يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا لَا تَتَّخِذُوْا عَدُوِّيْ وَعَدُوَّكُمْ اَوْلِيَاۤءَ تُلْقُوْنَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوْا بِمَا جَاۤءَكُمْ مِّنَ الْحَقِّۚ يُخْرِجُوْنَ الرَّسُوْلَ وَاِيَّاكُمْ اَنْ تُؤْمِنُوْا بِاللّٰهِ رَبِّكُمْۗ اِنْ كُنْتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَادًا فِيْ سَبِيْلِيْ وَابْتِغَاۤءَ مَرْضَاتِيْ تُسِرُّوْنَ اِلَيْهِمْ بِالْمَوَدَّةِ وَاَنَا۠ اَعْلَمُ بِمَآ اَخْفَيْتُمْ وَمَآ اَعْلَنْتُمْۗ وَمَنْ يَّفْعَلْهُ مِنْكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاۤءَ السَّبِيْلِ
yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tattakhiżū ‘aduwwī wa ‘aduwwakum auliyā'a tulqūna ilaihim bil-mawaddati wa qad kafarū bimā jā'akum minal-ḥaqq(i), yukhrijūnar-rasūla wa iyyākum an tu'minū billāhi rabbikum, in kuntum kharajtum jihādan fī sabīlī wabtigā'a marḍātī tusirrūna ilaihim bil-mawaddah(ti), wa ana a‘lamu bimā akhfaitum wa mā a‘lantum, wa may yaf‘alhu minkum faqad ḍalla sawā'as-sabīl(i).
हे विश्वास करनिहार! हमर दुश्मन आ अपन दुश्मन केँ वफादार मित्र नहि बनाउ जाहि सँ अहाँ हुनका (मुहम्मदक खबरि) पहुँचाबी, करुणा सँ; भले ही ओ सभ ओहि सत्य केँ नकारने होथि जे अहाँ केँ पहुँचाओल गेल छल। ओ सब रसूलुल्लाह आ अहाँ के स्वयं बाहर क देलक, कियाक त अहाँ अपन रब अल्लाह पर विश्वास केने रही। जँ अहाँ सचमुच हमर मार्गक लेल प्रयास करबाक लेल निकलैत छी आ हमर प्रसन्नताक खोज करैत छी (से नहि करू)। अहाँ हुनका सभ केँ (मुहम्मदक खबरि) गुप्त रूप सँ, करुणा सँ कहैत छी, आ हम बेसी नीक जकाँ जनैत छी जे अहाँ की नुकाबैत छी आ की उजागर करैत छी। आ अहाँ सभ मे जे कियो एहन करैत अछि, तखन सत्ते, ओ सोझ बाट सँ भटकि गेल अछि।