وَاِذْ تَقُوْلُ لِلَّذِيْٓ اَنْعَمَ اللّٰهُ عَلَيْهِ وَاَنْعَمْتَ عَلَيْهِ اَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللّٰهَ وَتُخْفِيْ فِيْ نَفْسِكَ مَا اللّٰهُ مُبْدِيْهِ وَتَخْشَى النَّاسَۚ وَاللّٰهُ اَحَقُّ اَنْ تَخْشٰىهُ ۗ فَلَمَّا قَضٰى زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًاۗ زَوَّجْنٰكَهَا لِكَيْ لَا يَكُوْنَ عَلَى الْمُؤْمِنِيْنَ حَرَجٌ فِيْٓ اَزْوَاجِ اَدْعِيَاۤىِٕهِمْ اِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًاۗ وَكَانَ اَمْرُ اللّٰهِ مَفْعُوْلًا
wa iż taqūlu lil-lażī an‘amallāhu ‘alaihi wa an‘amta ‘alaihi amsik ‘alaika zaujaka wattaqillāha wa tukhfī fī nafsika mallāhu mubdīhi wa takhsyan-nās(a), wallāhu aḥaqqu an takhsyāh(u), falammā qaḍā zaidum minhā waṭaran zawwajnākahā likai lā yakūna ‘alal-mu'minīna ḥarajun fī azwāji ad‘iyā'ihim iżā qaḍau minhunna waṭarā(n), wa kāna amrullāhi maf‘ūlā(n).
आ (याद रखीं), जब रउआ (मुहम्मद) ओह व्यक्ति से कहनी जेकरा पर अल्लाह एहसान कइले बाड़न आ रउआ (उहो) ओकरा पर एहसान कइले बानी कि, "अपना मेहरारू के रखीं आ अल्लाह से डेराईं," जबकि रउआ अपना दिल में छिपावत रहनी कि अल्लाह जवन खुलासा करीहें, आ रउआ लोग से डेरात रहनी, भले ही अल्लाह के रउआ से डेराए के अधिका अधिकार रहे। त जब जैद अपना पत्नी खातिर आपन जरूरत खतम क देले रहले (तलाक दे देले रहले), त हमनी के आपके बियाह उनुका (जैनाब) से कईनी जा ताकि मुसलमान लोग के अपना गोद लिहल बच्चा के पत्नी से (बियाह) करे में कवनो आपत्ति ना होखे, अगर गोद लिहल बच्चा अपना पत्नी खाती आपन जरूरत पूरा क लेले रहित। आ भगवान के फरमान जरूर पूरा होई।
مَا كَانَ مُحَمَّدٌ اَبَآ اَحَدٍ مِّنْ رِّجَالِكُمْ وَلٰكِنْ رَّسُوْلَ اللّٰهِ وَخَاتَمَ النَّبِيّٖنَۗ وَكَانَ اللّٰهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيْمًا ࣖ
mā kāna muḥammadun abā aḥadim mir rijālikum wa lākir rasūlallāhi wa khātaman-nabiyyīn(a), wa kānallāhu bikulli syai'in ‘alīmā(n).
मुहम्मद रउरा में से केहू के बाप ना हवे, लेकिन उ अल्लाह के रसूलुल्लाह अवुरी नबी के मुहर हवे। आ अल्लाह हर चीज के सर्वज्ञ हवें।