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इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)



विषय - प्रार्थना प्रार्थना का समय पांच बार प्रार्थना

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कुल श्लोक : 7
103
Q.S एक-निसा (4:103)

فَاِذَا قَضَيْتُمُ الصَّلٰوةَ فَاذْكُرُوا اللّٰهَ قِيَامًا وَّقُعُوْدًا وَّعَلٰى جُنُوْبِكُمْ ۚ فَاِذَا اطْمَأْنَنْتُمْ فَاَقِيْمُوا الصَّلٰوةَ ۚ اِنَّ الصَّلٰوةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِيْنَ كِتٰبًا مَّوْقُوْتًا

fa iżā qaḍaitumuṣ-ṣalāta fażkurullāha qiyāmaw wa qu‘ūdaw wa ‘alā junūbikum, fa iżaṭma'nantum fa aqīmuṣ-ṣalāh(ta), innaṣ-ṣalāta kānat ‘alal-mu'minīna kitābam mauqūtā(n).

जब तुम अपनी नमाज़ पूरी कर लो, तो खड़े होकर, बैठकर और लेटकर अल्लाह को याद करो। फिर, जब तुम सुरक्षित हो जाओ, तो नमाज़ को सामान्य रूप से पढ़ो। निश्चय ही, नमाज़ विश्वासियों पर समयबद्ध कर्तव्य है।


114
Q.S कनटोप (11:114)

وَاَقِمِ الصَّلٰوةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِّنَ الَّيْلِ ۗاِنَّ الْحَسَنٰتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّاٰتِۗ ذٰلِكَ ذِكْرٰى لِلذّٰكِرِيْنَ

wa aqimiṣ-ṣalāta ṭarafayin-nahāri wa zulafam minal-lail(i), innal-ḥasanāti yużhibnas-sayyi'āt(i), żālika żikrā liż-żākirīn(a).

और दिन के दोनों सिरों (सुबह और शाम) और रात के शुरुआती हिस्सों में नमाज़ कायम करो। नेक कार्य गलतियों को मिटा देते हैं। यह उन लोगों के लिए एक स्मरण है जो हमेशा (अल्लाह को) याद करते हैं।


78
Q.S अल-इसरा (17:78)

اَقِمِ الصَّلٰوةَ لِدُلُوْكِ الشَّمْسِ اِلٰى غَسَقِ الَّيْلِ وَقُرْاٰنَ الْفَجْرِۗ اِنَّ قُرْاٰنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُوْدًا

aqimiṣ-ṣalāta lidulūkisy-syamsi ilā gasaqil-laili wa qur'ānal-fajr(i), inna qur'ānal-fajri kāna masyhūdā(n).

सूरज ढलने से लेकर रात की गहराई तक नमाज़ कायम करो और सुब्ह की नमाज़ भी। निश्चित रूप से सुब्ह की नमाज़ (फरिश्तों द्वारा) देखी जाती है।


130
Q.S टा-हा (20:130)

فَاصْبِرْ عَلٰى مَا يَقُوْلُوْنَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوْعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوْبِهَا ۚوَمِنْ اٰنَاۤئِ الَّيْلِ فَسَبِّحْ وَاَطْرَافَ النَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضٰى

faṣbir ‘alā mā yaqūlūna wa sabbiḥ biḥamdi rabbika qabla ṭulū‘isy-syamsi wa qabla gurūbihā, wa min ānā'il-laili fa sabbiḥ wa aṭrāfan-nahāri la‘allaka tarḍā.

तो (ऐ मुहम्मद!) जो कुछ वे कहते हैं, उस पर सब्र कर, और अपने रब की तारीफ के साथ तस्बीह कर, सूरज निकलने से पहले और डूबने से पहले; और रात के कुछ हिस्सों में और दिन के किनारों पर, ताकि तू राज़ी हो।


58
Q.S एक-नूर (24:58)

يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لِيَسْتَأْذِنْكُمُ الَّذِيْنَ مَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ وَالَّذِيْنَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنْكُمْ ثَلٰثَ مَرّٰتٍۗ مِنْ قَبْلِ صَلٰوةِ الْفَجْرِ وَحِيْنَ تَضَعُوْنَ ثِيَابَكُمْ مِّنَ الظَّهِيْرَةِ وَمِنْۢ بَعْدِ صَلٰوةِ الْعِشَاۤءِۗ ثَلٰثُ عَوْرٰتٍ لَّكُمْۗ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌۢ بَعْدَهُنَّۗ طَوَّافُوْنَ عَلَيْكُمْ بَعْضُكُمْ عَلٰى بَعْضٍۗ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَكُمُ الْاٰيٰتِۗ وَاللّٰهُ عَلِيْمٌ حَكِيْمٌ

yā ayyuhal-lażīna āmanū liyasta'żinkumul-lażīna malakat aimānukum wal-lażīna lam yablugul-ḥuluma minkum ṡalāṡa marrāt(in), min qabli ṣalātil-fajri wa ḥīna taḍa‘ūna ṡiyābakum minaẓ-ẓahīrati wa mim ba‘di ṣalātil-‘isyā'(i), ṡalāṡu ‘aurātil lakum, laisa ‘alaikum wa lā ‘alaihim junāḥum ba‘dahunn(a), ṭawwāfūna ‘alaikum ba‘ḍukum ‘alā ba‘ḍ(in), każālika yubayyinullāhu lakumul-āyāt(i), wallāhu ‘alīmun ḥakīm(un).

ऐ ईमान वालों! तुम्हारे गुलाम (मर्द और औरत) और तुममें से जो लोग अभी बालिग (वयस्क) नहीं हुए हैं, उन्हें चाहिए कि वे तुमसे तीन वक्तों पर इजाज़त माँगें: सुबह की नमाज़ से पहले, जब तुम दोपहर में अपने (बाहरी) कपड़े उतारते हो, और इशा की नमाज़ के बाद। ये तुम्हारे लिए तीन पर्दे (वक्त) हैं। इसके अलावा न तुम पर और न उन पर कोई गुनाह है, वे तुम्हारे पास आते-जाते रहते हैं, तुम एक-दूसरे के लिए हो। इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है।


17
Q.S अर-रम (30:17)

فَسُبْحٰنَ اللّٰهِ حِيْنَ تُمْسُوْنَ وَحِيْنَ تُصْبِحُوْنَ

fa subḥānallāhi ḥīna tumsūna wa ḥīna tuṣbiḥūn(a).

तो अल्लाह की तस्बीह करो जब तुम शाम को पहुँचते हो और जब तुम सुबह को उठते हो;


18
Q.S अर-रम (30:18)

وَلَهُ الْحَمْدُ فِى السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضِ وَعَشِيًّا وَّحِيْنَ تُظْهِرُوْنَ

wa lahul-ḥamdu fis-samāwāti wal-arḍi wa ‘asyiyyaw wa ḥīna tuẓhirūn(a).

और उसी के लिए तारीफ़ है आकाशों में और धरती में, और शाम के वक़्त और जब तुम दोपहर को पहुँचते हो।