اِنَّ الَّذِيْنَ تَوَفّٰىهُمُ الْمَلٰۤىِٕكَةُ ظَالِمِيْٓ اَنْفُسِهِمْ قَالُوْا فِيْمَ كُنْتُمْ ۗ قَالُوْا كُنَّا مُسْتَضْعَفِيْنَ فِى الْاَرْضِۗ قَالُوْٓا اَلَمْ تَكُنْ اَرْضُ اللّٰهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوْا فِيْهَا ۗ فَاُولٰۤىِٕكَ مَأْوٰىهُمْ جَهَنَّمُ ۗ وَسَاۤءَتْ مَصِيْرًاۙ
innal-lażīna tawaffāhumul-malā'ikatu ẓālimī anfusihim qālū fīma kuntum, qālū kunnā mustaḍ‘afīna fil-arḍ(i), qālū alam takun arḍullāhi wāsi‘atan fa tuhājirū fīhā, fa ulā'ika ma'wāhum jahannam(u), wa sā'at maṣīrā(n).
सचमुच, जिनकर जान स्वर्गदूत अपना पर अत्याचार के अवस्था में छीन लेलक, ओ सब (स्वर्गदूत) पुछलखिन, "अहाँ केहन छी?" ओ सभ उत्तर देलक, "हम सभ पृथ्वी (मक्का) पर उत्पीड़ित लोक छी।" ओ सभ (फरिश्ता सभ) पुछलनि, "की अल्लाहक धरती चौड़ा नहि अछि, जाहि सँ अहाँ सभ एहि पर प्रवास (इम्हर-उम्हर) क' सकब?" त ओ लोक नरक मे छथि, आ ओ (जहानम) घुरबाक लेल सबसँ खराब जगह अछि,
۞ وَمَنْ يُّهَاجِرْ فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ يَجِدْ فِى الْاَرْضِ مُرٰغَمًا كَثِيْرًا وَّسَعَةً ۗوَمَنْ يَّخْرُجْ مِنْۢ بَيْتِهٖ مُهَاجِرًا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُوْلِهٖ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ اَجْرُهٗ عَلَى اللّٰهِ ۗوَكَانَ اللّٰهُ غَفُوْرًا رَّحِيْمًا ࣖ
wa may yuhājir fī sabīlillāhi yajid fil-arḍi murāgaman kaṡīraw wa sa‘ah(tan), wa may yakhruj mim baitihī muhājiran ilallāhi wa rasūlihī ṡumma yudrik-hul-mautu faqad waqa‘a ajruhū ‘alallāh(i), wa kānallāhu gafūrar raḥīmā(n).
आ जे कियो अल्लाह के रास्ता में प्रवास करत, ओकरा एहि धरती पर प्रवास के लेल एकटा विस्तृत जगह आ बहुत रास (जीविका) जरूर भेटतैक। जे कियो अल्लाह आ हुनकर रसूलुल्लाह के लेल प्रवास करबाक इरादा स अपन घर स निकलैत अछि, तखन ओकरा पर मौत भ जाइत अछि (अपन मंजिल तक पहुंचबा स पहिने), तखन सचमुच ओकर इनाम अल्लाह के संग स्थापित भ गेल अछि। आ अल्लाह क्षमाशील, दयालु छथि।