فَاِنْ حَاۤجُّوْكَ فَقُلْ اَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلّٰهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِ ۗوَقُلْ لِّلَّذِيْنَ اُوْتُوا الْكِتٰبَ وَالْاُمِّيّٖنَ ءَاَسْلَمْتُمْ ۗ فَاِنْ اَسْلَمُوْا فَقَدِ اهْتَدَوْا ۚ وَاِنْ تَوَلَّوْا فَاِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلٰغُ ۗ وَاللّٰهُ بَصِيْرٌۢ بِالْعِبَادِ ࣖ
fa'in ḥājjūka fa qul aslamtu wajhiya lillāhi wa manittaba‘an(i), wa qul lil-lażīna ūtul-kitāba wal-ummiyyīna a'aslamtum, fa'in aslamū faqadihtadau, wa in tawallau fa'innamā ‘alaikal-balāg(u), wallāhu baṣīrum bil-‘ibād(i).
तखन जँ ओ सभ अहाँ (मुहम्मद) सँ बहस करत तँ कहब जे "हम अल्लाह केर अधीन छी आ (तहिना) जे हमर पाछाँ पड़ैत अछि।" आ जिनका किताब देल गेल अछि आ अनपढ़ लोक स कहब जे "की अहाँ इस्लाम स्वीकार क लेने छी?" अगर ओ इस्लाम स्वीकार क लैत छथि त एकर मतलब अछि जे हुनका मार्गदर्शन भेटल अछि, मुदा अगर ओ मुड़ि जाइत छथि त अहां के फर्ज सिर्फ एकरा पहुंचाबय के अछि. आ अल्लाह अपन सेवक के सर्वदर्शी छथि।