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Q.S अन-नहल (16:106)
مَنْ كَفَرَ بِاللّٰهِ مِنْۢ بَعْدِ اِيْمَانِهٖٓ اِلَّا مَنْ اُكْرِهَ وَقَلْبُهٗ مُطْمَىِٕنٌّۢ بِالْاِيْمَانِ وَلٰكِنْ مَّنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِّنَ اللّٰهِ ۗوَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيْمٌ
man kafara billāhi mim ba‘di īmānihī illā man ukriha wa qalbuhū muṭma'innum bil-īmāni wa lākim man syaraḥa bil-kufri ṣadran fa ‘alaihim gaḍabum minallāh(i), wa lahum ‘ażābun aẓīm(un).
जे कियो विश्वास केलाक बाद अल्लाह के काफर करत (ओकरा अल्लाह के कोप भ जायत अछि), सिवाय ओहि व्यक्ति के जे विश्वास करय में ओकर दिल शांत रहला के बादो काफर करय लेल मजबूर भ जायत अछि (ओ पाप नै करैत अछि), मुदा जे व्यक्ति काफर करय लेल अपन छाती खोलत, तखन अल्लाह के कोप ओकरा पर पड़ि जायत आ ओकरा सब के बहुत पैघ सजा भेटत।