि।
اَوَلَمَّآ اَصَابَتْكُمْ مُّصِيْبَةٌ قَدْ اَصَبْتُمْ مِّثْلَيْهَاۙ قُلْتُمْ اَنّٰى هٰذَا ۗ قُلْ هُوَ مِنْ عِنْدِ اَنْفُسِكُمْ ۗ اِنَّ اللّٰهَ عَلٰى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيْرٌ
awa lammā aṣābatkum muṣībatun qad aṣabtum miṡlaihā, qultum annā hāżā, qul huwa min ‘indi anfusikum, innallāha ‘alā kulli syai'in qadīr(un).
आ जखन कोनो विपत्ति (उहुद मे हार) अहाँ पर आबि जाइत अछि तखन अहाँ केँ आश्चर्य किएक होइत अछि, जखन कि अहाँ बदर मे अपन दुश्मन पर दू गुना बेसी विपत्ति पहुँचा देने छी? अहाँ कहैत छी, “ई (हार) कतय सँ आयल?” कहू, “ई अहाँ सभ सँ अछि।” सचमुच अल्लाह के सब चीज पर अधिकार छै।
وَمَآ اَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعٰنِ فَبِاِذْنِ اللّٰهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِيْنَۙ
wa mā aṣābakum yaumal-taqal-jam‘āni fa bi'iżnillāhi wa liya‘lamal-mu'minīn(a).
आ जखन दुनू सेना के भेंट भेल छल तखन अहाँ पर जे भेल से अल्लाह के अनुमति पर छल, आ अल्लाह ओहि लोक के परखय जे सच्चा मुसलमान छल।
اَلَّذِيْنَ اسْتَجَابُوْا لِلّٰهِ وَالرَّسُوْلِ مِنْۢ بَعْدِ مَآ اَصَابَهُمُ الْقَرْحُ ۖ لِلَّذِيْنَ اَحْسَنُوْا مِنْهُمْ وَاتَّقَوْا اَجْرٌ عَظِيْمٌۚ
al-lażīnastajābū lillāhi war-rasūli mim ba‘di mā aṣābahumul-qarḥ(u), lil-lażīna aḥsanū minhum wattaqau ajrun ‘aẓīm(un).
(अर्थात) जे घायल भेला के बाद (उहुद के लड़ाई में) अल्लाह आ रसूलुल्लाह के आज्ञा मानैत छथि | जे नीक काज करैत छथि आ हुनका मे पुण्यशील छथि हुनका बहुत पैघ फल भेटतनि।