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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - Ilmu Menyampaikan ilmu Yang hadir menyampaikan kepada yang tidak hadir

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कुल आयत : 4
122
Q.S अत-तवबाह के बा (9:122)

۞ وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُوْنَ لِيَنْفِرُوْا كَاۤفَّةًۗ فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَاۤىِٕفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوْا فِى الدِّيْنِ وَلِيُنْذِرُوْا قَوْمَهُمْ اِذَا رَجَعُوْٓا اِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُوْنَ ࣖ

wa mā kānal-mu'minūna liyanfirū kāffah(tan), falau lā nafara min kulli firqatim minhum ṭā'ifatul liyatafaqqahū fid-dīni wa liyunżirū qaumahum iżā raja‘ū ilaihim la‘allahum yaḥżarūn(a).

आ मुसलमानन के सभे (युद्ध के मैदान में) जाए के उचित नइखे। काहे ना ओह लोग के हर समूह में से कुछ लोग आपन धार्मिक ज्ञान के गहिराह करे आ लवटला पर अपना लोग के चेतावे खातिर जाला, जेहसे कि ऊ लोग अपना के बचा सके.


29
Q.S अल-अहकाफ के ह (46:29)

وَاِذْ صَرَفْنَآ اِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُوْنَ الْقُرْاٰنَۚ فَلَمَّا حَضَرُوْهُ قَالُوْٓا اَنْصِتُوْاۚ فَلَمَّا قُضِيَ وَلَّوْا اِلٰى قَوْمِهِمْ مُّنْذِرِيْنَ

wa iż ṣarafnā ilaika nafaram minal-jinni yastami‘ūnal-qur'ān(a), falammā ḥaḍarūhu qālū anṣitū, falammā quḍiya wallau ilā qaumihim munżirīn(a).

आ (याद राखीं) जब हम रउरा (मुहम्मद) के सोझा जिन्नन के एगो समूह पेश कइनी जवन कुरान के (पढ़ल) सुनत रहे, तब जब ऊ लोग (पाठ) में शामिल भइल त ऊ लोग कहल कि "चुप रहऽ (सुने खातिर)!" त जब इ खतम हो गईल त उ लोग अपना लोग के लगे वापस आ गईले (चेतावनी देवे खातिर)।


30
Q.S अल-अहकाफ के ह (46:30)

قَالُوْا يٰقَوْمَنَآ اِنَّا سَمِعْنَا كِتٰبًا اُنْزِلَ مِنْۢ بَعْدِ مُوْسٰى مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْدِيْٓ اِلَى الْحَقِّ وَاِلٰى طَرِيْقٍ مُّسْتَقِيْمٍ

qālū yā qaumanā innā sami‘nā kitāban unzila mim ba‘di mūsā muṣaddiqal limā baina yadaihi yahdī ilal-ḥaqqi wa ilā ṭarīqim mustaqīm(in).

उ लोग कहले, "हे हमनी के लोग! सचमुच हमनी के उ किताब (अल-कुरान) सुनले बानी जा जवन मूसा के बाद भेजल गईल रहे, जवन कि पहिले आईल (किताब) के पुष्टि करत रहे, जवन कि सच्चाई अवुरी सीधा रास्ता के ओर ले गईल रहे।"


31
Q.S अल-अहकाफ के ह (46:31)

يٰقَوْمَنَآ اَجِيْبُوْا دَاعِيَ اللّٰهِ وَاٰمِنُوْا بِهٖ يَغْفِرْ لَكُمْ مِّنْ ذُنُوْبِكُمْ وَيُجِرْكُمْ مِّنْ عَذَابٍ اَلِيْمٍ

yā qaumanā ajībū dā‘iyallāhi wa āminū bihī yagfir lakum min żunūbikum wa yujirkum min ‘ażābin alīm(in).

हे हमनी के लोग! अल्लाह के पुकार करे वाला व्यक्ति (मुहम्मद) के (पुकार) स्वीकार करीं। आ उनकरा पर विश्वास करीं, ऊ रउरा पाप के जरूर माफ कर दीहें आ रउरा के दर्दनाक सजा से मुक्त कर दीहें.